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लाखों रुपये के सचल अस्पताल बन गए कबाड़

Tue, 23 Dec 2014 11:26 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, महोबा
ब्यूरो/अमर उजाला, महोबा Updated Tue, 23 Dec 2014 11:26 PM IST
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Millions became the mobile hospital junk  Open in Google Tran

बसपा शासन में ग्रामीणाें को डोर टू डोर जाकर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए खरीदे गए सचल अस्पताल कबाड़ बन गए हैं। सीएमओ कार्यालय परिसर में खड़े इन वाहनों का कोई पुरसाहाल नहीं है, जिससे लाखों रुपये के सचल अस्पताल वाहन जंग खा रहे हैं।

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बसपा शासनकाल में ग्रामीण अंचलों में रह रहे लोगों को उनके गांव में ही स्वास्थ्य सुविधाएं दिलाने के लिए सचल अस्पताल की शुरुआत की थी। बसपा सरकार के इस ड्रीम प्रोजेक्ट के तहत जिले में लाखाें रुपये खर्च कर तीन सचल अस्पताल खरीदे गए थे।

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माया सरकार के इन सचल अस्पतालों में शामिल चिकित्सक, फार्मासिस्ट और नर्स टीम जिले के ग्रामीण अंचलों में ग्रामीणों का उपचार करती थी। इससे ग्रामीणों को जिला अस्पताल या सीएचसी तक आने के बजाय गांव में ही घर बैठे स्वास्थ्य सुविधाएं मयस्सर हो रही थी।
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वर्ष 2012 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद सूबे में सपा की सरकार बनते ही गांवाें तक फर्राटा भरकर ग्रामीणों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने वाले ये सचल अस्पताल बंद हो गए।

इससे लाखों रुपये खर्च कर खरीदे गए सचल वाहन जिला अस्पताल स्थित सीएमओ कार्यालय परिसर में खड़े जंग खा रहे हैं। इन वाहनाें को कबाड़ की गाड़ियाें के बीच खड़ा करा दिया गया है।
बेकार हो गया पैरामेडिकल स्टाफ- सचल अस्पताल के लिए संविदा पर रखे गए चिकित्सक और पैरामेडिकल स्टाफ बेकार हो गया है। कारण, बसपा सरकार जाते ही गांव-गांव में प्रतिदिन जाकर स्वास्थ्य सुविधाएं मयस्सर कराने वाले चिकित्सक व कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया गया है।

नतीजतन अब न तो सचल अस्पताल नजर आ रहे हैं और न ही घर बैठे ग्रामीणों को मिलने वाली चिकित्सीय सुविधाएं मिल रही हैं, जिससे इंटीरियर में रह रहे गरीबों को अब 20 से 30 किलोमीटर दूर अस्पतालों में जाना पड़ रहा है।
घर बैठे मिलती थीं स्वास्थ्य सेवाएं- ग्रामीणों अंचलाें में स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ दिलाने के लिए सचल अस्पताल में चिकित्सक के साथ-साथ एक फार्मासिस्ट, नर्स, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी शामिल थे। ग्रामीण अंचलों में पहुंचने पर वहां की आशा बहू को भी चिकित्सीय टीम में शामिल कर ग्रामीणाें का उपचार किया जाता था।


सचल अस्पताल के गांव में पहुंचने से ग्रामीणों को दवाआें के साथ-साथ आने जाने की जहमत से निजात मिलती थी। साथ ही अस्पताल तक आने जाने का किराया खर्च भी बचता था।

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