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जिम में सीखा साइकिल चलाना और फिर बना लिया हमसफर
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महोबा। तेल लगे न पानी, चली जाए सन्नानी, ये साइकिल बड़ी सयानी। साइकिल पर गढ़ी गई इन पंक्तियों को महोबा में पूरी तरह चरितार्थ कर रहे बुंदेली समाज के संयोजक तारा पाटकर। वे साइकिल की इसी खूबियों के कायल हैं और उसे अपना असली हमसफर मानते हैं। उनके घर में बाइक और कार भी हैं, लेकिन वे नगर में जहां भी जाते हैं, साइकिल से ही जाते हैं। बाइक और कार का इस्तेमाल शहर से बाहर जाने में ही करते हैं।
तारा पाटकर ने बताया कि महंगाई और कोरोना संक्रमणकाल में छोटे शहरों और कस्बों के लिए तो साइकिल वरदान है। दो-तीन किलोमीटर तक जाने के लिए इससे अच्छी कोई सवारी नहीं। एक तो महंगे पेट्रोल का खर्चा बचा, दूसरा साइकिल चलाने वालों के फेफड़े और हृदय मजबूत रहते हैं।
ऐसे लोगों के पास कोरोना जैसी बीमारियां जल्द नहीं फटकती। उन्होंने बताया कि वे तो शादी समारोहों में भी बेझिझक अपनी साइकिल से जाते हैं। अगर कस्बों और छोटे शहरों में लोग बाइक और कार चलाने से परहेज करने लगें और साइकिल को अपनाने लगें तो लोगों को भी लाभ होगा और पर्यावरण को भी।
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तारा पाटकर को साइकिल के प्रति अनुराग आठ साल पहले लखनऊ शहर में तब हुआ, जब वे जिम जाते थे। उन्होंने देखा कि लोग जिम के अंदर साइकिलिंग करते हैं लेकिन उनको सड़क पर साइकिल चलाने में शर्म आती थी।
इसे दूर करने के लिए उन्होंने लखनऊ में साइकिल सम्मान यात्रा निकाली और तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से हफ्ते में एक दिन साइकिल डे घोषित करने की मांग की। उन्होंने वर्ष 2013 में लखनऊ से कन्याकुमारी तक साइकिल से यात्रा की। बताया कि हर दिन वे आठ से दस किलोमीटर साइकिल जरूर चलाते हैं।
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तारा पाटकर ने बताया कि महंगाई और कोरोना संक्रमणकाल में छोटे शहरों और कस्बों के लिए तो साइकिल वरदान है। दो-तीन किलोमीटर तक जाने के लिए इससे अच्छी कोई सवारी नहीं। एक तो महंगे पेट्रोल का खर्चा बचा, दूसरा साइकिल चलाने वालों के फेफड़े और हृदय मजबूत रहते हैं।
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ऐसे लोगों के पास कोरोना जैसी बीमारियां जल्द नहीं फटकती। उन्होंने बताया कि वे तो शादी समारोहों में भी बेझिझक अपनी साइकिल से जाते हैं। अगर कस्बों और छोटे शहरों में लोग बाइक और कार चलाने से परहेज करने लगें और साइकिल को अपनाने लगें तो लोगों को भी लाभ होगा और पर्यावरण को भी।
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तारा पाटकर को साइकिल के प्रति अनुराग आठ साल पहले लखनऊ शहर में तब हुआ, जब वे जिम जाते थे। उन्होंने देखा कि लोग जिम के अंदर साइकिलिंग करते हैं लेकिन उनको सड़क पर साइकिल चलाने में शर्म आती थी।
इसे दूर करने के लिए उन्होंने लखनऊ में साइकिल सम्मान यात्रा निकाली और तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से हफ्ते में एक दिन साइकिल डे घोषित करने की मांग की। उन्होंने वर्ष 2013 में लखनऊ से कन्याकुमारी तक साइकिल से यात्रा की। बताया कि हर दिन वे आठ से दस किलोमीटर साइकिल जरूर चलाते हैं।