फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Mahoba News ›   Hundreds of artisans unemployed due to the stagnation of native redeemed business

देशी रेडिमेड का कारोबार ठप होने से सैकड़ों कारीगर बेरोजगार

Sat, 13 Oct 2018 09:23 PM IST
महोबा।
महोबा। Updated Sat, 13 Oct 2018 09:23 PM IST
विज्ञापन
Hundreds of artisans unemployed due to the stagnation of native redeemed business
शेख बफाती - फोटो : amarujala
                                      
विज्ञापन

महोबा। फैंसी रेडिमेड के बढ़ते चलन से देशी रेडिमेड की बिक्री ठप हो गई हैं। अब ग्रामीण भी अपने बच्चों को शहर में आकर फैंसी रेडिमेड की दुकान से कपड़ों की खरीदारी करते हैं। देशी रेडिमेड के बंद होने से 500 से ज्यादा इस कारोबार से जुड़े लोगों के सामने से रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया है।       
गौरतलब है कि बीस साल पहले जिले में देशी रेडिमेड का चलन था। शहर में देशी रेडिमेट के तीन कारखाने थे। जहां पर करीब पांच सैकड़ा लोग कपड़े सिलने और काटने का काम कारखाने और घरों पर करते थे। इतना ही नहीं घर-घर में कपड़ों की कटिंग कराकर लोग सिलाई करते थे। पेटीकोट, ब्लाउज, पायजामा, अंडरवियर (कच्छा), जेबदार बनियान कारखानों और घरों में तैयार किए जाते थे। तैयार माल को लोग गांव और कस्बों में लगने वाली साप्ताहिक हाट (बाजार) में बेचते थे। देशी रेडिमेड के कपड़ों की जमकर बिक्री होती थी और गांव में लोग कपड़ा खरीदने के लिए साप्ताहिक हाट में बिक्री करते थे। जहां पर देशी रेडिमेड की खरीदारी के लिए लोगों की भारी-भीड़ जुटती थी।       
विज्ञापन

शहर से चरखारी, श्रीनगर, खरेला, खन्ना, मुस्करा के अलावा पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश के लौड़ी, चंदला, कैमाहा, महाराजपुर, मलहरा सहित कई कस्बों में कपड़ा व्यापारी साप्ताहिक बाजार को देशी रेडिमेड लेकर जाते थे लेकिन अब स्टैंडर्ड रेडिमेड के आने से देशी रेडिमेड का चलन खत्म हो गया है। अब अंडरवियर (कच्छा) के स्थान पर जांघिया, जेबदार बनियान के स्थान पर स्टैंडर्ड कंपनी की बनियान ग्रामीण भी खरीद रहे हैं।  
विज्ञापन
विज्ञापन

फैंसी रेडिमेड का है जमाना-
लोगों के पास पैसा बढ़ने से साथ उनका फैंसी भी बढ़ा है। यहीं वजह है कि अब साप्ताहिक हाट में बिकने वाले सिले-सिलाए कपड़ों का दौर खत्म हो गया है और लोग ज्यादा पैसा देकर शहर में आकर पायजामे के स्थान पर जींस पेंट और शर्ट खरीद रहे हैं। जिससे बीस साल पहले उरूज पर चल रहा देशी रेडिमेड का कारोबार ठप हो गया है। इसीलिए घर-घर में चलने वाली अब मशीनों की भी आवाज नहीं सुनाई देती है।  
सिलाई कारीगरों ने अपनाया दूसरा कामड
अंडरवियर (कच्छा) और जेबदार बनियान के कारीगर बेकार हो गए हैैं। पुराना फैशन चलन से बाहर हो जाने कारण इसके कारीगरों को अब काम के लाले पड़ गए हैं। जिससे तमाम मशीन चलाने वाले कारीगरों ने अपना पुश्तैनी कार्य छोड़कर दूसरा धंधा अपना लिया है। अब ग्रामीणों का पहनावा भी शहरियों की तरह हो गया है। यही वजह है कि गांव और कस्बों में लगने वाली साप्ताहिक हाट भी धीरे-धीरे बंद होती जा रही है।
पैसा बढ़ा तो बदला पहनावा-
बीस साल तक देशी रेडिमेड के कारोबार से जुड़े रहे थोक विक्रेता शेख बफाती का कहना है कि 80 के दशक में लोगों के पास पैसे की भारी कमी थी। परिवार बड़े होने के कारण लोगों को बच्चों की अच्छी परवरिश करना ही मुश्किल होता था। ऐसे में कीमती वस्त्र खरीदना उनके लिए सपने जैसा रहता था इसलिए ग्रामीण बच्चों को सिले-सिलाए कपड़े खरीदने के लिए साप्ताहिक बाजार का इंतजार करते थे लेकिन अब पैसा बढ़ने के साथ लोगों का पहनावा भी बदल गया है।

प्रोत्साहन न मिलने से लघु उद्योग बंद-
देशी रेडिमेड के थोक कारोबारी अब्दुल जब्बार का कहना है कि शासन-प्रशासन द्वारा देशी रेडिमेड के कारोबार को प्रोत्साहित न करने से यह लघु उद्योग बंद हो गया है। जिससे इस कारोबार से जुड़े सैकड़ों लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया है। सरकार ने भी लघु उद्योग के बढ़ावे के लिए कारोबारियों को प्रोत्साहित नहीं किया, जिससे लोग इस कारोबार को छोड़कर दूसरा कार्य करने लगे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed