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प्राचीन स्वरूप खो रहा है गोवर्द्धन्नाथ जू मेला
Mahoba
Updated Sun, 18 Nov 2012 12:00 PM IST
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महोबा। प्रशासनिक उपेक्षा के चलते ऐतिहासिक सहस्र श्री गोवर्द्धन्नाथ जू महाराज मेला प्राचीन स्वरूप खोता जा रहा है। अब इस मेले में न तो दूर दराज से दुकानें आती हैं और न ही लोगाें का मेले के प्रति पहले जैसा उत्साह नजर आता है।
पहले गोवर्द्धन्नाथ जू मेले में आगा हश्र के नौटंकी कलाकार थिएटर में प्रतिदिन नौटंकी करते थे, जिसे देखने आसपास के गांव के लोग पहुंचते थे। मेले की भव्य व्यवस्थाएं धन के अभाव में पीछे छूट गई हैं। नगर पालिका के सीमित साधन मेले को कम से कम जीवित रखने का प्रयास किए हैं। 130 साल पुराने गोवर्द्धन्नाथ जू मेले के स्वरूप को भव्यता प्रदान करने के लिए पालिका प्रशासन के अलावा चरखारी के लोगाें को संगठित प्रयास कर इसे सजाया संवारा जा सकता है। मेला स्थल की भूमि दूर दराज के दुकानदाराें को नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाए तो दूरदराज के दुकानदार मेले में पुन: आएंगे और व्यापक सुविधाएं मिलने पर भागीदारी दर्ज करने के लिए आकर्षित हाेंगे। वयोवृद्ध अनीस अहमद और नब्बन ने कहा कि पिछले सालाें की तुलना में ऐतिहासिक मेले में काफी बदलाव आया है। धीरे-धीरे मेले का वास्तविक स्वरूप खत्म होता जा रहा है। जिसके लिए क्षेत्र के लोगों को आगे आना होगा। पूर्व में नामीगिरामी हाकी टीमें चरखारी मेले में आती थीं। भारतीय हाकी टीम के कई खिलाड़ियाें ने चरखारी में प्रतिभा का प्रदर्शन किया, लेकिन अब पहले जैसी हाकी टीमें नहीं आतीं।
शिवकुमार सोनी ने बताया कि कार्तिक उत्सव के रूप में मनाया जाने वाला सहस्र श्री गोवर्द्धन्नाथ जू मेला की अवनति के पीछे प्रशासनिक उपेक्षा है। रियासत काल में राज्य की ओर से सारी व्यवस्थाएं की जाती थीं। वर्तमान में सिर्फ नगर पालिका इस ऐतिहासिक मेलेे को जीवित रखे है। कहा कि जब तक मेले में मनोरंजन के साधन और बड़ी-बड़ी दुकानें नहीं हाेंगी, लोगाें का मेले के प्रति रुझान नहीं बढ़ेगा।
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पहले गोवर्द्धन्नाथ जू मेले में आगा हश्र के नौटंकी कलाकार थिएटर में प्रतिदिन नौटंकी करते थे, जिसे देखने आसपास के गांव के लोग पहुंचते थे। मेले की भव्य व्यवस्थाएं धन के अभाव में पीछे छूट गई हैं। नगर पालिका के सीमित साधन मेले को कम से कम जीवित रखने का प्रयास किए हैं। 130 साल पुराने गोवर्द्धन्नाथ जू मेले के स्वरूप को भव्यता प्रदान करने के लिए पालिका प्रशासन के अलावा चरखारी के लोगाें को संगठित प्रयास कर इसे सजाया संवारा जा सकता है। मेला स्थल की भूमि दूर दराज के दुकानदाराें को नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाए तो दूरदराज के दुकानदार मेले में पुन: आएंगे और व्यापक सुविधाएं मिलने पर भागीदारी दर्ज करने के लिए आकर्षित हाेंगे। वयोवृद्ध अनीस अहमद और नब्बन ने कहा कि पिछले सालाें की तुलना में ऐतिहासिक मेले में काफी बदलाव आया है। धीरे-धीरे मेले का वास्तविक स्वरूप खत्म होता जा रहा है। जिसके लिए क्षेत्र के लोगों को आगे आना होगा। पूर्व में नामीगिरामी हाकी टीमें चरखारी मेले में आती थीं। भारतीय हाकी टीम के कई खिलाड़ियाें ने चरखारी में प्रतिभा का प्रदर्शन किया, लेकिन अब पहले जैसी हाकी टीमें नहीं आतीं।
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शिवकुमार सोनी ने बताया कि कार्तिक उत्सव के रूप में मनाया जाने वाला सहस्र श्री गोवर्द्धन्नाथ जू मेला की अवनति के पीछे प्रशासनिक उपेक्षा है। रियासत काल में राज्य की ओर से सारी व्यवस्थाएं की जाती थीं। वर्तमान में सिर्फ नगर पालिका इस ऐतिहासिक मेलेे को जीवित रखे है। कहा कि जब तक मेले में मनोरंजन के साधन और बड़ी-बड़ी दुकानें नहीं हाेंगी, लोगाें का मेले के प्रति रुझान नहीं बढ़ेगा।
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