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कोई नहीं हैं माबूद तेरे सिवा

Mon, 19 Nov 2018 09:43 PM IST
Updated Mon, 19 Nov 2018 09:43 PM IST
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कोई नहीं हैं माबूद तेरे सिवा
महोबा। बारह रवी-उल-अव्वल की तारीख इस्लाम में अहम स्थान रखती है। ऐसे विरले ही होंगे जिनकी यौमे-ए-पैदाइश और बफात एक दिन ही हो। बारह रवी-उल-अव्वल को हजरत मोहम्मद साहब की पैदाइश हुई और इसी दिन उन्होंने बफात पाई। इस्लाम में कमोबेश एक लाख 99 हजार नबी कहे गए हैं। हजरत मोहम्मद साहब आखिरी नबी हुए। उन्हीं पर अल्लाह की तरफ से कुरआन नाजिल हुआ। जो लोगों की सलामती और खैर-ओ-बरकत का पैगाम लेकर आया। कुरआन में दीन के साथ-साथ दुनियादारी पर भी जोर दिया गया। आपका दीन कैसा हो यह उतना आवश्यक नहीं है। जितना यह देखना कि आपकी दुनियादारी कैसी है। कहा भी गया है कि किसी का दीन देखना हो तो उसकी दुनियादारी देखो। इस्लाम में तो यहां तक कहा गया है कि यदि आपका पड़ोसी भूखा है और आप रोटी खा रहे हैं, तो आपका फर्ज है कि आप बाद में रोटी खाए। पहले पड़ोसी को खिलाएं। इसी तरह ईद से पहले सदका निकालने और जकात देने की भी व्यवस्था की गई है। इस्लाम में किसी के भी धर्म को बुरा न कहने की नसीहत दी गई है। इस्लाम के दो दर्शन इसी को साबित करते है कि फर्ज और सुन्नत इसी का नाम है। कलमा, नमाज, रोजा, जकात और हज यह पांच चीजें फर्ज है और जो बातें रसूल ने की है, वे सभी सुन्नत हैं। कुरआन आपके दिल में भी हो और जबान पर भी। ईद मिलादुन्नबी खास तौर पर लोगों को जिंदगी बशर करने का रास्ता दिखाती है। 1440 साल पहले हजरत मोहम्मद साहब दुनिया में आए। नबी अराबी रब्बे हबली उम्मती कहते हुए पैदा हुए। आज मुस्लिम समुदाय के लोग नबी अराबी की यौमे-ए-पैदाइश जोशोखरोश के साथ मनाते हैं लेकिन उनके बताए हुए तरीकों पर अमल कम ही लोग करते हैं। दीन से लोग दूर होते जा रहे हैं इसलिए आज मुस्लिम समाज परेशान हैं। पैसे की चकाचौंध में वह सबकुछ भूलता जा रहा है और नेकियों को छोड़कर बुराइयों की तरफ भाग रहा है।
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इंसेट
सल्ललाहो अलैहि वसल्लम का किरदार
आखिरी खुतबे में हजरत मोहम्मद साहब ने कहा प्यारे भाइयों में जो कुछ कहूं उसको ध्यान से सुनो। हो सकता है इसके बाद में तुमसे न मिल सकूं। अल्लाह की किताब और उसके रसूल की सुन्नत को मजबूती से पकड़े रखना। लोगों की जानमाल और इज्जत का ख्याल रखना। कोई अमानत रखे तो उसमें ख्यानत न रखना। खून-खराबे और ब्याज के करीब न फटकना। लोगों तुम्हारा रब एक है।
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मोहम्मद साहब ने दिया इंसानियत का संदेश
हजरत मोहम्मद साहब ने आपसी भाईचारा कायम रखने और दूसरों की बुराई न करने व गरीब मजलूम की मदद करने के साथ-साथ आपस में बैर न रखने का संदेश दिया। हजरत मोहम्मद साहब आज भी आपके और हमारे दिलों में हैं। जिस कुरआन की शुरुआत ही इकरा यानि तालीम से होती है, उसी पर आज अमल नहीं किया जा रहा है। तालीम के मायने में इस्लाम के मानने वाले पीछे हैं। हजरत मोहम्मद साहब ने बुराई का जवाब भलाई से देने का संदेश दिया है।
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हजरत मोहम्मद साहब ने खत्म कराई जुल्म ज्यादती

हजरत मोहम्मद साहब केे आने से पहले दुनिया में जिहालत, जुल्म ज्यादती का आलम था। जुआ और घर-घर में शराब पीने वालों की महफिलें सजती थी। मजलूमों के साथ अत्याचार किया जाता था। मजलूमों का कोई साथ भी नहीं देता था। चारों तरफ हैवानियत फैली थी। हजरत मोहम्मद साहब के आने के बाद जुल्म ज्यादती का खात्मा हुआ और अत्याचार कम होने लगे। लोगों ने जीने का सलीका सीखा।

पेश इमाम
मौलाना तौफीक
हजरत मोहम्मद साहब ने 40 साल की उम्र में ऐलान-ए-नबुबत फर्माया। इसके बाद इस्लाम मुकम्मल हुआ। हजरत मोहम्मद साहब ने 25 साल की उम्र में बेबा खबीजतुल कुबरा से निकाह किया। बेवाओं की इज्जत बढ़ाने का संदेश दिया। साथ ही अपनी बेटी की शादी में दहेज में मिट्टी के बर्तन और खजूर का बिछौना देकर लोगों को सैकड़ों साल पहले दहेज न लेने की हिदायत दी थी। उन्होंने अमन शांति का पैगाम दिया। साथ ही जुल्म का जवाब जुल्म से नहीं दिया और जुल्म करने वालों को कभी बददुआ भी नहीं दी बल्कि अल्लाह तआला से उन्हें माफी देने की दुआ की। नबी ने उम्मत के लिए जो कुर्बानियां दी है उससे लोगों को सबक लेने की नसीहत दी।
काजी-ए-शहर
कारी सैय्यद आफाक हुसैन
कोई नहीं हैं माबूद तेरे सिवा
-किसी का दीन देखना है तो उसकी दुनियादारी भी देखो
-जश्न-ए-ईदमिलादुन्नबी पर विशेष
नईमुर्रहमान
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