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Maharajganj News: त्याग और बलिदान का त्योहार है मोहर्रम, शुरू है इबादत

Sun, 23 Jul 2023 01:38 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sun, 23 Jul 2023 01:38 AM IST
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Moharram is the festival of sacrifice and sacrifice, worship begins
त्याग और बलिदान का त्योहार है मोहर्रम, शुरू है इबादत
मोहर्रम की नौवीं और दसवीं तारीख को जाने वाली इबादतों का भी बड़ा पुण्य बताया गया
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संवाद न्यूज एजेंसी
महराजगंज। मोहर्रम माह की शनिवार को तीसरी तारीख है। मोहर्रम का महीना नजरों से ओझल हो रहा है। सिंदुरिया मस्जिद के इमाम हाजी मोहम्मद हुसैन के अनुसार त्याग और बलिदान का त्योहार है मोहर्रम। इस माह में अल्लाह की इबादत करनी चाहिए जबकि पैगंबरे-इस्लाम ने इस माह में खूब रोजे रखे और अपने साथियों का ध्यान भी इस तरफ आकर्षित किया। इस बारे में कई प्रामाणिक हदीसे मौजूद हैं। मोहर्रम की नौवीं और दसवीं तारीख को जाने वाली इबादतों का भी बड़ा पुण्य बताया गया है।

इमाम हाजी मोहम्मद हुसैन ने बताया कि अपनी मृत्यु से पहले, उमय्यद ख़लीफ़ा मुआविया प्रथम ने अपने बेटे यजीद को अपना उत्तराधिकारी नामित किया था। यजीद के नामांकन का हजरत मोहम्मद के कुछ प्रमुख साथियों के बेटों ने विरोध किया था, जिनमें चौथे खलीफा अली के पुत्र हजरत इमाम हुसैन थे। उमय्यद के गवर्नर उबैद अल्लाह इब्न ज़ियाद द्वारा कूफा जाने का रास्ता नहीं देने पर कूफा जाते समय कर्बला के मैदान में डेरा डाला। सत्य और असत्य की लड़ाई में तीन दिन तक भूखे प्यासे रहने के बाद हजरत इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के साथ क़र्बला के मैदान मे जंग करते हुए शहीद हो गए, लेकिन कभी सत्य का साथ नहीं छोड़ा।
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यौम -ए-आशूरा

मोहर्रम का महीना इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना होता है। यह महीना इस्लाम धर्म मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। मोहर्रम की 10वीं तारीख यौम-ए-आशूरा के नाम से जानी जाती है। ये इस्लाम धर्म का प्रमुख दिन होता है। कहा जाता है कि मोहर्रम के महीने में दसवीं तारीख को हजरत इमाम हुसैन और 72 साथियों की शहादत हुई थी। हजरत इमाम हुसैन इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब के छोटे नवासे थे। हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद में मोहर्रम 10वें दिन को लोग गम के रूप में मनाते हैं, जिसे यौम -ए- आशूरा कहा जाता है।
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हिंदू धर्म की महिलाएं रखती हैं रोजा

त्याग और बलिदान का महीना है महे मोहर्रम। पहली से दसवीं मोहर्रम तक सिंदुरिया, मोतीपुर, भगवानपुर,सीतलापुर, पिपरा कल्याण,सड़क टोला, मंगलपुर की महिलाएं मनौती के तौर पर रोजा रखती हैं और दसवीं मोहर्रम को रोजा खत्म हो जाने के बाद प्रसाद वितरण करती हैं।

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पायक बनने की है प्रथा
मोहर्रम के महीने में छोटे बच्चों से लेकर तक बड़े बूढ़ों तक पायक बनने की प्रथा सदियों से चली आ रही है। पायक का शाब्दिक अर्थ है पैदल चलने वाला सिपाही या समाचार पहुंचाने वाला होता है। जब बच्चा पैदा होता है तो माताएं मनौती के तौर पर यह मानती हैं। जब मेरा बच्चा 5 वर्ष का हो जाएगा तो वह मोहर्रम के महीने में पायक बनेगा। 5 वर्ष का हो जाने के बाद माताएं अपने अपने बच्चों को नए नए कपड़े पहना कर हाथ में मोर का पंख और कमर में घंटी बांध कर पायक बनने के लिए भेज देती हैं। ये पायक बने बच्चे गांव गांव झुंड बनाकर ताजियों के पास जाकर या हुसैन की सदाएं बुलंद करते हैं। इन बच्चों को जमीन पर बैठना नहीं होता है। यह जब भी बैठेंगे तो लकड़ी की कुर्सी की डाल पर। 24 घंटे तक पायक बनने के बाद 10 मोहर्रम की शाम को दिन डूबने के बाद कमर से घंटी उतारते हैं।
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