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Maharajganj News: आजादी में ब्रिटिश हुकूमत से लड़े, खुद को स्वतंत्रता सेनानी साबित करने में टूटी सांस

Mon, 10 Aug 2026 01:37 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Mon, 10 Aug 2026 01:37 AM IST
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Fought against the British rule for independence, breathless in proving himself a freedom fighter
46 वर्ष बाद साबित हुआ संतबली थे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, आख्या प्रेषित
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2018 में हुई थी संतबली की मौत, पत्नी व बेटे ने जारी रखी लड़ाई
महराजगंज। सदर ब्लॉक के बांसपार बैजौली निवासी संत बली की मौत के आठ वर्ष बाद प्रशासन ने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मान लिया है। खुद को सेनानी साबित करने के लिए संतबली को 38 वर्ष तक जूझना पड़ा। जिला प्रशासन ने स्वीकार किया कि संतबली ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी लेकिन इसका कोई प्रमाण या प्रपत्र नहीं है। यह आख्या जिला प्रशासन ने छह फरवरी को राष्ट्रीय जनजाति आयोग को भेज दिया है।
बांसपार बैजौली ग्राम पंचायत निवासी संतबली ने अंग्रेजों के खिलाफ देश की आजादी की जंग में हिस्सा लिया। इसकी वजह से इनके परिवार की माली हालत आजादी के बाद खस्ताहाल ही रही। पत्नी व बेटे प्रशासनिक सहायता लेने के लिए उन्हें समझाते लेकिन उन्होंने आजादी के बाद लगभग 33 वर्ष तक यही जवाब दिया गया कि उन्होंने आजादी की लड़ाई लाभ प्राप्ति के लिए नहीं बल्कि कर्तव्य समझकर किया।
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परिवार की लगातार बिगड़ती माली हालत को देखते हुए उन्होंने 1980 में जिला प्रशासन को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की पेंशन के लिए आवेदन दिया। उनका आवेदन एक टेबल से दूसरे टेबल तक सरकता रहा लेकिन समय पर अंजाम तक नहीं पहुंचा। संतबली 38 वर्ष तक अपने परिवार को गरीबी से आजाद करने की जंग लड़ते रहे और 2018 में उनकी मृत्यु हो गई।
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इसके बाद पत्नी मुराती देवी व पुत्र चुल्हई ने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी साबित करने की जद्दोजहद महज इस लिए जारी रखी कि पिता न सही मां को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की पत्नी का पेंशन मिल सके। मुराती व चुल्हई ने इस मामले को राष्ट्रीय जनजाति आयोग तक पहुंचाया जहां से जिला प्रशासन से आख्या तलब की। आखिर कार छह मई 2026 को प्रशासन ने आख्या भेजकर यह बताया है कि ग्रामीणों की पूछताछ पर यह पता चलता है कि संत बली ने आजादी की लड़ाई लड़ी, लेकिन इसके कोई अभिलेख नहीं हैं और न ही परिवार के पास कोई प्रपत्र उपलब्ध है।
संतबली ने चुकाया था 25 रुपये का जुर्माना



संतबली की मृत्यु के बाद चुल्हई ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से गुहार लगाई तो आयोग ने डीएम से आख्या तलब की। यह आख्या लंबे इंतजार के बाद फरवरी 2026 में वरिष्ठ अन्वेषक राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को भेजा है। आख्या में कहा गया है कि संतबली ने भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया।वह 1941 और 1942 में अयोध्या जेल में बंद रहे और उन पर 25 रुपये का जुर्माना लगा और वह सिब्बनलाल सक्सेना के करीबी भी रहे। लेकिन इसके अभिलेख या प्रमाणपत्र नहीं है। यह लोगों ने पूछताछ में बताया। उनकी मृत्यु 28 मई 2018 को हुई। उनकी पत्नी मुराती वृद्धा पेंशन प्राप्त कर रहीं और आवास योजना का लाभ दिया गया।

सामान्य तरीके से अंत्येष्टि
संतबली की पत्नी ने बताया कि उनकी मृत्यु के बाद अंत्येष्टि सामान्य तरीके से हुई। प्रशासन या पुलिस की तरफ से इसमें शामिल होने के लिए कोई नहीं आया था। गांव के लोगों ने बढ़कर मदद किया तब हम गरीबी के बीच क्रिया कर्म कर पाए।
1.5 मंडा खेत पर 2.50 लाख का लोन
आजादी की लड़ाई में शामिल संतबली के परिवार की माली खस्ता है। संतबली के पुत्र चुल्हई ने बताया कि वह रिक्शा चलाकर किसी तरह मां की सेवा करते हैं। खेती की जमीन के नाम पर कुल डेढ़ मंडा जमीन है जिस पर 2.50 लाख रुपये का केसीसी ऋण है। स्थिति यह है कि जिस दिन रिक्शा नहीं निकालता उस दिन मुश्किल से रोटी का इंतजाम हो पाता है। मकान की मरम्मत केसीसी ऋण लेकर किया लेकिन प्रशासन की रिपोर्ट में आवास योजना का लाभ दिखा दिया गया।

वर्जन
आयोग के निर्देश पर सदर एसडीएम व तहसीलदार से जांच कराने के बाद संतबली को लोगों ने सेनानी बताया है। यह आख्या जिलाधिकारी की तरफ से छह फरवरी 2026 की तिथि में अनुसूचित जनजाति आयोग को भेजी गई है।
-डॉ. प्रशांत कुमार, एडीएम, महराजगंज।
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