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Maharajganj News: मेंथा की खेती से मुंह मोड़ रहे किसान, घटा रकबा

Mon, 17 Jun 2024 03:54 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज Updated Mon, 17 Jun 2024 03:54 AM IST
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Farmers turning away from mentha cultivation, area reduced
बागापार टोला विशुनपुरवा में मेंथा की खेती की निराई करता किसान। 
बागापार। बाजार में मेंथा तेल के मूल्य में आई भारी गिरावट के चलते क्षेत्र के किसानों का इसकी खेती से मोह भंग हो गया है। मंदी के कारण इलाके के किसानों ने मेंथा की जगह अपने खेतों को खाली छोड़ना बेहतर समझा है। नतीजा है कि जून-जुलाई के महीने में मेंथा की खुशबू से गुलजार रहने वाले खेत-खलिहान इस बार उजाड़ और गंधहीन नजर आ रहे हैं।
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यह इलाका पिछले एक दशक से औषधीय पौधों की खेती में काफी उन्नत की थी। खासकर मेंथा उत्पादन में यह क्षेत्र पूरे पूर्वांचल में अपनी अलग पहचान बना चुका था। मेंथा उत्पादन के उज्ज्वल भविष्य के कारण ही मेंथा क्रय करने वाली कई कंपनियों ने यहां अपना कार्यालय खोला। क्षेत्र में इन कंपनियों के आगमन से बाजार उपलब्ध होने के कारण यहां के किसानों ने दूसरी नकदी फसलों की जगह मेंथा के उत्पादन को बढ़ा दिया, जिससे यहां प्रतिवर्ष मेंथा का उत्पादन तीन हजार ड्रम से भी अधिक हो गया।
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इसकी कीमत अमूमन हजार रुपये प्रति लीटर के आसपास ही रहा जो पिछले वर्ष गिरकर छह सौ रुपये प्रति लीटर के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया, जिससे किसानों को अपनी लागत मूल्य भी प्राप्त नहीं हो सका। यही कारण है कि इसकी खेती से किसानों का मोह भंग हो गया।
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मेंथा उत्पादक किसान विद्यासागर, आसमन, महेश वर्मा ने बताया कि एक दशक पूर्व जब मेंथा की खेती की शुरुआत की थी, उस समय मेंथा तेल की कीमत 18-19 सौ रुपये प्रति लीटर थी। इधर कई वर्षों से तेल की कीमतों में लगातार गिरावट होने से किसानों की कमर टूट गई है। अब मेंथा की खेती घाटे का सौदा साबित हो रही है।

दृगपाल चौधरी, दीनानाथ, जगराम ने बताया कि मेंथा की खेती के लिए बीज तैयार करने, रोपनी, सिंचाई, निराई, कटाई और पेराई पर प्रति बीघा करीब 25 हजार रुपये का खर्च आता है, लेकिन मूल्य कम रहने के कारण हर वर्ष उन्हें आर्थिक क्षति उठानी पड़ रही है। किसानों ने खेती छोड़ने के लिए सरकार की नीतियों को भी जिम्मेदार बताया है।

किसान मिथिलेश सिंह ने कहा कि पहले मैं करीब दो से ढाई एकड़ में मेंथा की खेती करता था। इस समय एक डिस्मिल खेती नहीं किया हूं। इस खेती में काफी अधिक मेहनत लगती है और दाम भी ठीक नहीं मिल पा रहा है।
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