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Maharajganj News: तीन राज्यों का हुनर, खादी की चादरों में ऐसी गर्माहट कि देशभर में बढ़ गई मांग
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महराजगंज/फरेंदा। सर्दी में गर्माहट के लिए जरूरी नहीं कि कपड़े भारी हों। खादी की हल्की चादरें भी ठंड से राहत देती हैं। फरेंदा के आनंदनगर स्थित गांधी आश्रम सेंट्रल स्टोर में तैयार होने वाली खादी की चादरों की मांग देशभर में है। खास बात यह है कि यहां के उत्पादों को तैयार करने में यूपी, गुजरात और पश्चिम बंगाल के हुनर का मेल है।
आनंदनगर स्थित क्षेत्रीय गांधी आश्रम का भंडार गृह वर्ष 1960 से संचालित है। करीब दो एकड़ में फैला यह केंद्र खादी वस्त्रों की खरीद और वितरण का प्रमुख ठिकाना है। यहां बंगाल की मलमल खादी से लेकर रेडीमेड कपड़ों तक की विस्तृत शृंखला उपलब्ध है। यहां से देश के विभिन्न राज्यों में खादी उत्पाद भेजे जाते हैं।
सेंट्रल स्टोर में सिंगल और डबल बेड की खादी चादरों की अच्छी मांग है। विभाग के मुताबिक, अकेले चादरों का सालाना कारोबार करीब 50 लाख रुपये है। यहां एक हजार से तीन हजार रुपये तक की कीमत वाली चादरें उपलब्ध हैं। वजन में हल्की होने के बावजूद गर्माहट देने की खासियत के कारण सर्दी शुरू होते ही इनकी मांग कई गुना बढ़ जाती है। यहां रजाई, गद्दे और तकिए भी तैयार किए जाते हैं।
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तीन राज्यों से गुजरकर तैयार होता है खादी का सफर
स्टोर में कार्यरत कमला सरन ने बताया कि खादी के वस्त्र तैयार करने में कई राज्यों की भूमिका है। कपड़ों का वास्तविक निर्माण गांधी आश्रम में होता है। इसके बाद रंगाई और छपाई के लिए कच्चे कपड़े को गुजरात के अहमदाबाद भेजा जाता है। रंगाई के बाद धुलाई के लिए इसे पश्चिम बंगाल के अकबरपुर भेजा जाता है। वहां से कपड़ा वापस आनंदनगर लाया जाता है, जहां कारीगर कुर्ता-पायजामा, शर्ट, जैकेट और टोपी जैसे उत्पाद तैयार करते हैं।
धोती-गमछे से सरसों के तेल तक, रोजगार का आधार
कामगार राम प्रीत यादव के मुताबिक, यहां चादरों के अलावा रजाई, गद्दे, तकिया, कुर्ता-पायजामा, शर्ट का कपड़ा, पॉली खादी, धोती और गमछा भी लोकप्रिय हैं। स्टोर में सरसों के तेल और अगरबत्ती का उत्पादन भी होता है। यहां करीब 80 लोगों को रोजगार मिला है, जिनमें महिलाओं की संख्या अधिक है। वे सिलाई, कताई और पैकेजिंग के काम में जुटी हैं।
बोले प्रबंधक
खादी सिर्फ कपड़ा नहीं बल्कि विचार है। हम प्रधानमंत्री के ‘वोकल फॉर लोकल’ और मुख्यमंत्री के खादी अपनाओ अभियान के तहत कार्य कर रहे हैं। पीएम के आह्वान के बाद आज युवाओं में भी खादी का क्रेज है। सर्दी से पहले विभिन्न राज्यों से मिली मांग के अनुसार रजाई और गद्दे भेजे जा रहे हैं।
- रामसूरत सिंह यादव, क्षेत्रीय प्रबंधक, गांधी आश्रम, गोरखपुर
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आनंदनगर स्थित क्षेत्रीय गांधी आश्रम का भंडार गृह वर्ष 1960 से संचालित है। करीब दो एकड़ में फैला यह केंद्र खादी वस्त्रों की खरीद और वितरण का प्रमुख ठिकाना है। यहां बंगाल की मलमल खादी से लेकर रेडीमेड कपड़ों तक की विस्तृत शृंखला उपलब्ध है। यहां से देश के विभिन्न राज्यों में खादी उत्पाद भेजे जाते हैं।
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सेंट्रल स्टोर में सिंगल और डबल बेड की खादी चादरों की अच्छी मांग है। विभाग के मुताबिक, अकेले चादरों का सालाना कारोबार करीब 50 लाख रुपये है। यहां एक हजार से तीन हजार रुपये तक की कीमत वाली चादरें उपलब्ध हैं। वजन में हल्की होने के बावजूद गर्माहट देने की खासियत के कारण सर्दी शुरू होते ही इनकी मांग कई गुना बढ़ जाती है। यहां रजाई, गद्दे और तकिए भी तैयार किए जाते हैं।
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तीन राज्यों से गुजरकर तैयार होता है खादी का सफर
स्टोर में कार्यरत कमला सरन ने बताया कि खादी के वस्त्र तैयार करने में कई राज्यों की भूमिका है। कपड़ों का वास्तविक निर्माण गांधी आश्रम में होता है। इसके बाद रंगाई और छपाई के लिए कच्चे कपड़े को गुजरात के अहमदाबाद भेजा जाता है। रंगाई के बाद धुलाई के लिए इसे पश्चिम बंगाल के अकबरपुर भेजा जाता है। वहां से कपड़ा वापस आनंदनगर लाया जाता है, जहां कारीगर कुर्ता-पायजामा, शर्ट, जैकेट और टोपी जैसे उत्पाद तैयार करते हैं।
धोती-गमछे से सरसों के तेल तक, रोजगार का आधार
कामगार राम प्रीत यादव के मुताबिक, यहां चादरों के अलावा रजाई, गद्दे, तकिया, कुर्ता-पायजामा, शर्ट का कपड़ा, पॉली खादी, धोती और गमछा भी लोकप्रिय हैं। स्टोर में सरसों के तेल और अगरबत्ती का उत्पादन भी होता है। यहां करीब 80 लोगों को रोजगार मिला है, जिनमें महिलाओं की संख्या अधिक है। वे सिलाई, कताई और पैकेजिंग के काम में जुटी हैं।
बोले प्रबंधक
खादी सिर्फ कपड़ा नहीं बल्कि विचार है। हम प्रधानमंत्री के ‘वोकल फॉर लोकल’ और मुख्यमंत्री के खादी अपनाओ अभियान के तहत कार्य कर रहे हैं। पीएम के आह्वान के बाद आज युवाओं में भी खादी का क्रेज है। सर्दी से पहले विभिन्न राज्यों से मिली मांग के अनुसार रजाई और गद्दे भेजे जा रहे हैं।
- रामसूरत सिंह यादव, क्षेत्रीय प्रबंधक, गांधी आश्रम, गोरखपुर