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Maharajganj News: भरा-पूरा परिवार फिर भी वृद्धाश्रम में काट रहे जिंदगी

Sat, 22 Aug 2026 01:53 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sat, 22 Aug 2026 01:53 AM IST
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Despite having a large, complete family, they are spending their lives in an old-age home.
राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस (21 अगस्त) पर विशेष
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बुजुर्गों को अपनों की तलाश, वीडियो कॉल से ही होती है बात
बुजुर्गों ने आश्रम को ही मान लिया है परिवार, अपने नहीं करते हैं याद
फरेंदा। मां-बाप की उंगलियां पकड़कर जिंदगी का फलसफा सीखने वाले कुछ लोगों ने उन्हें बोझ समझ वृद्धाश्रम पहुंचा दिया है। वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्गों के पास कहने को तो बेटा-बेटी, बहू-पौत्रों से भरा-पूरा परिवार है। लेकिन यह सब इनके पास नहीं हैं। अपने बच्चों ने भले ही इन्हें बेसहारा छोड़ दिया हो लेकिन इन बुजुर्गों की जुबां पर कभी बद्दुआ नहीं आती। कुछ बुजुर्ग दो समय के भोजन की तलाश में भी यहां पहुंच गए हैं।
फरेंदा में संचालित आधारशिला वृद्धाश्रम गनेशपुर में रहने वाले बुजुर्गों की जिंदगी समाज को सोचने पर मजबूर करती है। किसी ने बच्चों को पढ़ाने के लिए अपना सुख त्याग दिया तो किसी ने घर बनाने और परिवार को संभालने में पूरी जिंदगी लगा दी। समय बदला और बेटे जब अपने पैरों पर खड़े हुए तो इनकी प्राथमिकता में खुद के बीबी-बच्चे तो शामिल हो गए लेकिन इनके घरों में बुजुर्ग मां-बाप के लिए कोई जगह नहीं बची।
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वृद्धाश्रम में रहने वाले बुजुर्गों को सुविधाओं की कमी से ज्यादा अपनों की कमी परेशान करती है। बुजुर्गों को भावनात्मक सहारे की जरूरत है लेकिन फिलहाल अपने बच्चों से उन्हें यह नहीं मिल रही। त्योहारों पर जब दूसरे लोग अपने परिवार के साथ खुशियां बांटते हैं, तब यहां कई बुजुर्ग पुराने दिनों को याद करते हैं। किसी को बेटे के फोन का इंतजार रहता है तो कोई पोते-पोतियों की तस्वीर देखकर मन बहलाता है।
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कैंपियरगंज क्षेत्र के शिवपुर निवासी श्रीपत ने कहा कि बच्चों को बड़ा करने में पूरी जिंदगी लगा दी। कभी नहीं सोचा था कि बुढ़ापे में अपने ही घर से दूर रहना पड़ेगा। जरूरत अब धन की नहीं, अपनों के दो शब्द और साथ की है। परिवार में एक बेटा व एक बेटी है। अपने ही घर में सम्मान न मिल पाने पर खुद को उपेक्षित महसूस करता था। समय से भोजन नही मिलता था, बेटा बाहर मजदूरी करता था। इसलिए वृद्धाश्रम की जानकारी हुई तो करीब 16 माह से यहीं पर रहकर जिंदगी काट रहा हूं। बेटे को आशीर्वाद है कि वह जहां है वहां खुश रहे।
कोल्हुई क्षेत्र के रामप्रकाश ने बताया कि करीब तीन वर्ष से वृद्धाश्रम में जीवन जी रहे है। घर में एक बेटा है जो परिवार के साथ मुंबई रहता है। घर पर देखभाल करने वाला कोई नहीं है। बेटा मुंबई रहने के लिए बुलाता है लेकिन अब आश्रम ही अपना घर लगता है। यही अपना परिवार है। इन्हीं के बीच जिंदगी बीत जाए यही कामना है।
कोल्हुई क्षेत्र के रहने वाली सुशीला देवी ने अपनी पीड़ा बयां करते हुए बताया कि घर पर दो बेटे हैं। एक ने धोखे से मकान तो दूसरे ने चल संपत्ति ले ली। जब इस संबंध में बात किया तो बेटे ने दुत्कार कर भगा दिया। कहा कि जहां जाना हो जा सकती है। बेटे मानसिक उत्पीड़न भी करते थे। पति कोऑपरेटिव बैंक में सर्विस करते थे। उनके देहांत के बाद छोटा बेटा नौकरी करता है। बड़ा बेटा मोबाइल की दुकान चलाता है। कोई पूछता तक नहीं है। फिर भी बेटे हैं इसलिए बद्ददुआ नहीं दे सकती।
फरेंदा क्षेत्र की अपिअवना देवी के तीन बेटे व बेटियां हैं। करीब सात वर्षो से वृद्धाश्रम में रह रही है। उन्होंने बताया कि घर पर उचित देखभाल न हो पाने के कारण आश्रम में जिंदगी जीने को विवश है। बेटियाें की शादी हो गई है। बेटे मजदूरी करके गुजर करते हैं। कभी बच्चों का मोह लगता है तो उनसे मिलने चली जाती हूं। जब बच्चों के मन में आएगा तब यहां से घर ले चलेंगे। अब तो यही अपना घर लगता है।
वर्जन
बुजुर्गों की उचित देखभाल करना सबसे पहली प्राथमिकता होती है। बुजुर्गों की समस्याएं भी बहुत होती हैं। उनके पैरों में दर्द, तबीयत खराब होने पर देखभाल करना तथा भोजन का प्रबंधन काफी चुनौती भरा काम है। समय-समय पर उनके सेहत की जांच भी कराई जाती है।

- प्रदीप कटियार, प्रबंधक, आधारशिला वृद्धाश्रम
बुजुर्गों की देखभाल केवल आर्थिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि सभी का भावनात्मक दायित्व भी है। उम्र बढ़ने के साथ व्यक्ति को सम्मान, सुरक्षा और परिवार के साथ की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। बच्चों का थोड़ी देर उनके पास बैठना, उनकी बातें सुनना और समय-समय पर हालचाल लेना ही उनके लिए सबसे अच्छी मानसिक थेरेपी होती है।
-डॉ. मुकलेश्वरी गुप्ता, प्रवक्ता, समाजशास्त्र
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