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Lalitpur News: सिंचाई और पेयजल के लिए कुओं से मिलेगा पानी
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संवाद न्यूज एजेंसी
ललितपुर। बुंदेलखंड के पथरीले इलाके में कभी सिंचाई और पेयजल के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले कुओं से अब पानी मिलेगा। मनरेगा विभाग प्रत्येक ब्लॉक में दस-दस कुओं का जीर्णोद्धार कर उन्हें उपयोगी बनाएगा या नए कुओं की खुदाई कराएगा। कुओं को चिह्नित किया जा रहा है।
जिले में बड़ा भू-भाग पथरीला है। पूर्व में पेयजल व सिंचाई के लिए गांव-गांव और खेतों पर कुआं होते थे। ये कुएं गांवों में न सिर्फ जलस्रोत थे, बल्कि सामुदायिक सभाओं के केंद्र भी होते थे। ऐतिहासिक रूप से ये कुएं गांवों की संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से जुड़े रहते थे। खुले कुएं बरसात के पानी को सोखने और भूजल स्तर बनाए रखने में मदद करते थे।
गर्मी के मौसम या सूखे के दौरान जब नदियां और तालाब सूख जाते थे, तब ये कुएं पानी का स्थायी स्रोत बने रहते थे। लेकिन, समय के साथ कुओं में पानी कम हुआ और लोगों ने बोरिंग कराकर ट्यूबवेल को सिंचाई का साधन बना लिया। वहीं, पेयजल के लिए गांव व घरों में हैंडपंप लगवा लिया। इस कारण इन कुओं की देखरेख नहीं हुई और यह उपेक्षित हो गए। कई कुएं तो अपना अस्तित्व खो चुके हैं। अब इन कुओं का जीर्णोद्धार कर एकबार फिर उपयोगी बनाने की पहल की जा रही है।
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मनरेगा के तहत प्रत्येक ब्लॉक में दस-दस कुओं का निर्माण होगा। कुओं का जीर्णोद्धार होने से किसानों और गांव के लोगों को पानी के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा।
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अमृत सरोवरों की तर्ज पर होगा काम
कुओं का जीर्णोद्धार या निर्माण अमृत सरोवरों की तर्ज पर किया जाएगा। इन कुओं को ढकने की व्यवस्था की जाएगी। घाट भी बनाया जाएगा। इन पर पेंटिंग करने के साथ लोगों के बैठने के लिए चबूतरा निर्मित किया जाएगा।
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मनरेगा के तहत प्रत्येक ब्लॉक में दस-दस कुओं का निर्माण और जीर्णोद्धार किया जाएगा। ब्लॉक स्तर पर इनको चिह्नित किया जा रहा है।
रमेश कुमार यादव, डीसी मनरेगा
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ललितपुर। बुंदेलखंड के पथरीले इलाके में कभी सिंचाई और पेयजल के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले कुओं से अब पानी मिलेगा। मनरेगा विभाग प्रत्येक ब्लॉक में दस-दस कुओं का जीर्णोद्धार कर उन्हें उपयोगी बनाएगा या नए कुओं की खुदाई कराएगा। कुओं को चिह्नित किया जा रहा है।
जिले में बड़ा भू-भाग पथरीला है। पूर्व में पेयजल व सिंचाई के लिए गांव-गांव और खेतों पर कुआं होते थे। ये कुएं गांवों में न सिर्फ जलस्रोत थे, बल्कि सामुदायिक सभाओं के केंद्र भी होते थे। ऐतिहासिक रूप से ये कुएं गांवों की संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से जुड़े रहते थे। खुले कुएं बरसात के पानी को सोखने और भूजल स्तर बनाए रखने में मदद करते थे।
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गर्मी के मौसम या सूखे के दौरान जब नदियां और तालाब सूख जाते थे, तब ये कुएं पानी का स्थायी स्रोत बने रहते थे। लेकिन, समय के साथ कुओं में पानी कम हुआ और लोगों ने बोरिंग कराकर ट्यूबवेल को सिंचाई का साधन बना लिया। वहीं, पेयजल के लिए गांव व घरों में हैंडपंप लगवा लिया। इस कारण इन कुओं की देखरेख नहीं हुई और यह उपेक्षित हो गए। कई कुएं तो अपना अस्तित्व खो चुके हैं। अब इन कुओं का जीर्णोद्धार कर एकबार फिर उपयोगी बनाने की पहल की जा रही है।
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मनरेगा के तहत प्रत्येक ब्लॉक में दस-दस कुओं का निर्माण होगा। कुओं का जीर्णोद्धार होने से किसानों और गांव के लोगों को पानी के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा।
अमृत सरोवरों की तर्ज पर होगा काम
कुओं का जीर्णोद्धार या निर्माण अमृत सरोवरों की तर्ज पर किया जाएगा। इन कुओं को ढकने की व्यवस्था की जाएगी। घाट भी बनाया जाएगा। इन पर पेंटिंग करने के साथ लोगों के बैठने के लिए चबूतरा निर्मित किया जाएगा।
मनरेगा के तहत प्रत्येक ब्लॉक में दस-दस कुओं का निर्माण और जीर्णोद्धार किया जाएगा। ब्लॉक स्तर पर इनको चिह्नित किया जा रहा है।
रमेश कुमार यादव, डीसी मनरेगा