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Lalitpur News: नाम का ट्राॅमा सेंटर...मरहम-पट्टी कर भेज दिया जाता हायर सेंटर
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संवाद न्यूज एजेंसी
ललितपुर। जनपद में दुर्घटना में घायल मरीजों का उपचार दस्तावेजों तक सीमित होकर रह गया है। इन मरीजों के उपचार के लिए बना ट्राॅमा सेंटर विशेषज्ञों व स्टाफ की कमी से जूझ रहा है। वर्तमान में धरातल पर महज भवन ही सीमित रह गया है। मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने इमरजेंसी वार्ड संचालित कर दिया है। इससे आने वाले मरीजों को इमरजेंसी से प्राथमिक उपचार के बाद रेफर कर दिया जाता है।
जिले की सीमा से निकले झांसी-सागर हाईवे की लंबाई लगभग 100 किलोमीटर से अधिक है। सड़क किनारे लगभग 50 गांव बसे हुए हैं। सड़क पर दौड़ रहे तेज रफ्तार वाहनों से आए दिन सड़क दुर्घटनाएं होती हैं। इस तरह से एक माह में लगभग 30 दुर्घटनाओं में लोग गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं। इन घायलों को उपचार के लिए मेडिकल कॉलेज परिसर में करोड़ों रुपये की लागत से ट्राॅमा सेंटर बनाया गया है।
लेकिन, 14 वर्ष बीतने के बाद भी अब तक यहां मरीजों को उपचार नहीं मिल सका है। उपचार मिले भी तो कैसे, जब चिकित्सक ही नहीं हैं। छह विशेषज्ञों के सापेक्ष महज एक ही तैनात हैं, वहीं चार मेडिकल ऑफीसर के सापेक्ष महज एक ही तैनात हैं।
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84 अन्य स्टॉफ के सापेक्ष भी एक ही तैनात हैं। इससे अब तक ट्राॅमा सेंटर चालू तक नहीं हो सका है। ऐसे में दुर्घटनाओं में गंभीर रूप से घायल लोगों को मेडिकल कॉलेज स्थित इमरजेंसी वार्ड में ले जाना पड़ रहा है। जहां पर महज प्राथमिक उपचार ही मिल रहा है। इसके बाद मरीजों को रेफर कर दिया जाता है। समय से उपचार न मिलने से कई बार लोगों की जान तक चली जाती है। इसके बाद भी जिम्मेदार ध्यान नहीं दे रहे हैं।
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ललितपुर। जनपद में दुर्घटना में घायल मरीजों का उपचार दस्तावेजों तक सीमित होकर रह गया है। इन मरीजों के उपचार के लिए बना ट्राॅमा सेंटर विशेषज्ञों व स्टाफ की कमी से जूझ रहा है। वर्तमान में धरातल पर महज भवन ही सीमित रह गया है। मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने इमरजेंसी वार्ड संचालित कर दिया है। इससे आने वाले मरीजों को इमरजेंसी से प्राथमिक उपचार के बाद रेफर कर दिया जाता है।
जिले की सीमा से निकले झांसी-सागर हाईवे की लंबाई लगभग 100 किलोमीटर से अधिक है। सड़क किनारे लगभग 50 गांव बसे हुए हैं। सड़क पर दौड़ रहे तेज रफ्तार वाहनों से आए दिन सड़क दुर्घटनाएं होती हैं। इस तरह से एक माह में लगभग 30 दुर्घटनाओं में लोग गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं। इन घायलों को उपचार के लिए मेडिकल कॉलेज परिसर में करोड़ों रुपये की लागत से ट्राॅमा सेंटर बनाया गया है।
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लेकिन, 14 वर्ष बीतने के बाद भी अब तक यहां मरीजों को उपचार नहीं मिल सका है। उपचार मिले भी तो कैसे, जब चिकित्सक ही नहीं हैं। छह विशेषज्ञों के सापेक्ष महज एक ही तैनात हैं, वहीं चार मेडिकल ऑफीसर के सापेक्ष महज एक ही तैनात हैं।
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84 अन्य स्टॉफ के सापेक्ष भी एक ही तैनात हैं। इससे अब तक ट्राॅमा सेंटर चालू तक नहीं हो सका है। ऐसे में दुर्घटनाओं में गंभीर रूप से घायल लोगों को मेडिकल कॉलेज स्थित इमरजेंसी वार्ड में ले जाना पड़ रहा है। जहां पर महज प्राथमिक उपचार ही मिल रहा है। इसके बाद मरीजों को रेफर कर दिया जाता है। समय से उपचार न मिलने से कई बार लोगों की जान तक चली जाती है। इसके बाद भी जिम्मेदार ध्यान नहीं दे रहे हैं।