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कोरोना के चलते नहीं लगा मेला
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पाली में विराजमान नील कंठेश्वर भगवान
- फोटो : LALITPUR
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पाली। कस्बा पाली से तीन किमी दूर विंध्याचल पर्वत पर घने वन में स्थित श्री नीलकंठेश्वर मंदिर में इस बार गुरु पूर्णिमा पर कोरोना के कारण मेला नहीं लग सका। श्रद्धालुओं ने सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए भगवान के दर्शन किए।
मंदिर में काले बलुई पत्थर पर भगवान शिव की त्रिमुखी अद्भुत प्रतिमा है। प्रतिमा को दसवीं सदी में चंदेलकालीन राजाओं ने बनवाया था। प्रतिमा के ललाट पर नवग्रहों के साथ ब्रह्म, पालनहार विष्णु ओर कल्याणकारी शिव विराजमान हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार पर नीचे शिलाखंड पर हाथी व सिंह की आकृति को कलात्मक ढंग से उकेरा गया है। मंदिर के द्वार पर खजुराहो शैली के चित्र भी हैं। मंदिर में भगवान शिव की त्रिमुखी प्रतिमा के नीचे फर्श पर एकमुखी ज्योतिर्लिग स्थापित है। शिव भक्त इसे भगवान भोलेनाथ का अर्द्धनारीश्वर स्वरूप मानते हैं।
दाईं ओर भगवान शिव डमरू बजाते व हलाहल पीते दर्शाए गए हैं। बाईं ओर मां पार्वती विराजमान हैं। अद्भुत प्रतिमा के आठ हाथ दर्शाए गए हैं, जिनमें दंड, हलाहल, डमरू, माला, आइना, बिंदी, त्रिशूल व श्रीफल धारण किया हुआ है। कुछ श्रद्धालु इस त्रिमुखी प्रतिमा को ब्रह्मा, विष्णु, महेश के रूप में मानकर पूजते हैं।
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मंदिर के पीछे हिस्से में एक दरार है, यहां सिक्का रखकर अंगुली से धकेलने पर पीछे खजाने में गिरने जैसी आवाज आती है। यहां बंदर, लंगूर, हिरण, मोर व कई प्रकार के पशु-पक्षी देखे जा सकते हैं। मंदिर के आसपास जड़ी-बूटियों का भी अथाह भंडार है। महाशिवरात्रि, गुरुपूर्णिमा, मकर संक्रांति पर यहां मेला लगता है। लेकिन, इस बार कोरोना के कारण मेला नहीं लगा। इस कारण श्रद्धालुओं ने सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए भगवान के दर्शन किए।
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मंदिर में काले बलुई पत्थर पर भगवान शिव की त्रिमुखी अद्भुत प्रतिमा है। प्रतिमा को दसवीं सदी में चंदेलकालीन राजाओं ने बनवाया था। प्रतिमा के ललाट पर नवग्रहों के साथ ब्रह्म, पालनहार विष्णु ओर कल्याणकारी शिव विराजमान हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार पर नीचे शिलाखंड पर हाथी व सिंह की आकृति को कलात्मक ढंग से उकेरा गया है। मंदिर के द्वार पर खजुराहो शैली के चित्र भी हैं। मंदिर में भगवान शिव की त्रिमुखी प्रतिमा के नीचे फर्श पर एकमुखी ज्योतिर्लिग स्थापित है। शिव भक्त इसे भगवान भोलेनाथ का अर्द्धनारीश्वर स्वरूप मानते हैं।
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दाईं ओर भगवान शिव डमरू बजाते व हलाहल पीते दर्शाए गए हैं। बाईं ओर मां पार्वती विराजमान हैं। अद्भुत प्रतिमा के आठ हाथ दर्शाए गए हैं, जिनमें दंड, हलाहल, डमरू, माला, आइना, बिंदी, त्रिशूल व श्रीफल धारण किया हुआ है। कुछ श्रद्धालु इस त्रिमुखी प्रतिमा को ब्रह्मा, विष्णु, महेश के रूप में मानकर पूजते हैं।
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मंदिर के पीछे हिस्से में एक दरार है, यहां सिक्का रखकर अंगुली से धकेलने पर पीछे खजाने में गिरने जैसी आवाज आती है। यहां बंदर, लंगूर, हिरण, मोर व कई प्रकार के पशु-पक्षी देखे जा सकते हैं। मंदिर के आसपास जड़ी-बूटियों का भी अथाह भंडार है। महाशिवरात्रि, गुरुपूर्णिमा, मकर संक्रांति पर यहां मेला लगता है। लेकिन, इस बार कोरोना के कारण मेला नहीं लगा। इस कारण श्रद्धालुओं ने सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए भगवान के दर्शन किए।