कुंदनलाल को अविश्वास प्रस्ताव ने दो बार दिलाई अध्यक्षी

अमर उजाला ब्यूरो Updated Fri, 10 Nov 2017 12:28 AM IST
kundan lal
nagr palika, lalitpur news - फोटो : demo
नगर के प्रतिष्ठित जैन परिवार में जन्मे कुंदनलाल सर्राफ नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष पद की दौड़ में कभी शामिल नहीं रहे। इसके बाद भी नगर पालिका में ऐसा मोड़ आया, जब उन्हें अध्यक्ष पद के लिए आगे किया गया। वह दो बार नगर पालिका परिषद अध्यक्ष पदासीन रहे। उन्होंने अपने दो सूक्ष्म कार्यकाल में जनता के बीच गहरी छाप छोड़ी। कम समय में महीनों से लंबित दर्जनों नक्शे पास किए तो खड़ंजा के बीच डामर भरवाने का काम को सराहना मिली।

ललित टाकीज के पास रहने वाले कुंदनलाल सर्राफ आजादी के पहले से नगर पालिका के चुनाव में सक्रिय हो गए थे। उन्होंने छत्रसालपुरा, आजादपुरा व रावरपुरा से पार्षद पद का चुनाव लड़ा। इस तरह वे पालिका में लगातार सदस्य बनते रहे। वर्ष 1958 में चेयरमैन डा. शादीलाल दुबे के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया था। इस दौरान डा. दुबे की कुर्सी छिन गई। पालिका के उपाध्यक्ष होने के नाते मु. इस्माइल को अध्यक्ष का कामकाज संभालने का अवसर मिल गया। वर्ष 1964 में कुंदनलाल सर्राफ अगले अध्यक्ष चुन लिए गए। इस दौरान मकानों के नक्शे आसानी से पास नहीं होते थे। उन्होंने नक्शा पास करने में आ रही कठिनाइयों को समझा और वह खुद मौके पर पहुंचकर नक्शा पास करने लगे। उन्होंने करीब चार महीने के कार्यकाल में दर्जनों लंबित नक्शों को पास कर दिया। इस कार्य के लिए नगरवासी उन्हें आज भी याद करते हैं। वर्ष 1976 में चेयरमैन हरिहर नारायण चौबे के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित हो गया।

इसके बाद अगले चेयरमैन के जोड़तोड़ शुरू हो गई। हरिहर नारायण चौबे का गुट कामता प्रसाद सुड़ेले को अध्यक्ष पद पर नहीं देखना चाहता था। उन्होंने स्थिति को भांपते हुए कुंदनलाल सर्राफ को अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनने के लिए तैयार किया। इस दौरान उन्होंने मतों के गणित को समझाया। जिस पर वह राजी हो गए। उस दौरान कामता प्रसाद सुड़ेले और कुंदनलाल सर्राफ उम्मीदवार बने। जिसमें कामता प्रसाद सुड़ेले तीन वोट से हार गए थे। इसमें कामरेड चंदन सिंह व बलवंत सिंह सिसौदिया का पक्ष में मत करना और जगदीश चौबे द्वारा मतदान में प्रतिभाग नहीं करना उनके लिए अहम रहा। इस तरह कुंदनलाल सर्राफ दोबारा अध्यक्ष चुने गए थे। पूरी चुनाव की प्रक्रिया उस समय के एसडीएम डीपी सिंह के समक्ष अपनाई गई। हालांकि, दूसरा कार्यकाल पहले के मुकाबले काफी छोटा रहा।

इस संबंध में पुत्र अरविंद सर्राफ का कहना है कि उनके पिता को पालिका अध्यक्ष के तौर पर बड़ा कार्यकाल नहीं मिला, फिर भी उन्होंने जनता के हित में कई कार्य किए। उस दौरान बैलगाड़ी का चलन था। शहर के विभिन्न मार्गो पर बैलगाड़ी चलती दिखाई देती थी लेकिन कई बार रास्ते पर बिछे खंडजा के बीच में गैप में बैलगाड़ी का पहिया फंस जाता है। जब यह उनके संज्ञान में आई तो उन्होंने खड़ंजा के गैप में डामर भरवाया। इसके अलावा मकानों के नक्शों को द्रुत गति से पास किया।

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