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धरती का सीना छलनी कर बनाई जा रही चाइना बालू
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चाइना बालू
- फोटो : LALITPUR
सिलावन। तहसील महरौनी के ग्राम अगौरा में धरती का सीना छलनी करके बड़े पैमाने पर चाइना बालू (मिट्टी की बालू) का अवैध कारोबार फलफूल रहा है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में आर्टीफिशियल बालू इधर से उधर की जा रही है। इसका दायरा पांच किलोमीटर में फैला है, जहां भी नजर ठहरती है वहां बड़े-बड़े गड्ढे दिखाई देते हैं।
तहसील मुख्यालय पर प्रतिदिन कई ट्राली चाइना बालू का अवैध परिवहन हो रहा है, लेकिन अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लग रही है। आसपास के गांवों में भी यह बालू खपाई जा रही है। लेकिन, कोई कार्रवाई नहीं होने से इस कारोबार से जुड़े लोगों के हौंसले बुलंद हैं। वहीं इस तरह खनन से जहां आसपास का पर्यावरण प्रभावित हो रहा है, वहीं आसपास के किसानों के खेतों को भी वाहनों से रौंदा जा रहा है, लेकिन अधिकारियों का ध्यान इस ओर नहीं है।
तहसील मुख्यालय से करीब पांच किलोमीटर दूर ग्राम अगौरा अवैध बालू के कारोबार का गढ़ बन गया है। यहां जमीन को खोदकर मिट्टी को पानी के प्रेशर से धोकर बालू बनाई जा रही है, जिसे चाइना बालू का नाम दिया गया है। यहां का पांच किलोमीटर का क्षेत्र खुदाई करके छलनी कर दिया गया है। यहां से प्रतिदिन कई ट्राली चाइना बालू इधर से उधर की जा रही है। चाइना बालू नदी की बालू की अपेक्षा काफी सस्ती है। इस वजह से ग्रामीण इलाके के ग्राहक इसको खरीदना ज्यादा पसंद कर रहे हैं, लेकिन इसमें मिट्टी की मात्रा अधिक होने के कारण मकानों की गुणवत्ता पर असर पड़ रहा है।
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पांच सौ रुपये प्रति ट्राली आता है खर्च, बेची जा रही 3500 रुपये ट्राली
इस बालू को बनाने के लिए बमुश्किल पांच सौ रुपये प्रति ट्राली का खर्चा आता है, जबकि इसे तीन हजार से लेकर पैंतीस सौ रुपये प्रति ट्राली तक बेचा जा रहा है, जिसके चलते इस कारोबार से जुड़े लोग कुछ ही महीनों में मालामाल हो गए हैं। यह लोग सरकारी जमीन को छलनी करके इस कारोबार को संचालित कर रहे हैं, इससे न सिर्फ पर्यावरण प्रभावित हो रहा है बल्कि आसपास के किसानों के खेतों को ट्रैक्टर ट्रालियों से रौंदा जा रहा है, जिससे किसानों की फसलें भी प्रभावित हो रही हैं। किसान कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं। अगौरा गांव में हो रहे इस अवैध कारोबार की विभागीय अधिकारियों को भनक नहीं है, जिससे बेखौफ होकर यह अवैध कारोबार चल रहा है।
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ऐसे बनती है चाइना बालू
जमीन से मिट्टी को खोदकर उसे पंपसेट की मदद से पानी के प्रेशर से धोया जाता है। इससे मिट्टी बह जाती है और छोटे कंकड़ बच जाते हैं, जिसे इकट्ठा कर लिया जाता और इसी को चाइना बालू का नाम दिया गया है।
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ग्राम अगौरा में चाइना बालू बेचे जाने का मामला संज्ञान में आया है। इसकी जांच कर कार्रवाई की जाएगी।
- मुकेश मिश्रा, जिला खान निरीक्षक
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तहसील मुख्यालय पर प्रतिदिन कई ट्राली चाइना बालू का अवैध परिवहन हो रहा है, लेकिन अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लग रही है। आसपास के गांवों में भी यह बालू खपाई जा रही है। लेकिन, कोई कार्रवाई नहीं होने से इस कारोबार से जुड़े लोगों के हौंसले बुलंद हैं। वहीं इस तरह खनन से जहां आसपास का पर्यावरण प्रभावित हो रहा है, वहीं आसपास के किसानों के खेतों को भी वाहनों से रौंदा जा रहा है, लेकिन अधिकारियों का ध्यान इस ओर नहीं है।
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तहसील मुख्यालय से करीब पांच किलोमीटर दूर ग्राम अगौरा अवैध बालू के कारोबार का गढ़ बन गया है। यहां जमीन को खोदकर मिट्टी को पानी के प्रेशर से धोकर बालू बनाई जा रही है, जिसे चाइना बालू का नाम दिया गया है। यहां का पांच किलोमीटर का क्षेत्र खुदाई करके छलनी कर दिया गया है। यहां से प्रतिदिन कई ट्राली चाइना बालू इधर से उधर की जा रही है। चाइना बालू नदी की बालू की अपेक्षा काफी सस्ती है। इस वजह से ग्रामीण इलाके के ग्राहक इसको खरीदना ज्यादा पसंद कर रहे हैं, लेकिन इसमें मिट्टी की मात्रा अधिक होने के कारण मकानों की गुणवत्ता पर असर पड़ रहा है।
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पांच सौ रुपये प्रति ट्राली आता है खर्च, बेची जा रही 3500 रुपये ट्राली
इस बालू को बनाने के लिए बमुश्किल पांच सौ रुपये प्रति ट्राली का खर्चा आता है, जबकि इसे तीन हजार से लेकर पैंतीस सौ रुपये प्रति ट्राली तक बेचा जा रहा है, जिसके चलते इस कारोबार से जुड़े लोग कुछ ही महीनों में मालामाल हो गए हैं। यह लोग सरकारी जमीन को छलनी करके इस कारोबार को संचालित कर रहे हैं, इससे न सिर्फ पर्यावरण प्रभावित हो रहा है बल्कि आसपास के किसानों के खेतों को ट्रैक्टर ट्रालियों से रौंदा जा रहा है, जिससे किसानों की फसलें भी प्रभावित हो रही हैं। किसान कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं। अगौरा गांव में हो रहे इस अवैध कारोबार की विभागीय अधिकारियों को भनक नहीं है, जिससे बेखौफ होकर यह अवैध कारोबार चल रहा है।
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ऐसे बनती है चाइना बालू
जमीन से मिट्टी को खोदकर उसे पंपसेट की मदद से पानी के प्रेशर से धोया जाता है। इससे मिट्टी बह जाती है और छोटे कंकड़ बच जाते हैं, जिसे इकट्ठा कर लिया जाता और इसी को चाइना बालू का नाम दिया गया है।
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ग्राम अगौरा में चाइना बालू बेचे जाने का मामला संज्ञान में आया है। इसकी जांच कर कार्रवाई की जाएगी।
- मुकेश मिश्रा, जिला खान निरीक्षक