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मन के साथ तन की पवित्रता जरूरी -आर्जव सागर
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क्षेत्रपाल मंदिर परिसर में विराजमान आचार्य आर्जव सागर महाराज
- फोटो : LALITPUR
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ललितपुर। धर्म का संबंध आत्मा की पवित्रता में है, लोक व्यवहार में यह भी बहुत जरूरी है कि तन की पवित्रता के साथ मन की पवित्रता होनी चाहिए। लोग लोभ के माध्यम से ही संसार को बढ़ाते चले जाते हैं। इस संसार रूपी सागर से पार होने के लिए हमें लोभ को तजना होगा। यह बात आचार्य आर्जव सागर महाराज ने क्षेत्रपाल मंदिर परिसर में उत्तम शौच धर्म पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कही।
उन्होंने कहा कि जब हम धर्म करेंगे तो पाप काम नहीं करेंगे और पुण्य कर्म अपने आप ही प्राप्त हो जाएगा व अच्छी गति को पाएंगे। व्यक्ति लोभ के माध्यम से जीवन को बर्बाद कर देते हैं। हमें लोभ को छोड़कर उत्तम शौच धर्म धारण करना चाहिए। आचार्य ने कहा शरीर में ममता रहित भाव होना ही उत्तम शौच धर्म है। बुधवार की सुबह आचार्य एवं संघस्थ मुनि श्री महान सागर, मुनि भाग्य सागर, मुनि महत्त सागर, मुनि विलोक सागर, मुनि विवोध सागर, मुनि विदित सागर, मुनि विभोर सागर महाराज के समक्ष तत्वार्थ सूत्र का वाचन सुनीता नायक द्वारा हुआ। जिसमें अर्घ्य समर्पण विकल्प जैन खनियाधाना द्वारा अर्पित किए गए। जैन पंचायत अध्यक्ष अनिल जैन अंचल ने आचार्य को श्रीफल अर्पित कर श्रावकों से आग्रह किया कि वह घरों पर रहकर ही संयम साधना और पूजन विधान कर आत्म साधना के पर्व को मनाए।
आचार्य आर्जव सागर महाराज के 53वें अवतरण दिवस पर सुधा कलश महिला मंडल ने आचार्य का पूजन कर उन्हें शास्त्र भेंट किया। मध्यान्ह में आचार्य ने संघस्थ मुनि को जैन धर्म का मर्म तत्वार्थ सूत्र के वाचन द्वारा बताया।
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पर्युषण पर्व पर जैन मंदिरों में श्रद्धालुओं ने दर्शन और पूजन कर मंत्रों की जाप किया।दयोदय पशुसंरक्षण केंद्र गोशाला में विराजमान श्रमण मुनि सुप्रभ सागर ने उत्तम शौच धर्म को बताते हुए कहा अगर आपने हिंसा झूठ चोरी परिग्रह कुशील को छोड़ दिया यह सबसे बडा पुण्य एवं धर्म है। मुनि ने अनेक प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से शौच धर्म को समझाया। इसके पूर्व प्रात:काल मुनि के सानिध्य में ऑनलाइन ध्यान कराया गया। संघस्थ मुनि प्रणत सागर ने श्रावकों द्वारा की गई जिज्ञासाओं को रखा जिसका निर्देशन ब्रह्मचारी साकेत ने किया।
मोह बढ़ता है तो जीवन का नाश होता है
आदिनाथ मंदिर नईबस्ती में शिष्य मुनि विनिश्चल सागर महाराज ने कहा लोभ से क्रोध उत्पन्न होता है। मोह बढ़ता है तो जीवन का नाश होता है। लोभ ही सभी पापों का कारण है और पापों का मूल है मनुष्य को इससे बचना चाहिए। बाहुबलि नगर में विराजमान आचार्य आर्जव सागर महाराज की प्रभावक शिष्या आर्यिका प्रतिभामति और आर्यिका सुयोगमति माताजी ने कहा लोभ की जैसे-जैसे वृद्धि होती है और यही लोभ एक दिन इच्छा और इच्छा से तृष्णा में बदल जाता है जिस तृष्णा की पूर्ति कर पाना संभव नहीं है। लोभ को समस्त अपवित्रता का आधार बताते हुए उन्होंने इसको तजने की प्रेरणा दी।
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उन्होंने कहा कि जब हम धर्म करेंगे तो पाप काम नहीं करेंगे और पुण्य कर्म अपने आप ही प्राप्त हो जाएगा व अच्छी गति को पाएंगे। व्यक्ति लोभ के माध्यम से जीवन को बर्बाद कर देते हैं। हमें लोभ को छोड़कर उत्तम शौच धर्म धारण करना चाहिए। आचार्य ने कहा शरीर में ममता रहित भाव होना ही उत्तम शौच धर्म है। बुधवार की सुबह आचार्य एवं संघस्थ मुनि श्री महान सागर, मुनि भाग्य सागर, मुनि महत्त सागर, मुनि विलोक सागर, मुनि विवोध सागर, मुनि विदित सागर, मुनि विभोर सागर महाराज के समक्ष तत्वार्थ सूत्र का वाचन सुनीता नायक द्वारा हुआ। जिसमें अर्घ्य समर्पण विकल्प जैन खनियाधाना द्वारा अर्पित किए गए। जैन पंचायत अध्यक्ष अनिल जैन अंचल ने आचार्य को श्रीफल अर्पित कर श्रावकों से आग्रह किया कि वह घरों पर रहकर ही संयम साधना और पूजन विधान कर आत्म साधना के पर्व को मनाए।
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आचार्य आर्जव सागर महाराज के 53वें अवतरण दिवस पर सुधा कलश महिला मंडल ने आचार्य का पूजन कर उन्हें शास्त्र भेंट किया। मध्यान्ह में आचार्य ने संघस्थ मुनि को जैन धर्म का मर्म तत्वार्थ सूत्र के वाचन द्वारा बताया।
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पर्युषण पर्व पर जैन मंदिरों में श्रद्धालुओं ने दर्शन और पूजन कर मंत्रों की जाप किया।दयोदय पशुसंरक्षण केंद्र गोशाला में विराजमान श्रमण मुनि सुप्रभ सागर ने उत्तम शौच धर्म को बताते हुए कहा अगर आपने हिंसा झूठ चोरी परिग्रह कुशील को छोड़ दिया यह सबसे बडा पुण्य एवं धर्म है। मुनि ने अनेक प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से शौच धर्म को समझाया। इसके पूर्व प्रात:काल मुनि के सानिध्य में ऑनलाइन ध्यान कराया गया। संघस्थ मुनि प्रणत सागर ने श्रावकों द्वारा की गई जिज्ञासाओं को रखा जिसका निर्देशन ब्रह्मचारी साकेत ने किया।
मोह बढ़ता है तो जीवन का नाश होता है
आदिनाथ मंदिर नईबस्ती में शिष्य मुनि विनिश्चल सागर महाराज ने कहा लोभ से क्रोध उत्पन्न होता है। मोह बढ़ता है तो जीवन का नाश होता है। लोभ ही सभी पापों का कारण है और पापों का मूल है मनुष्य को इससे बचना चाहिए। बाहुबलि नगर में विराजमान आचार्य आर्जव सागर महाराज की प्रभावक शिष्या आर्यिका प्रतिभामति और आर्यिका सुयोगमति माताजी ने कहा लोभ की जैसे-जैसे वृद्धि होती है और यही लोभ एक दिन इच्छा और इच्छा से तृष्णा में बदल जाता है जिस तृष्णा की पूर्ति कर पाना संभव नहीं है। लोभ को समस्त अपवित्रता का आधार बताते हुए उन्होंने इसको तजने की प्रेरणा दी।