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बिजली न पानी, कैसे हो चंदन वन की निगहबानी
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बार। बार ब्लॉक मुख्यालय पर स्थित चंदन वन की हालत खस्ता है। एक जमाना था जब चंदन वन वास्तव में चंदन के पेड़ों से लहलहाता था, लेकिन देखरेख के अभाव और लापरवाही के कारण चंदन वन अब सिर्फ नाम का रह गया है। यहां के रेस्ट हाउस में न तो बिजली है और न पानी है, इस कारण यहां पर कोई आता-जाता नहीं है। चंदन वन में कभी सैकड़ों की तादाद में चंदन के पेड़ थे और लोगों के लिए चंदन वन आकर्षण का केंद्र था। इस वन में चीतल, बंदर, नीलगाय, सियार, लकड़बग्घा, हिरण, सांभर जानवर थे। चंदन के पेड़ देखने के लिए यहां पर लोगों का आना-जाना था। 20 साल पहले चंदन के पेड़ों की गणना हुई थी, तब 22 सौ पड़े थे, लेकिन विभागीय लापरवाही का इतना ज्यादा प्रभाव पड़ा कि अब बमुश्किल 22 पेड़ हैं। इन पेड़ों की भी देखरेख नहीं हो रही है, इस कारण आने वाले समय में इनका नामोनिशान मिट जाएगा। टोड़ी वन क्षेत्र करीब पांच किलोमीटर में फैला है। लेकिन, देखरेख की कमी के कारण जंगली जानवरों की मौत का साया मंडराता रहता है। अब यहां पर केवल चीतल, बंदर, सियार और नीलगायें ही शेष बचीं हैं।
वन विभाग ने यहां पर वर्ष 1966 में वन विश्रामगृह का निर्माण करीब 200 मीटर की ऊंची पहाड़ी पर कराया था। यहां तक पहुंचने के लिए टेढ़ी-मेढ़ी घुमावदार सड़क का निर्माण भी हुआ था। वन विश्राम गृह में दो शयनकक्ष, रसोई गृह, बैठक, बरामदा एवं डायनिंग हॉल का निर्माण हुआ था। उस समय विश्राम गृह की फुलवारी, घास की सुंदरता को देखकर लोग आश्चर्यचकित रह जाते थे। जब घूमने वाले लोग बाहर से मेहमानों को लेकर चंदन वन के रेस्ट हाउस पर पहुंचते थे तो रेस्टहाउस से एक तरफ तालाब और दूसरी तरफ घना जंगल देखकर लोग चंदन वन को बुंदेलखंड का शिमला की संज्ञा देते थे। जंगल की निगहबानी के लिए कर्मचारी तैनात थे।
लेकिन, धीर- धीरे वर्ष 2000 में वन विश्राम गृह खस्ताहालत में पहुंच गया। प्रदेश के तत्कालीन वनमंत्री राजधारी सिंह ने विश्राम गृह के जीर्णोद्धार के लिए विभाग को पांच लाख रुपये आवंटित कर विश्रामगृह की सुंदरता को लौटाने का काम किया था। भवन की छत की मरम्मत एवं पानी की कमी को दूर कराया गया था। जेनरेेटर की व्यवस्था की गई थी और ऊपर चढ़ाई के लिए सड़क पर पत्थर बिछाए गए थे। कुछ दिनों तक तो स्थिति ठीक रही, लेकिन इसके बाद वन विश्राम गृह के रखरखाव पर एक पैसा खर्च नहीं किया गया। अब आलम यह है कि विश्रामगृह में पानी की एक भी बूंद नहीं है। छत एवं खिड़कियों का सीमेंट टूट कर गिर रहा है। बिजली के बोर्ड टूटे पड़े हैं। ऊपर की चढ़ाई वली सड़क पूरी तरह जगह-जगह से टूट गई है। सड़क पर चलते समय यदि थोड़ी सी असावधानी हो जाए तो सैकड़ों फीट गहराई में गिर सकते हैं।
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कभी इस वन में बाहर का कोई नेता या अधिकारी एक बार आ जाए तो प्राकृतिक सौंदर्य को भूलता नहीं था, किंतु आज आलम यह है कि यहां कुछ नहीं है। स्थानीय लोग प्रशासन से बार-बार मांग कर रहे हैं कि चंदन वन की तार फेंसिंग सही से कराई जाए। जंगली जानवरों को पीने का पानी गर्मियों में मुहैया कराया जाए, जिससे जानवरों का जंगल से पलायन रुक सके और जंगली जानवरों से जंगल के किनारे वाले किसानों की फसल उजड़ने से रुक सके।
चार साल से वन विश्राम गृह के रखरखाव के लिए किसी प्रकार का बजट नहीं मिला है। वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए पानी की व्यवस्था टैंकरों के माध्यम से अपनी जेब से करनी पड़ रही है। शासन को लिखा गया, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ।
- बीडी नौटियाल, वन क्षेत्राधिकारी
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वन विभाग ने यहां पर वर्ष 1966 में वन विश्रामगृह का निर्माण करीब 200 मीटर की ऊंची पहाड़ी पर कराया था। यहां तक पहुंचने के लिए टेढ़ी-मेढ़ी घुमावदार सड़क का निर्माण भी हुआ था। वन विश्राम गृह में दो शयनकक्ष, रसोई गृह, बैठक, बरामदा एवं डायनिंग हॉल का निर्माण हुआ था। उस समय विश्राम गृह की फुलवारी, घास की सुंदरता को देखकर लोग आश्चर्यचकित रह जाते थे। जब घूमने वाले लोग बाहर से मेहमानों को लेकर चंदन वन के रेस्ट हाउस पर पहुंचते थे तो रेस्टहाउस से एक तरफ तालाब और दूसरी तरफ घना जंगल देखकर लोग चंदन वन को बुंदेलखंड का शिमला की संज्ञा देते थे। जंगल की निगहबानी के लिए कर्मचारी तैनात थे।
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लेकिन, धीर- धीरे वर्ष 2000 में वन विश्राम गृह खस्ताहालत में पहुंच गया। प्रदेश के तत्कालीन वनमंत्री राजधारी सिंह ने विश्राम गृह के जीर्णोद्धार के लिए विभाग को पांच लाख रुपये आवंटित कर विश्रामगृह की सुंदरता को लौटाने का काम किया था। भवन की छत की मरम्मत एवं पानी की कमी को दूर कराया गया था। जेनरेेटर की व्यवस्था की गई थी और ऊपर चढ़ाई के लिए सड़क पर पत्थर बिछाए गए थे। कुछ दिनों तक तो स्थिति ठीक रही, लेकिन इसके बाद वन विश्राम गृह के रखरखाव पर एक पैसा खर्च नहीं किया गया। अब आलम यह है कि विश्रामगृह में पानी की एक भी बूंद नहीं है। छत एवं खिड़कियों का सीमेंट टूट कर गिर रहा है। बिजली के बोर्ड टूटे पड़े हैं। ऊपर की चढ़ाई वली सड़क पूरी तरह जगह-जगह से टूट गई है। सड़क पर चलते समय यदि थोड़ी सी असावधानी हो जाए तो सैकड़ों फीट गहराई में गिर सकते हैं।
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कभी इस वन में बाहर का कोई नेता या अधिकारी एक बार आ जाए तो प्राकृतिक सौंदर्य को भूलता नहीं था, किंतु आज आलम यह है कि यहां कुछ नहीं है। स्थानीय लोग प्रशासन से बार-बार मांग कर रहे हैं कि चंदन वन की तार फेंसिंग सही से कराई जाए। जंगली जानवरों को पीने का पानी गर्मियों में मुहैया कराया जाए, जिससे जानवरों का जंगल से पलायन रुक सके और जंगली जानवरों से जंगल के किनारे वाले किसानों की फसल उजड़ने से रुक सके।
चार साल से वन विश्राम गृह के रखरखाव के लिए किसी प्रकार का बजट नहीं मिला है। वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए पानी की व्यवस्था टैंकरों के माध्यम से अपनी जेब से करनी पड़ रही है। शासन को लिखा गया, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ।
- बीडी नौटियाल, वन क्षेत्राधिकारी