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अहंकारी व्यक्ति स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने में देर नहीं करता: भारद्वाज
Sat, 08 Jun 2019 02:23 AM IST
देवेंद्र कुमार
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो
Published by: देवेंद्र कुमार
Updated Sat, 08 Jun 2019 02:23 AM IST
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shri mad bhagwat katha, lalitpur
- फोटो : amar ujala, lalitpur news
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कस्बे स्थित समदुआ मंदिर में श्रीमद्भागवत कथा की शोभायात्रा के साथ शुभारंभ हुआ। कथा के रसास्वादन के लिए बड़ी संख्या में कथा प्रेमी वहां पहुंच कर धर्मलाभ लेते हुए भक्ति भजनों पर जमकर झूम रहे हैं ।
कथा व्यास भारद्वाज महाराज ने कथा में ध्रुव की अटल तपस्या, युधिष्ठिर द्वारा प्रश्न, पांडवों की वंशवली का बड़ा ही सुंदर वर्णन किया। उन्होंने कहा कि अहंकार एक ऐसी संग्रह वृत्ति है, जो विषधर के समान है। जो मनुष्य अहंकारी होता है, वह संसार में अपने आप को अत्यंत महत्वपूर्ण समझता है। ऐसा प्राणी यदि थोड़ी सी भी सफलता प्राप्त कर लेता है, तो स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगता है। अहंकारी अपने पद-प्रतिष्ठा, धन- संपत्ति, शक्ति, जाति, वंश, तपस्या, सिद्धि तथा उपलब्धियों के आधार पर अपने आप को दूसरे लोगों की तुलना में अधिक श्रेष्ठ समझता है। ऐसा व्यक्ति सदा यही इच्छा करता है कि लोग उसकी प्रशंसा करें तथा उसे अधिक सम्मान दें।
वह दूसरे लोगों पर अपना आधिपत्य जमाना चाहता है तथा उन्हें अपनी इच्छानुसार चलाना चाहता है। वह अपनी आलोचना सुनना पसंद नहीं करता। यदि कोई दूसरा व्यक्ति उसका विरोध करता है तो वह उससे प्रतिशोध लेने पर उतर आता है। अहंकार मनुष्य को पतन के मार्ग पर ले जाता है। ऐसे व्यक्ति को सदैव याद रखना चाहिए कि परमात्मा के सिवाय अन्य कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है और न ही स्थायी है। जिन विशेषताओं तथा उपलब्धियों पर आज वह गर्व कर रहा है उन्हें नष्ट होने में क्षणमात्र भी नहीं लगेगा। इस अवसर पर रेखा, गीता, निशा, पार्वती, वर्षा, निशा, गुड्डी, लीला, शीलरानी, ममता, सुमन, विमल कुमार, दीपक, श्रीराम, मनमोहन, हक्की, भागीरथ, शिवराम, महेंद्र, ब्रजेश, राजू, नारान, अंनतराम आदि मौजूद रहे ।
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कथा व्यास भारद्वाज महाराज ने कथा में ध्रुव की अटल तपस्या, युधिष्ठिर द्वारा प्रश्न, पांडवों की वंशवली का बड़ा ही सुंदर वर्णन किया। उन्होंने कहा कि अहंकार एक ऐसी संग्रह वृत्ति है, जो विषधर के समान है। जो मनुष्य अहंकारी होता है, वह संसार में अपने आप को अत्यंत महत्वपूर्ण समझता है। ऐसा प्राणी यदि थोड़ी सी भी सफलता प्राप्त कर लेता है, तो स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगता है। अहंकारी अपने पद-प्रतिष्ठा, धन- संपत्ति, शक्ति, जाति, वंश, तपस्या, सिद्धि तथा उपलब्धियों के आधार पर अपने आप को दूसरे लोगों की तुलना में अधिक श्रेष्ठ समझता है। ऐसा व्यक्ति सदा यही इच्छा करता है कि लोग उसकी प्रशंसा करें तथा उसे अधिक सम्मान दें।
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वह दूसरे लोगों पर अपना आधिपत्य जमाना चाहता है तथा उन्हें अपनी इच्छानुसार चलाना चाहता है। वह अपनी आलोचना सुनना पसंद नहीं करता। यदि कोई दूसरा व्यक्ति उसका विरोध करता है तो वह उससे प्रतिशोध लेने पर उतर आता है। अहंकार मनुष्य को पतन के मार्ग पर ले जाता है। ऐसे व्यक्ति को सदैव याद रखना चाहिए कि परमात्मा के सिवाय अन्य कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है और न ही स्थायी है। जिन विशेषताओं तथा उपलब्धियों पर आज वह गर्व कर रहा है उन्हें नष्ट होने में क्षणमात्र भी नहीं लगेगा। इस अवसर पर रेखा, गीता, निशा, पार्वती, वर्षा, निशा, गुड्डी, लीला, शीलरानी, ममता, सुमन, विमल कुमार, दीपक, श्रीराम, मनमोहन, हक्की, भागीरथ, शिवराम, महेंद्र, ब्रजेश, राजू, नारान, अंनतराम आदि मौजूद रहे ।
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