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Lakhimpur Kheri News: नरकुल और गन्ने में अंतर नहीं कर पाते बाघ... इसलिए आ रहे आबादी में

Sun, 14 Apr 2024 01:31 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sun, 14 Apr 2024 01:31 AM IST
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Tigers are unable to differentiate between reed and sugarcane...that's why they are coming into the population.
हर्रैया गांव में मृतक रामू के घर लगी ग्रामीणों की भीड़।
बांकेगंज। दुधवा टाइगर रिजर्व समेत दक्षिण खीरी वन प्रभाग के जंगल किनारे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं। इससे आम लोगों के साथ वन विभाग के अफसर भी चिंतित हैं। वन्यजीव विशेषज्ञ का कहना है कि बाघ जंगल में उगने वाली ऊंची नरकुल घास और गन्ने में अंतर नहीं कर पा रहे हैं, इसलिए खेतों को अपना आशियाना बना रहे हैं।
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वन्यजीव विशेषज्ञ और पशु चिकित्सक डॉ. दया शंकर का कहना है कि जंगल में होने वाली नरकुल की ऊंची घास बाघों के छिपकर बैठने की सबसे पसंदीदा जगह होती है। ज्यादातर बाघ यहीं रहते हैं। जंगल से सटे खेतों में फसल तैयार होने पर बाघ गन्ने को नरकुल समझ बैठते हैं। इसलिए जंगल से निकलकर खेतों को ठिकाना बना लेते हैं।
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दूसरा कारण यह भी है कि गन्ने की फसल तैयार होने पर जंगली सूअर और दूसरे जानवर भी खेतों में आते हैं। इसलिए बाघों को जंगल के बाहर भी आसानी से भोजन और पानी मिल जाता है। खेतों में घूमने वाले छुट्टा जानवर भी बाघों का आहार बनते हैं। वहीं बाघिन के लिए गन्ने का खेत प्रसव के लिए सबसे सुरक्षित जगह है। इसलिए भी बाघ खेतों के अपना आशियाना बना रहे हैं।
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एक कारण यह भी
पशु चिकित्सक डॉ. दया शंकर का कहना है कि युवा बाघों द्वारा बुजुर्ग बाघों को जंगल से खदेड़ना भी एक कारण है। किसी कारण से घायल, कमजोर होने अथवा बीमार होने पर भी बाघ खेतों में शरण लेते हैं। क्योंकि जंगल के अंदर शिकार करना मुश्किल होता है, जबकि जंगल के बाहर छुट्टा पशुओं के रूप में उन्हें आसानी से भोजन मिल जाता है।


पांच साल में वन्यजीवों के हमले में 114 लोगों ने गंवाई जान

बांकेगंज। सह-अस्तित्व की भावना के साथ रहते आ रहे मानव और बाघों के बीच लगातार संघर्ष बढ़ रहा है। पिछले पांच साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो 114 लोग वन्यजीवों के हमले में अपनी जान गंवा चुके हैं और 175 से अधिक लोग घायल हुए हैं। एक तरफ बाघों की संख्या में इजाफा हो रहा है, वहीं इंसानी आबादी का दबाव जंगल पर बढ़ रहा है। इसके कारण बाघ और इंसान दोनों की जीवनशैली असहज हो रही है। इंसान अपनी जरूरतों के लिए जंगल में घुसपैठ कर रहा है तो बाघ अपनी टेरीटरी बनाने के साथ भोजन, पानी की तलाश में जंगल से बाहर आ रहे हैं।

हर्रैया गांव में मृतक रामू के घर लगी ग्रामीणों की भीड़।

हर्रैया गांव में मृतक रामू के घर लगी ग्रामीणों की भीड़।

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