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दुधवा टाइगर रिजर्व में बाघों के साम्राज्य का होगा विस्तार
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भारतीय वन्यजीव संस्थान वन्यजीवों के लिए बनाएगा कॉरीडोर, हो रहा है सर्वे
बाघों की संख्या भी बढ़ेगी और मानव-वन्यजीव संघर्ष में भी आएगी कमी
लखीमपुर खीरी। दुधवा टाइगर रिजर्व में बाघों के साम्राज्य को विस्तार देने और उनकी नस्ल को स्वस्थ रखने की मंशा से तराई के जंगलों को आपस में जोड़ने की कवायद तेज हो गई है। इसे लेकर भारतीय वन्यजीव संस्थान के विशेषज्ञों की एक टीम दुधवा में सुरक्षित और व्यवधान रहित कॉरीडोर विकसित करने की संभावनाएं तलाश रही है।
बाघ जंगल के अंदर ही व्यवधान रहित आवागमन कर सकें, इसके लिए पीलीभीत, दुधवा टाइगर रिजर्व और उससे सटे महराजगंज के सोहागी बरुआ तक सुरक्षित कॉरीडोर तलाशे जा रहे हैं। इसके लिए विशेषज्ञों की एक टीम इन दिनों दुधवा टाइगर रिजर्व में सर्वे कर रही है। टीम में डॉ राजेश गोपाल, डॉ वाईवी झाला, डॉ कमर कुरैशी और जीव विज्ञानी अयान साधु शामिल हैं। टीम भारत-नेपाल सीमा पर ऐसे कॉरीडोर विकसित करने की संभावनाएं तलाश रही है। जिनके जरिए बाघ और तेंदुए बिना किसी बाधा के एक जंगल से दूसरे जंगल को जा सकें।
इससे पहले उत्तराखंड से लेकर बिहार तक 49500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले तराई के जंगलों को आपस में जोड़ने के लिए तराई आर्क लैंडस्केप परियोजना तैयार की गई थी। इस परियोजना पर डब्ल्यूडब्ल्यूएफ काम कर रही थी। इस परियोजना के तहत उत्तराखंड के राजाजी नेशनल पार्क, कार्बेट नेशनल पार्क, रामनगर, हल्द्वानी, सोन नदी वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी, पीलीभीत टाइगर रिजर्व नेपाल के शुक्ला फांटा वन्यजीव विहार, वर्दिया नेशनल पार्क, परसा वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी, उत्तर प्रदेश के दुधवा टाइगर रिजर्व, महराजगंज के सोहागी बरुआ, बलरामपुर के सुहेलवा वन्यजीव विहार, नेपाल के रॉयल चितवन नेशनल पार्क और बिहार के वाल्मीकि नेशनल पार्क तक के जंगलों को कॉरीडोर के जरिए जोड़ने की योजना थी।
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परियोजना पर वर्ष 2003 से काम कर रहा था लेकिन जंगलों के बीच खेतों और आबादी के पैच होने और लैंडस्केप का एक बड़ा हिस्सा पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में होने के कारण पारस्परिक समन्वय न बन पाने से तराई आर्क लैंडस्केप परियोजना परवान नहीं चढ़ सकी। इसी से अब भारतीय वन्यजीव संस्थान ने दुधवा टाइगर रिजर्व में फिर से कॉरीडोर विकसित करने पर काम शुरू किया है। टीम नेपाल से सटे दुधवा टाइगर रिजर्व, पीलीभीत टाइगर रिजर्व, महराजगंज के सोहागी बरुआ और बलरामपुर के सोहेलवा तक सर्वे कर रही है। इन जंगलों के बीच बाघ, तेंदुआ और हाथियों का आवागमन होता है।
मानव वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में आएगी कमी
जंगल के अंदर ही बाघों का अंदर लंबी दूरी तक व्यवधान रहित आवागमन होने से जहां एक तरफ बाघों की संख्या में तेजी से इजाफा होगा वहीं उनकी नस्ल भी अधिक स्वस्थ रहेगी। सबसे ज्यादा फायदा यह होगा कि बाघों को अपनी टेरीटरी बनाने, और एक जंगल से दूसरे जंगल तक जाने के लिए खेतों का सहारा नहीं लेना पड़ेगा। इससे मानव बाघ संघर्ष की घटनाओं में काफी हद तक कमी आ सकती है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान तराई के जंगलों को कारीडोर से जोड़ने के लिए सर्वे करा रही है। वन्यजीवों के लिए जंगल में सुरक्षित कॉरीडोर विकसित होने से मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में कमी आएगी।
- संजय पाठक, फील्ड डायरेक्टर, दुधवा टाइगर रिजर्व
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बाघों की संख्या भी बढ़ेगी और मानव-वन्यजीव संघर्ष में भी आएगी कमी
लखीमपुर खीरी। दुधवा टाइगर रिजर्व में बाघों के साम्राज्य को विस्तार देने और उनकी नस्ल को स्वस्थ रखने की मंशा से तराई के जंगलों को आपस में जोड़ने की कवायद तेज हो गई है। इसे लेकर भारतीय वन्यजीव संस्थान के विशेषज्ञों की एक टीम दुधवा में सुरक्षित और व्यवधान रहित कॉरीडोर विकसित करने की संभावनाएं तलाश रही है।
बाघ जंगल के अंदर ही व्यवधान रहित आवागमन कर सकें, इसके लिए पीलीभीत, दुधवा टाइगर रिजर्व और उससे सटे महराजगंज के सोहागी बरुआ तक सुरक्षित कॉरीडोर तलाशे जा रहे हैं। इसके लिए विशेषज्ञों की एक टीम इन दिनों दुधवा टाइगर रिजर्व में सर्वे कर रही है। टीम में डॉ राजेश गोपाल, डॉ वाईवी झाला, डॉ कमर कुरैशी और जीव विज्ञानी अयान साधु शामिल हैं। टीम भारत-नेपाल सीमा पर ऐसे कॉरीडोर विकसित करने की संभावनाएं तलाश रही है। जिनके जरिए बाघ और तेंदुए बिना किसी बाधा के एक जंगल से दूसरे जंगल को जा सकें।
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इससे पहले उत्तराखंड से लेकर बिहार तक 49500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले तराई के जंगलों को आपस में जोड़ने के लिए तराई आर्क लैंडस्केप परियोजना तैयार की गई थी। इस परियोजना पर डब्ल्यूडब्ल्यूएफ काम कर रही थी। इस परियोजना के तहत उत्तराखंड के राजाजी नेशनल पार्क, कार्बेट नेशनल पार्क, रामनगर, हल्द्वानी, सोन नदी वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी, पीलीभीत टाइगर रिजर्व नेपाल के शुक्ला फांटा वन्यजीव विहार, वर्दिया नेशनल पार्क, परसा वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी, उत्तर प्रदेश के दुधवा टाइगर रिजर्व, महराजगंज के सोहागी बरुआ, बलरामपुर के सुहेलवा वन्यजीव विहार, नेपाल के रॉयल चितवन नेशनल पार्क और बिहार के वाल्मीकि नेशनल पार्क तक के जंगलों को कॉरीडोर के जरिए जोड़ने की योजना थी।
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परियोजना पर वर्ष 2003 से काम कर रहा था लेकिन जंगलों के बीच खेतों और आबादी के पैच होने और लैंडस्केप का एक बड़ा हिस्सा पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में होने के कारण पारस्परिक समन्वय न बन पाने से तराई आर्क लैंडस्केप परियोजना परवान नहीं चढ़ सकी। इसी से अब भारतीय वन्यजीव संस्थान ने दुधवा टाइगर रिजर्व में फिर से कॉरीडोर विकसित करने पर काम शुरू किया है। टीम नेपाल से सटे दुधवा टाइगर रिजर्व, पीलीभीत टाइगर रिजर्व, महराजगंज के सोहागी बरुआ और बलरामपुर के सोहेलवा तक सर्वे कर रही है। इन जंगलों के बीच बाघ, तेंदुआ और हाथियों का आवागमन होता है।
मानव वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में आएगी कमी
जंगल के अंदर ही बाघों का अंदर लंबी दूरी तक व्यवधान रहित आवागमन होने से जहां एक तरफ बाघों की संख्या में तेजी से इजाफा होगा वहीं उनकी नस्ल भी अधिक स्वस्थ रहेगी। सबसे ज्यादा फायदा यह होगा कि बाघों को अपनी टेरीटरी बनाने, और एक जंगल से दूसरे जंगल तक जाने के लिए खेतों का सहारा नहीं लेना पड़ेगा। इससे मानव बाघ संघर्ष की घटनाओं में काफी हद तक कमी आ सकती है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान तराई के जंगलों को कारीडोर से जोड़ने के लिए सर्वे करा रही है। वन्यजीवों के लिए जंगल में सुरक्षित कॉरीडोर विकसित होने से मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में कमी आएगी।
- संजय पाठक, फील्ड डायरेक्टर, दुधवा टाइगर रिजर्व