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जिस खैर से खीरी की पहचान, वही जंगल लुप्त होने के कगार पर

Tue, 21 Sep 2021 12:31 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Tue, 21 Sep 2021 12:31 AM IST
सार

वन संपदा : प्राकृतिक विरासत को बचाने की कोशिश में है वन विभाग
 

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The way the cucumber is identified, the same forest is on the verge of extinction
धौरहरा क्षेत्र में खैर के लगे पेड़। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

विस्तार

सोनाकलां, बैलहा, बैलहा तकिया, टाटरगंज, धौरहरा में खैर के जंगल काफी बेहतर स्थिति में

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लखीमपुर खीरी। जिस खैर के जंगल के कारण जिले का नाम खीरी पड़ा वह खैर अपने मूल स्थान से ही लुप्त होता जा रहा है। खैर के औषधीय गुणों, कत्था बनाने और चमड़ा उद्योग में इस्तेमाल होने की वजह इसका व्यवसायिक महत्व है। अत्याधिक दोहन के कारण खैर के जंगल सिमटकर सीमित दायरे में रह गए हैं। हालांकि अब वन विभाग ने इस लुप्त हो रही पहचान को जिंदा बनाए रखने की कोशिशें शुरू कर दी हैं।
भारत नेपाल से सटे इस जिले में कभी खैर के घने जंगल हुआ करते थे। इसी खैर के कारण ही जिले का नाम पहले खैरी और फिर खीरी पड़ा। जिले की सबसे पुरानी रियासत का नाम भी खैरीगढ़ स्टेट था। आज भी तहसील निघासन का एक परगना खैरीगढ़ है। इस तरह खीरी जिले की पहचान ही खैर से थी। कत्था बनाने और चमड़ा उद्योग में इस्तेमाल होने के कारण आजादी के पहले और आजादी के बाद भी कुछ दशकों तक खैर का जबरदस्त दोहन हुआ। इस कारण इसका विस्तार लगातार सिमटता चला गया।
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दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन उत्तर निघासन, दक्षिण निघासन, धौरहरा, मझगई और संपूर्णानगर रेंजों में खैर के जंगल अभी सुरक्षित हैं। हालांकि उनके घनत्व में पहले से कमी आई है। दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन के उपनिदेशक डॉ. अनिल कुमार पटेल बताते हैं कि खैर नदी किनारे बलुई मिट्टी में पनपता है। यही वजह है कि सोनाकलां, बैलहा, बैलहा तकिया, टाटरगंज, धौरहरा, रोड साइड प्लांटेशन के गोदापुरवा आदि जगहों पर खैर के जंगल अभी अच्छी स्थिति में हैं। अधिकतर जगहों पर खैर और शीशम के मिश्रित जंगल हैं।
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दुर्लभ प्रजाति के इस वृक्ष में हैं औषधीय गुण

वन विभाग ने इसे दुर्लभ वृक्ष की श्रेणी में रखा है। राष्ट्रीय वन नीति 1988 में पेड़ों की प्रजातियों को संतुलित रूप से इस्तेमाल में लाने की बात कही गई है। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ ने वर्ष 2004 में विश्व में 552 पेड़ों की प्रजातियों को खतरे में माना है, जिसमें 45 पेड़ भारत में हैं, उनमें खैर भी शामिल है। खैर का इस्तेमाल औषधि बनाने से लेकर कत्था, पान मसाला बनाने, चमड़े को चमकाने में किया जाता है। आयुर्वेद में इसका इस्तेमाल डायरिया, पाइल्स जैसे रोग ठीक करने में भी होता है। खैर का इस्तेमाल चारकोल बनाने में भी होता है।

बथुआ की 30 हेक्टेयर भूमि पर लगाए गए हैं खैर के पौधे

खीरी की पहचान खैर का विकास करने के लिए वन विभाग इस प्रजाति के पेड़ों के लिए अनुकूल जगह तलाश कर वहां पौधरोपण भी करा रहा है। हाल ही में वन विभाग ने दक्षिण निघासन के बथुआ नामक जगह पर 30 हेक्टेयर भूमि पर खैर का पौधरोपण कराया है। इस साल विभिन्न जगहों पर खैर के करीब एक लाख पौधे लगाए गए हैं। डॉ. अनिल पटेल के मुताबिक, दुधवा टाइगर रिजर्व में करीब 70000 हेक्टेयर जंगल है। इसमें से करीब 27 से 28 हजार हेक्टेयर इलाके में खैर और शीशम और के मिश्रित जंगल हैं।

खीरी की पहचान खैर को बचाने के लिए वन विभाग न केवल सजग है, बल्कि इसे बढ़ाने के लिए प्रयासरत भी है। खैर के पेड़ों के कटान पर प्रतिबंध है। इसके अलावा नदी किनारे बलुई मिट्टी में खैर का पौघरोपण भी कराया जा रहा है। - डॉ. अनिल कुमार पटेल, उपनिदेशक दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन

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