फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lakhimpur Kheri News ›   The official working language Could not ' the ' Hindi

सरकारी कामकाज की भाषा नहीं बन पाई ‘अपनी’ हिंदी

Sat, 12 Sep 2015 05:27 PM IST
लखीमपुर खीरी
लखीमपुर खीरी Updated Sat, 12 Sep 2015 05:27 PM IST
विज्ञापन
The official working language Could not ' the ' Hindi
आजादी के 68 वर्षों बाद भी हिंदी भाषी प्रदेशों में भी हिंदी पूरी तरह से सरकारी कामकाज की भाषा नहीं बन पाई है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में सरकारी काम काज में हिंदी का प्रयोग बढ़ा है लेकिन सरकारी कामकाज में जो हिंदी इस्तेमाल हो रही है उसकी शब्दावली इतनी क्लिष्ट है कि आम लोगों को सहूलियत होने के बजाय एक डर पैदा होता है। बुद्धिजीवियों और हिंदी प्रेमियों का मानना है कि सरकारी काम काज की भाषा में सरल हिंदी का प्रयोग हो जिसे आम लोग आसानी से समझ सकें। हिंदी को जन-जन की भाषा बनाने के लिए शीर्ष पर बैठे लोगों में हिंदी विकास के प्रति प्रतिबद्धता जरूरी है।
विज्ञापन

दूसरी तरफ कुछ बुद्धिजीवियों का ये मानना है कि राजनीतिक रूप से हम आजाद भले ही हो गए हों लेकिन कहीं न कहीं मानसिक गुलामी अब तक कायम है। अंग्रेजों के जमाने में अंग्रेजी संस्कृति के प्रति जो ललक पैदा हुई थी, उससे हम आज भी उबर नहीं पाए हैं। इस मानसिक गुलामी से निपटने के लिए पारिवारिक स्तर से प्रयास शुरू करने होंगे। हिंदी को आत्मगौरव का विषय बनाएंगे तभी हिंदी शीर्ष पर स्थापित होगी।
विज्ञापन

सरकारी तंत्र में हिंदी के प्रति निष्ठा की कमी
सरकारी तंत्र की संरचना में हिंदी के प्रति निष्ठा की कमी के कारण आजादी के इतने साल बाद भी हिंदी पूरी तरह सरकारी कामकाज की भाषा नहीं बन पाई है। हिंदी को जनजन की भाषा बनाने और राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए यह जरूरी है कि प्रांतीय भाषाओं के साहित्य का सरल हिंदी में अनुवाद हो और हिंदी साहित्य का देश की अन्य प्रांतीय भाषाओं में अनुवाद हो ताकि हिंदी और ज्यादा समृद्ध हो। लोगों में अच्छी हिंदी सीखने की ललक बढ़े। सबसे जरूरी यह है कि शीर्ष पर बैठे लोगों में हिंदी के प्रति प्रतिबद्धता और निष्ठा हो।
विज्ञापन
विज्ञापन

-डॉ. निरुपमा अशोक, प्राचार्य-भगवानदीन आर्यकन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, लखीमपुर खीरी।
हिंदी के प्रति गौरवबोध होना बहुत जरूरी
हमारी सामाजिक संस्कृति अंग्रेजी संस्कृति में तब्दील होती जा रही, सामाजिक रहन सहन, उपभोक्तावादी संस्कृति ने हिंदी का नुकसान ही किया है। हिंदी के प्रति गौरवबोध की कमी है। इसे हम आत्महीनता की स्थिति कह सकते हैं। आजादी के पहले अंग्रेजी संस्कृति के प्रति समाज का रुझान बढ़ा था। उसमें आजादी के बाद भी कमी नहीं आई है। हिंदी के विकास के लिए परिवार स्तर से प्रयास शुरू करने होंगे। हिंदी संस्कृति बच्चों के संस्कारों में डालना होगा ताकि वे हिंदी के प्रयोग में अपना आत्मगौरव महसूस कर सकें। शिक्षा में शिक्षकों को गुरु और शिक्षण संस्थाओं को गुरुकुल का दर्जा मिले।

-डॉ. सत्येंद्र दुबे, विभागाध्यक्ष हिंदी,  युवराजदत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय, लखीमपुर खीरी
परिवार से ही हिंदी अपनाने और बढ़ाने की हो शुरुआत     
पिछले एक दशक में सरकारी काम काज की भाषा में हिंदी का इस्तेमाल बढ़ा है लेकिन इसमें जो शब्दावली इस्तेमाल हो रही है वह बेहद क्लिष्ट है। इससे लोगों को सुगमता होने की बजाय कठिनाई होती है। इससे भय का वातावरण बनता है। हिंदी हमारी मातृभाषा है हम जितना इसके नजदीक रहेंगे अपने को उतना ही सहज महसूस करेंगे। अच्छी हिंदी के विकास के लिए बच्चों को बचपन से उनका अभ्यास कराया जाना चाहिए। इसको लेकर पाठ्यक्रम में छोटे-छोटे पाठ डाले जाएं। जब तक हमारी आधार भूत संरचना सुदृढ़ नहीं होगी हिंदी अपना गौरव पूर्ण स्थान नहीं पा सकती।
-डॉ. सुरचना त्रिवेदी, प्राध्यापक-भगवानदीन आर्यकन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed