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सावन के पहले सोमवार को रात दो बजे खुले छोटीकाशी के पौराणिक शिव मंदिर के कपाट

Tue, 19 Jul 2022 12:57 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Tue, 19 Jul 2022 12:57 AM IST
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The doors of the mythological Shiva temple of Chotokashi opened at 2 pm on the first Monday of Sawan
सावन के पहले सोमवार गोला के प्राचीन शिव मंदिर मे उमड़ी भीड़ - फोटो : LAKHIMPUR
गोला गोकर्णनाथ। सावन के पहले सोमवार पर पौराणिक शिव मंदिर के कपाट रात दो बजे से ही खोल दिए गए। मंदिर पुजारी पंडित दिनेश चंद्र मिश्र ने प्रथम पूजन किया। रविवार को ही डेरा जमा चुके शिव भक्त भगवान भोलेनाथ का दर्शन करने के लिए लाइन में लग गए। श्रद्धालुओं ने गर्भ ग्रह में भगवान शिव का जलाभिषेक करने के साथ माता पार्वती, भगवान नंदी, बूढ़े बाबा के मंदिर में भी दर्शन किए। दूरदराज से आए श्रद्धालुओं ने गोकर्णतीर्थ में स्नान कर दान पुण्य किया।
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क्षेत्र के सैदापुर के गोमती नदी तट बाबा टेढ़े नाथ धाम पर सावन माह के प्रथम सोमवार पर श्रद्धालु उमड़े। जिनकी सुरक्षा में पुलिस बल मौजूद रहा। बाबा टेढ़े नाथ धाम पर दूर-दराज से आये श्रद्धालुओं ने शिवलिंग पर बेल पत्र, भांग, धतूरा,पुष्प आदि चढ़ाकर पूजा अर्चना की। यहां श्रद्घालुओं ने भंडारे भी कराए।
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ममरी में सावन के पहले सोमवार को छोटी काशी के प्राचीन शिव मंदिर के अभिन्न अंग कहलाने वाले हैदराबाद थाना क्षेत्र के गांव अहमदनगर स्थित प्राचीन क्लेश हरण मंदिर पर क्षेत्र से लेकर दूर दराज से आए हजारों श्रद्धालुओं ने शिवलिंग पर बेलपत्र धतूरा प्रसाद चढ़ाकर जलाभिषेक किया और मंदिर में माथा टेक कर जनकल्याण सुख समृद्धि की कामनाएं की। पुजारी विष्णु गिरी ने बताया कि यहां के मंदिर पर पुरुषों की अपेक्षा महिला श्रद्धालुओं की सर्वाधिक भीड़ होती है।
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नरसिंह बाबा की समाधि में है लोगों की आस्था - अहमदनगर के प्राचीन क्लेश हरण मंदिर के पूरब में बनी सैकड़ों वर्ष पुरानी नरसिंह बाबा की समाधि पर लोग गंगाजल की जगह मदिरा प्रसाद चढ़ाकर पूजन करते हैं। पुजारी विष्णु गिरी और अहमदनगर के बुजुर्गों के अनुसार नरसिंह गिरी नागा पंथ के महात्मा थे। जो भोलेनाथ के सच्चे पुजारी थे।

महात्मा गांव की बस्ती में जाकर मंदिर के बगल में झोपड़ी बनाकर रहते थेष बुजुर्गावस्था में भोलेनाथ का जाप करते हुए उसी झोपड़ी में जिंदा समाधि ले ली थी। जो समाधि के अंदर काफी दिनों तक जीवित रहे। बाद में उनका समाधि में ही निधन हो गया। जिस पर परिजनों ने समाधि को मठिया का रूप दे दिया।
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