दुधवा में बाघों की मौत: कारणों की जांच के साथ बदलते हालात का भी अध्ययन जरूरी; वन्यजीव विशेषज्ञों का सुझाव
न्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि जंगल की बदलती आबोहवा के साथ बाघों के स्वभाव में भी बदलाव आ रहा है। जांच के साथ इस पर व्यापक अध्ययन करने की भी जरूरत है।
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लखीमपुर खीरी के दुधवा टाइगर रिजर्व में 40 दिन के अंदर चार बाघों और एक तेंदुए की मौत से वन विभाग में खलबली मची हुई है। बाघ और तेंदुओं की मौत के कारणों की जांच कई स्तर से हो रही है। प्रदेश के उच्च वनाधिकारियों के अलावा केंद्रीय कमेटी भी जांच में जुटी है। उधर, वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि जंगल की बदलती आबोहवा के साथ बाघों के स्वभाव में भी बदलाव आ रहा है। जांच के साथ इस पर व्यापक अध्ययन करने की भी जरूरत है।
युवराजदत्त महाविद्यालय के सेवानिवृत्त जंतु विज्ञान विभागाध्यक्ष और वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. अजय कुमार आगा का कहना है कि भीषण गर्मी के कारण बाघों का स्वभाव उग्र हो रहा है। इससे बाघों के बीच आपसी संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं। यह भी देखना होगा कि पालतू और छुट्टा जानवरों के संपर्क में आने और उन्हें खाने से बाघ, तेंदुए किसी बीमारी का शिकार तो नहीं हो रहे हैं, जो इनके लिए घातक बनती जा रही है।
आलसी हो रहे बाघ
दुधवा टाइगर रिजर्व के ही पशु चिकित्सक डॉ. दयाशंकर का कहना है कि बाघ धीरे धीरे आलसी हो रहे हैं। इसके कारण वे आसान शिकार की तलाश में बाहर निकल रहे और किसी न किसी कारण खतरे में पड़ रहे हैं।
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जंगल की बदलती आबोहवा और बाघ, तेंदुओं के बदलते स्वभाव पर अब अध्ययन किया जाना चाहिए और उसके अनुसार बाघ संरक्षण की योजना बनानी चाहिए। वन्यजीव विशेषज्ञ केके मिश्र भी बाघ और तेंदुओं की मौत की जांच के साथ बदलते वातावरण और हालात पर अध्ययन की बात कह रहे है।
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ये हो सकते हैं कारण
-मौसम में बदलाव, गर्मी का अधिक पड़ना-आबादी में बढ़ोत्तरी से जंगल में मानवीय घुसपैठ और हस्तक्षेप बढ़ना।
-हर साल आने वाली बाढ़ से दुधवा के वानस्पतिक ढांचों में बदलाव।
-बाघों की बढ़ती आबादी से सीमित जंगल में टेरीटरी के लिए जगह कम पड़ना।
-गर्मियों के मौसम में प्राकृतिक जलस्त्रोतों का सूख जाना।
स्वभाव में आ रहा ये बदलाव
-ज्यादा गर्मी पड़ने से बाघ और तेंदुओं का स्वभाव उग्र हो जाना।-जंगल में फुर्तीले जानवरों के शिकार में मेहनत करने की बजाय आसान शिकार तलाशना
-प्रणय के लिए दूसरे नर बाघों से भिड़ जाना
-जंगल की अपेक्षा खेतों में बसेरा बनाना
-जंगल में इंसानी घुसपैठ होने से बाघों में चिढ़ पैदा होना