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लखीमपुर खीरी: रूरा सुल्तानपुर में कटान ने बरपाया ऐसा कहर, कई ग्रामीण हो गए बेघर; देवी मंदिर भी नदी में समाया

Wed, 14 Oct 2026 03:50 PM IST
Mukesh Kumar अजीत गुप्ता, संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
अजीत गुप्ता, संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी Published by: Mukesh Kumar Updated Wed, 14 Oct 2026 03:50 PM IST
सार

लखीमपुर खीरी जिले के रूरा सुल्तानपुर गांव में शारदा नदी की कटान से कई परिवार बेघर हो गए। खेत-खलिहान भी शारदा की लहर में समा गए। इससे प्रभावित परिवारों के सामने अब भरण पोषण का संकट भी खड़ा हो गया है। 

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Sharda River Erosion wreaks havoc in Rura Sultanpur village of Lakhimpur Kheri
शारदा नदी में समाए घर और खेत - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

लखीमपुर खीरी जिले में शारदा की लहरें अब सिर्फ घर, खेत और जमीन ही नहीं निगल रहीं, बल्कि ग्रामीणों की जिंदगी भर की कमाई, पुरखों की निशानियां और पीढ़ियों से जुड़ी आस्था भी अपने साथ बहा ले जा रही हैं। बिजुआ विकासखंड के रूरा सुल्तानपुर में कटान का दर्द ऐसा है, जिसे शब्दों में समेटना मुश्किल है। किसी का आशियाना उजड़ गया तो किसी की खेती नदी में समा गई। जिन मंदिरों में कभी घंटियां गूंजती थीं, वहां अब शारदा की लहरें हिलोरें मार रही हैं। वीर बाबा का स्थान, माता जी का मंदिर और शिवलिंग पहले ही नदी में समा चुके हैं। अब काली माता का मंदिर भी कटान की भेंट चढ़ गया है। ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि वे अपनी आंखों के सामने अपना अतीत मिटते देख रहे हैं, लेकिन उसे बचाने के लिए कुछ नहीं कर पा रहे।

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जिस आंगन में गूंजती थी हंसी, वहां अब बह रही शारदा
रूरा सुल्तानपुर में कटान की कहानी सिर्फ दीवारों के ढहने तक सीमित नहीं है। नदी के साथ उन यादों का भी अंत हो रहा है, जिन्हें ग्रामीणों ने वर्षों तक अपने सीने से लगाकर रखा था। गांव निवासी जगजीत सिंह बताते हैं कि जिस चौखट से परिवार की बेटियां शादी के बाद विदा हुई थीं, वह अब नदी में समा चुकी है। जिस आंगन में परिवार के लोग बैठकर सुख-दुख बांटते थे, वहां आज शारदा की धारा बह रही है। जिस जमीन पर उनके बुजुर्गों का अंतिम संस्कार हुआ था, वह भी नदी की भेंट चढ़ चुकी है। उनके लिए यह सिर्फ जमीन का नुकसान नहीं, बल्कि अपने पुरखों से जुड़े आखिरी निशानों को खोने का दर्द है।
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अपने आशियाने खुद तोड़ रहे ग्रामीण 
गांव निवासी बेचू की पीड़ा भी कुछ ऐसी ही है। वह बताते हैं कि मजदूरी करके पाई-पाई जोड़ी और एक-एक ईंट लगाकर अपने सपनों का घर बनाया था। इसी घर में बच्चों को बड़ा होते देखा और परिवार के साथ पूरी जिंदगी गुजारने के सपने संजोए थे। लेकिन अब उसी आशियाने को अपने हाथों से तोड़ना पड़ रहा है, ताकि नदी की चपेट में आने से पहले कुछ सामान बचाया जा सके।

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Sharda River Erosion wreaks havoc in Rura Sultanpur village of Lakhimpur Kheri
शारदा में समाई धान की फसल - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

पानी में बह गईं किताबें 
बेचू कहते हैं कि घर तोड़ते समय हथौड़े की हर चोट सिर्फ दीवार पर नहीं पड़ती, बल्कि उनके सीने को भी छलनी कर देती है। जिस घर को बनाने में पूरी जिंदगी की कमाई लगा दी, उसे खुद उजाड़ना पड़ रहा है। बाढ़ के पानी में बच्चों के स्कूली बैग और किताबें तक बह गईं। घर छिनने के साथ बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हुई है। अब परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि सिर छिपाने के लिए ठिकाना कहां मिले और जिंदगी फिर से कैसे शुरू हो।

नदी में समाए मंदिर 
रूरा सुल्तानपुर में शारदा का कटान धार्मिक स्थलों को भी नहीं बख्श रहा है। गांव निवासी सुभाष अवस्थी बताते हैं कि वीर बाबा का स्थान बहुत पुराना था। यहां अमावस्या पर मेला लगता था और दूर-दराज के गांवों से श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते थे। लोगों की मन्नतें, मान्यताएं और यादें इस स्थान से जुड़ी थीं। समय के साथ श्रद्धालुओं ने अपनी आस्था के अनुसार यहां मंदिर बनवाए और शिवलिंग स्थापित कराए।

ग्रामीणों के मुताबिक, वर्ष 2013 में भक्त सुखारी ने काली माता मंदिर का निर्माण कराया था। वहीं, सुखारी के भाई भूरगुन पुत्र रामऔतार ने वर्ष 1984 में उत्तर प्रदेश पुलिस में चयनित होने के बाद शिव मंदिर बनवाया था। भक्त बेचू ने मन्नत पूरी होने पर माता जी का मंदिर बनवाया था, जबकि कारण पाल सिंह ने अपनी मन्नत पूरी होने पर बड़ा शिवलिंग स्थापित कराया था।

Sharda River Erosion wreaks havoc in Rura Sultanpur village of Lakhimpur Kheri
कटान से शारदा नदी में समा रही जमीन - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

अब वीर बाबा का स्थान, माता जी का मंदिर और शिवलिंग नदी में समा चुके हैं। काली माता मंदिर भी कटान की भेंट चढ़ गया है। मंदिरों के उजड़ने से ग्रामीणों को ऐसा लग रहा है, जैसे उनकी पीढ़ियों की आस्था और परंपराओं के निशान एक-एक कर मिटते जा रहे हैं। जिन स्थानों पर कभी पूजा-अर्चना होती थी, वहां अब नदी की लहरें बह रही हैं। ग्रामीणों के लिए यह सिर्फ धार्मिक स्थलों का नुकसान नहीं, बल्कि उन यादों का बिछड़ना है, जो उनके परिवारों और गांव की पहचान का हिस्सा थीं।

खेतों के साथ छिन गया परिवार पालने का सहारा
शारदा का कटान किसानों के लिए भी जिंदगी भर का जख्म बन गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, रूरा सुल्तानपुर में करीब 70 हेक्टेयर जमीन नदी में समा चुकी है। जिन खेतों में कभी फसलें लहलहाती थीं, वहां अब पानी बह रहा है। जमीन के साथ किसानों की मेहनत, भविष्य की उम्मीदें और परिवार के भरण-पोषण का सहारा भी छिन गया है।

ग्रामीणों के सामने अब दोहरी मुसीबत है। एक ओर सिर छिपाने के लिए सुरक्षित जगह तलाशनी पड़ रही है, तो दूसरी ओर रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। जिस जमीन से परिवारों का खर्च चलता था, वह नदी में समा गई। कटान की रफ्तार ने उन्हें संभलने तक का मौका नहीं दिया। लोग घरों से बचा हुआ सामान समेटकर सुरक्षित ठिकाने की तलाश में जुटे हैं। लेकिन घर और खेत दोनों गंवाने के बाद आगे की जिंदगी कैसे चलेगी, यह सवाल उन्हें अंदर तक परेशान कर रहा है।

Sharda River Erosion wreaks havoc in Rura Sultanpur village of Lakhimpur Kheri
शारदा नदी में समाया मंदिर - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

सरकारी आंकड़ों में 14 मकान, ग्रामीणों के मुताबिक 20 से अधिक उजड़े
प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार, अब तक 12 पक्के और दो कच्चे मकान नदी में समा चुके हैं। अधिकारियों के मुताबिक, कटान बढ़ने पर छह अन्य मकानों को भी खतरा हो सकता है। वहीं, ग्रामीणों का दावा है कि धरातल पर 20 से अधिक मकान कटान की भेंट चढ़ चुके हैं। इससे नुकसान के सरकारी आंकड़ों और ग्रामीणों के दावों में अंतर सामने आ रहा है।

प्रशासन की ओर से कुछ प्रभावित परिवारों को मुआवजा मिलने की बात कही जा रही है, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि जीवनभर की कमाई, घर और खेती की जमीन गंवाने के बाद मिलने वाली सहायता उनके नुकसान के मुकाबले पर्याप्त नहीं है। उन्हें परिवार के रहने और आजीविका का इंतजाम करने की चिंता सता रही है।

रूरा सुल्तानपुर में शारदा का कटान लगातार बढ़ती मुश्किलों के साथ ग्रामीणों के जीवन की कहानी भी बदल रहा है। नदी की लहरें मिट्टी के साथ घर, खेत, मंदिर और पुरखों की यादें बहा ले जा रही हैं। कभी जिन आंगनों में बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, वहां अब पानी बह रहा है। जिन मंदिरों में श्रद्धालु सिर झुकाते थे, वहां आस्था के निशान मिट चुके हैं। ग्रामीणों के पास अब बचाने के लिए बहुत कुछ नहीं बचा है, लेकिन खोने का दर्द हर गुजरते दिन के साथ और गहरा होता जा रहा है।

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