एक्सप्लेनर: नीले ड्रम वाले साहिल-मुस्कान को मौत की सजा, पर फांसी होना तय नहीं; जानें क्यों, क्या है कानून?
मेरठ के जिस बहुचर्चित हत्याकांड में मौत की सजा का एलान हुआ है, उसके दोषियों को फांसी के फंदे तक पहुंचाने में अभी राज्य/शासन (स्टेट) के सामने कितनी अड़चनें हैं और मुस्कान-साहिल के पास अभी इस सजा से बचने के लिए कितने रास्ते हैं? इस मामले में कानून क्या कहता है? सजा से लेकर फांसी के फंदे तक पहुंचने की राह क्या है? आइये जानते हैं...
विस्तार
ऐसे में यह जानना अहम है कि मेरठ के जिस बहुचर्चित हत्याकांड में मौत की सजा का एलान हुआ है, उसके दोषियों को फांसी के फंदे तक पहुंचाने में अभी राज्य/शासन (स्टेट) के सामने कितनी अड़चनें हैं और मुस्कान-साहिल के पास अभी इस सजा से बचने के लिए कितने रास्ते हैं? इस मामले में कानून क्या कहता है? सजा से लेकर फांसी के फंदे तक पहुंचने की राह क्या है? अमर उजाला ने इस मुद्दे पर कानूनी प्रक्रिया के बारे में जानने के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट में वकील और कानूनी मामलों की जानकार आभा सिंह से बात की।
पहले जानें- साहिल-मुस्कान को किस मामले में हुई सजा, कोर्ट ने क्या कहा?
मामला: साहिल शुक्ला और मुस्कान रस्तोगी को मुस्कान के पति सौरभ राजपूत, जो एक मर्चेंट नेवी अधिकारी थे की हत्या करने और सबूत मिटाने के बहुचर्चित 'मेरठ ब्लू ड्रम हत्याकांड' के केस में सजा सुनाई गई है।अभियोजन पक्ष के मुताबिक, हत्या की यह घटना 3 मार्च 2025 को हुई थी। आरोपियों ने सौरभ राजपूत की हत्या करने के बाद उनके शव के टुकड़े किए, उन्हें एक नीले ड्रम में रखा और फिर अपराध छुपाने की नीयत से उस ड्रम को सीमेंट से भर दिया और उस पर सीमेंट की कोटिंग भी कर दी।
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सुनवाई और गवाही: 13 महीने चले इस ट्रायल में कुल 126 सुनवाइयां हुईं। मामले को साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष ने 22 गवाहों को पेश किया, जिनमें ड्रम व चाकू बेचने वाले, होटल मैनेजर और कैब ड्राइवर शामिल थे।
कोर्ट का फैसला: जिला न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा की अदालत ने मुस्कान रस्तोगी और उसके साथी साहिल शुक्ला दोनों को मौत की सजा सुनाई। अदालत ने दोनों को हत्या करने और शव को छिपाने की कोशिश करने का दोषी पाया।
अब जानें- कब तक हो सकती है साहिल और मुस्कान को फांसी?
भारत में कानून की प्रक्रियाएं तय करने के लिए- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) 2023 है, जिसे पूर्व में सीआरपीसी कहा जाता था। इसके तहत साहिल शुक्ला और मुस्कान रस्तोगी को मेरठ की अदालत द्वारा सजा सुनाए जाने के तुरंत बाद फांसी नहीं दी जा सकती। बीएनएसएस में दिए गए कानूनी प्रावधानों के तहत अभी फांसी की कोई निश्चित तिथि तय नहीं है, क्योंकि सजा को दिए जाने यानी एग्जीक्यूशन से पहले कई अनिवार्य कानूनी चरणों को पूरा करना होता है। वकील आभा सिंह ने बताया कि निचली अदालत से मौत की सजा मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति के पास दया याचिका तक मामला पहुंचने में कई बार 10 साल तक का समय लग जाता है, क्योंकि अपील तय करने के लिए कोई निश्चित समय सीमा निर्धारित नहीं है।
बीएनएसएस की धारा 22 और 407 के तहत सेशंस कोर्ट (जिला अदालत) की ओर से दी गई मौत की सजा को तब तक अमल में नहीं लाया जा सकता, जब तक कि उस राज्य का संबंधित उच्च न्यायालय मामले की समीक्षा करके इस सजा की पुष्टि न कर दे। यानी साहिल-मुस्कान को फांसी के तख्त तक ले जाने के लिए पहले इलाहबाद हाईकोर्ट की मंजूरी की जरूरत होगी।
दूसरा कदम: अपील करने का अधिकार
बीएनएसएस की ही धारा 404(4) और धारा 455 के तहत, दोषियों को ऊपरी अदालत में अपील दायर करने के लिए समय दिया जाता है। सजायाफ्ता को अपनी सजा के खिलाफ या सजा की मात्रा के खिलाफ पहले हाईकोर्ट और इसके बाद सुप्रीम कोर्ट तक में अपील करने की छूट होती है। जब तक यह अपील लंबित रहती है या अपील का निर्धारित समय खत्म नहीं होता, तब तक फांसी की सजा के अमल पर रोक लगी रहती है। हालांकि, किसी एक अदालत में सजा पाए व्यक्ति चाहें तो अपने अपील के अधिकार का इस्तेमाल न करने का फैसला भी कर सकते हैं।
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अगर सुप्रीम कोर्ट से अपील खारिज हो जाती है या अपील की समय सीमा समाप्त हो जाती है, तो धारा 472 के तहत दोषियों के पास 30 दिनों के भीतर राज्यपाल या राष्ट्रपति के सामने दया याचिका दायर करने का अधिकार होता है। जब तक राष्ट्रपति इस दया याचिका को न ठुकरा दें, तब तक किसी को भी सजा नहीं दी जा सकती। यानी यह पूरी तरह राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर होता है कि किसी को आखिरकार फांसी की सजा हो सकती है या नहीं।
अगर राष्ट्रपति की तरफ से ठुकरा दी जाए याचिका?
जब दया याचिका और अपील के सभी कानूनी विकल्प खत्म या खारिज हो जाते हैं, तब धारा 453 के तहत सत्र न्यायालय को हाई कोर्ट से अंतिम आदेश प्राप्त होता है, जिसके बाद ही फांसी का वारंट जारी किया जाता है।
इन सभी कानूनी प्रक्रियाओं- हाईकोर्ट की समीक्षा, सुप्रीम कोर्ट में अपील और दया याचिका के निपटारे में समय लगता है, इसलिए जब तक ये सभी विकल्प समाप्त नहीं हो जाते, फांसी की तारीख तय नहीं हो सकती।
जब तक नहीं होती मुस्कान-साहिल को फांसी तब तक क्या होगा?
फांसी की सजा को अमल में लाए जाने तक यानी मुस्कान और साहिल को फांसी के तख्त पर पहुंचाने तक उन्हें जेल की सुरक्षित हिरासत में रखा जाएगा। वकील आभा सिंह के मुताबिक, अपील प्रक्रिया के चलने तक दोनों आरोपी जेल की हिरासत में ही रहेंगे। मृत्युदंड जैसे गंभीर अपराधों में पैरोल और फरलो का अधिकार भी उनके पास नहीं रहेगा, बल्कि इसे नकारा भी सकता है। सजा तय होने के बाद उन्हें ओपन जेल में भी भेजा जा सकता है जहां उनसे काम कराया जाएगा।जेल कस्टडी का आदेश: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 407 के तहत, जब सत्र न्यायालय द्वारा मौत की सजा सुनाई जाती है, तो अदालत दोषियों को तुरंत जेल कस्टडी में भेजने का वारंट जारी करती है।
कस्टडी का कानूनी मकसद: सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय कानूनी सिद्धांतों (स्टेट ऑफ पंजाब बनाम काला राम) के अनुसार, मृत्युदंड पाए दोषी की यह हिरासत किसी सामान्य कारावास की जगह मुख्यतः उसे सुरक्षित रखने के लिए होती है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना होता है कि हाई कोर्ट से सजा की पुष्टि, अपील और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं के पूरा होने तक दोषी सुरक्षित रहे।
भारत में अभी कितने लोग मौत की सजा की कतार में?
कानून की पढ़ाई से जुड़ी नालसार यूनिवर्सिटी की तरफ से 2025 के अंत में कानून सुधारों के लिए काम करने वाली संस्था- स्क्वायर सर्किल क्लीनिक (पूर्व में प्रोजेक्ट 39ए) की एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसमें दिसंबर 2025 के अंत तक भारत में मौत की सजा पाए कैदियों के आंकड़े दिए गए थे। इसमें एक चौंकाने वाली जानकारी यह सामने आई कि बीते 10 साल में सिर्फ निर्भया मामले के चार दोषियों को फांसी हुई है, जबकि सजा-ए-मौत पाने वालों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है।
सजा के एलान से इसके अमल तक, क्यों लगता है लंबा समय, कम क्यों हो जाती हैं सजाएं?
- अदालती अपीलों और याचिकाओं के निपटारे के लिए कोई कानूनी रूप से बाध्यकारी सख्त समय सीमा तय नहीं है। इसके चलते मामले वर्षों तक अदालतों में लंबित रह जाते हैं।
- मुख्य अपील खारिज होने के बाद भी दोषी सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका और उसके बाद रूपा अशोक हुर्रा मामले में तय व्यवस्था के तहत क्यूरेटिव याचिका दायर कर सकता है। इसके चलते अदालतों को कई बार अंतिम फैसला देने में अतिरिक्त समय लगता है।
- सुप्रीम कोर्ट के अलग-अलग फैसलों में भी दोषियों को मौत की सजा के मामलों में अलग-अलग अदालत पर हर एक साक्ष्य का स्वतंत्रता से देखने का भार होता है, ताकि किसी भी बेगुनाह को सजा न मिले और न्यायिक चूक न हो। कई बार इस देरी के चलते भी उच्च न्यायालय सजाओं की मात्रा को कम कर देती हैं।