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Lakhimpur Kheri: यूपी में 117 साल बाद दुधवा में दिखा पेंटेड कीलबैक सांप, 1839 में इस प्रजाति की हुई थी खोज
Tue, 08 Oct 2024 04:50 PM IST
बरेली ब्यूरो
अमर उजाला नेटवर्क, लखीमपुर खीरी
अमर उजाला नेटवर्क, लखीमपुर खीरी
Published by: बरेली ब्यूरो
Updated Tue, 08 Oct 2024 04:50 PM IST
सार
दुर्लभ प्रजाति का पेंटेड कीलबैक सांप पहली बार 1907 में फैजाबाद में देखा गया था। इसके बाद अब यह दुखवा में मिला है। हालांकि यह मरा पाया गया। माना जा रहा है कि दुधवा में इस प्रजाति के और सांप हो सकते हैं।
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दुधवा में मृत मिला पेंटेड कीलबैक सांप
- फोटो : वन विभाग
विस्तार
लखीमपुर खीरी के दुधवा टाइगर रिजर्व के इतिहास में पहली बार और 117 साल बाद उत्तर प्रदेश में पेंटेड कीलबैक सांप की प्रजाति मिली है। हालांकि, यह सांप मृत अवस्था में पाया गया। इसकी खोज सबसे पहले भारत में डॉ. थियोडोर कैंटर ने वर्ष 1839 में की थी। उत्तर प्रदेश में इसकी उपस्थिति की आखिरी पुष्टि 1907 में फैजाबाद क्षेत्र में हुई थी।
दुधवा के उपनिदेशक डॉ. रंगाराजू टी. ने बताया कि पेंटेड कीलबैक (जेनोक्रोफिस सेरासोगास्टर) एक दुर्लभ गैर विषैला सांप है। इसको नकउहा नाले के पास मृत अवस्था में पाया गया है। यह एक ऐसी जगह है, जहां अक्सर हाथी आते-जाते रहते हैं। माना जा रहा है कि उनके पैरों के नीचे आकर यह दुर्लभ सांप मरा होगा।
उन्होंने बताया कि जीवविज्ञानी विपिन कपूर सैनी और अपूर्व गुप्ता ने अपने फील्डवर्क के दौरान इस सांप को दीमक के पहाड़ के पास पाया। उन्होंने वैज्ञानिकपत्रों की गहन समीक्षा के माध्यम से इसकी पहचान करने से पहले नमूने का सावधानीपूर्वक विश्लेषण और दस्तावेजीकरण किया। शरीर पर अलग-अलग निशान और स्केल पैटर्न की मौजूदगी से पुष्टि हुई कि यह पेंटेड कीलबैक सांप है।
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डीडी ने बताया कि दुधवा में कई ऐसी प्रजातियां हैं, जिनके बारे में किसी को पता नहीं है। इस साल दुधवा में दो खोज सृप प्रजाति में हुई हैं। इसमें अहेतुल्ला प्रसीना ग्रीन वाइन स्नेक प्रजाति का ब्राउन वाइन सांप बांकेताल क्षेत्र में पाया गया था। इसके बाद अब पेंटेड कीलबैक प्रजाति के सांप के दुधवा में होने की पुष्टि हुई है। उम्मीद जताई जा रही है कि यह 117 साल पुरानी प्रजाति दुधवा में पनपने का काम करेगी।
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दुधवा के उपनिदेशक डॉ. रंगाराजू टी. ने बताया कि पेंटेड कीलबैक (जेनोक्रोफिस सेरासोगास्टर) एक दुर्लभ गैर विषैला सांप है। इसको नकउहा नाले के पास मृत अवस्था में पाया गया है। यह एक ऐसी जगह है, जहां अक्सर हाथी आते-जाते रहते हैं। माना जा रहा है कि उनके पैरों के नीचे आकर यह दुर्लभ सांप मरा होगा।
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उन्होंने बताया कि जीवविज्ञानी विपिन कपूर सैनी और अपूर्व गुप्ता ने अपने फील्डवर्क के दौरान इस सांप को दीमक के पहाड़ के पास पाया। उन्होंने वैज्ञानिकपत्रों की गहन समीक्षा के माध्यम से इसकी पहचान करने से पहले नमूने का सावधानीपूर्वक विश्लेषण और दस्तावेजीकरण किया। शरीर पर अलग-अलग निशान और स्केल पैटर्न की मौजूदगी से पुष्टि हुई कि यह पेंटेड कीलबैक सांप है।
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