फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lakhimpur Kheri News ›   My history with open today ... Of the Rani of Jhansi

इतिहास खोलकर देख आज  उस झांसी वाली रानी का...

Wed, 12 Oct 2016 11:36 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो     लखीमपुर खीरी।
अमर उजाला ब्यूरो     लखीमपुर खीरी। Updated Wed, 12 Oct 2016 11:36 PM IST
विज्ञापन
My history with open today ... Of the Rani of Jhansi
कवि भोलानाथ शेखर - फोटो : अमर उजाला
ओज और तेज के धनी थे कवि भोलानाथ शेखर
विज्ञापन

कवि भोलानाथ शेखर की जन्म और पुण्य तिथि आज

वीर रस की रचनाओं से लोगों में ओज भरने वाले शहर के जाने माने कवि स्व. भोलानाथ शेखर की जयंती और पुण्य तिथि एक साथ मनाई जाती है। उनका जन्म 13 अक्तूबर 1912 में हुआ और निधन 13 अक्तूबर 1965 को हुआ। रामलीला के सांस्कृतिक मंच पर काव्य पाठ करते समय उन्हें दिल का दौरा पड़ा और कुछ देर बाद ही उन्होंने प्राण त्याग दिए। तभी से दशहरा मेले में प्रादेशिक कवि सम्मेलन उनकी स्मृति में होता है। 
कवि के पौत्र युवराज शेखर के अनुसार भोलानाथ शेखर की गणना सनेही मंडल के प्रमुख कवियों में की जाती है। उनका जन्म 13 अक्तूबर 1912 को खीरी टाउन के खत्री टोला मोहल्ले में हुआ था। कविता लेखन और अभिनय का शौक उन्हें बचपन से ही था। उनकी युवा कवि मंडली में हर हर महादेव महाकाव्य के प्रणेता रामप्रसाद सर्राफ स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी और बचालो देश काव्य कृति के प्रणेता बृज बिहारी लाल सहगल, पं. यमुनादीन मिश्र यमुनेंद्र, सीताराम प्रमुख थे। उस समय गोष्ठियों का दौर चलता था।
विज्ञापन

1962 के चीनी आक्रमण से उनका मन व्यथित था। वह चाऊ को चुनौती देते हुए कहते हैं- तूने चाऊ क्या समझा है, भारत के लाल प्रवालों को। तूने चाऊ क्या समझा है काले- कराल विकरालों को। इतिहास खोलकर देख आज उस झांसी वाली रानी का। आजाद, चंद्रशेखर, बिस्मिल तात्या की अमर कहानी का।
विज्ञापन
विज्ञापन

पचास साल पहले दशहरा मेला के सांस्कृतिक मंच पर कवि डॉ. बृजेंद्र अवस्थी मंच का संचालन कर रहे थे। कवि भोलानाथ शेखर को मंच पर काव्य पाठ के लिए आहूत किया गया। उन्होंने नारी महिमा पर अपनी प्रसिद्ध रचना पेश की और संचालक से निवेदन किया कि उनके पौत्र को भी पढ़वा दें। डॉ. बृजेंद्र अवस्थी ने उनके पौत्र को मंच पर बुलाया। उस बच्चे ने शेखर की कविता इतनी ओजस्वी वाणी में प्रस्तुत की कि पूरा मंच वाह- वाह कर उठा। प्रसन्नता के इस अतिरेक में शेखर जी की वाणी रूंध गई। उनके मुख से निकला  ‘वाह बेटा’ और वह संचालक की गोद में लुढ़क गए। भोला नाथ शेखर के मुख से निकले यह अंतिम शब्द थे। कुछ देर बाद ही उनका निधन हो गया। कवि सम्मेलन समाप्त कर दिया गया। उस दिन 13 अक्टूबर 1965 था।

भोलानाथ शेखर की जयंती और पुण्यतिथि उनके परिवार के लोग शहर के हिंदी प्रेमियों और साहित्यकारों के साथ हर साल मनाते हैं। गुरुवार को उनकी जयंती सादगी के साथ मनाई जा रही है। 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed