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कालेश्वरन मंदिर : श्रद्धा से मांगी भक्तों की हर मुराद होती है पूरी
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कालेश्वरन मंदिर
स्थानीय लोगों ने 1979 में कराया था मंदिर का निर्माण
तिकुनिया। बेलरायां-तिकुनिया रोड पर स्थित कालेश्वरन शिव मंदिर में श्रद्धालुओं की बड़ी आस्था है। लोगों का विश्वास है कि यहां श्रद्घा भाव से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। स्थानीय लोगों ने 1979 में मंदिर का निर्माण कराया था।
नेपाल राष्ट्र के तत्कालीन राजा वीरेंद्र वीर विक्रम शाह ने भी मंदिर निर्माण के लिए 31000 रुपये की धनराशि दान की थी। इस बीच नागा साधु रंगीलाल ने मंदिर परिसर में कड़ाके की धूप और बारिश में चारों तरफ अग्नि जलाकर मध्य में बैठकर दो वर्ष तक तपस्या की, जो काफी चर्चा में रही। उनका त्रिशूल आज भी यहां मौजूद है। मंदिर के निकट 1000 साल पुराना पीपल का पेड़ है, जो ब्रह्मबाबा के नाम से प्रसिद्घ है। मौसम के बड़े-बड़े थपेड़े झेलने के बाद भी आज तक इसकी एक टहनी भी नहीं गिरी है। गायत्री परिवार इस मंदिर में 131 जोड़ों का विवाह करा चुका है। वर्ष 1980 से 1986 तक यहां रामलीला मेला भी हुआ। सागर बाबा ने मंदिर की देखरेख और पूजा पाठ का कार्यभार संभाला। सागर बाबा के बाद वर्ष 1990 से रामकृष्ण गिरी मंदिर में पूजा पाठ कर रहे हैं। जिला पंचायत सदस्य लक्ष्मी नारायण वर्मा ने बताया कि मंदिर पर क्षेत्रीय लोगों के सहयोग से 1995 से 2 वर्ष के अंतराल में गायत्री यज्ञ कराया जाता है। सावन के महीने में मंदिर में दूर दराज से आए श्रद्घालु यहां जमा होकर शिव का जलाभिषेक करते हैं।
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तिकुनिया। बेलरायां-तिकुनिया रोड पर स्थित कालेश्वरन शिव मंदिर में श्रद्धालुओं की बड़ी आस्था है। लोगों का विश्वास है कि यहां श्रद्घा भाव से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। स्थानीय लोगों ने 1979 में मंदिर का निर्माण कराया था।
नेपाल राष्ट्र के तत्कालीन राजा वीरेंद्र वीर विक्रम शाह ने भी मंदिर निर्माण के लिए 31000 रुपये की धनराशि दान की थी। इस बीच नागा साधु रंगीलाल ने मंदिर परिसर में कड़ाके की धूप और बारिश में चारों तरफ अग्नि जलाकर मध्य में बैठकर दो वर्ष तक तपस्या की, जो काफी चर्चा में रही। उनका त्रिशूल आज भी यहां मौजूद है। मंदिर के निकट 1000 साल पुराना पीपल का पेड़ है, जो ब्रह्मबाबा के नाम से प्रसिद्घ है। मौसम के बड़े-बड़े थपेड़े झेलने के बाद भी आज तक इसकी एक टहनी भी नहीं गिरी है। गायत्री परिवार इस मंदिर में 131 जोड़ों का विवाह करा चुका है। वर्ष 1980 से 1986 तक यहां रामलीला मेला भी हुआ। सागर बाबा ने मंदिर की देखरेख और पूजा पाठ का कार्यभार संभाला। सागर बाबा के बाद वर्ष 1990 से रामकृष्ण गिरी मंदिर में पूजा पाठ कर रहे हैं। जिला पंचायत सदस्य लक्ष्मी नारायण वर्मा ने बताया कि मंदिर पर क्षेत्रीय लोगों के सहयोग से 1995 से 2 वर्ष के अंतराल में गायत्री यज्ञ कराया जाता है। सावन के महीने में मंदिर में दूर दराज से आए श्रद्घालु यहां जमा होकर शिव का जलाभिषेक करते हैं।
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