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गीता के प्रथम अध्याय की व्याख्या

Mon, 04 May 2015 08:21 PM IST
लखीमपुर खीरी।
लखीमपुर खीरी। Updated Mon, 04 May 2015 08:21 PM IST
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Interpretation of the first chapter of the Gita
संस्कार भारती के तत्वावधान में गीता ज्ञानयज्ञ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। मुड़िया महंत मंदिर में हुए इस कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. दयानंद शुक्ल ने की। मुख्य अतिथि मेजर यज्ञदत्त मिश्र ने दीप जलाकर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। डॉ. सुरचना त्रिवेदी ने गीता के प्रथम अध्याय के श्लोकों का सस्वर पाठ कर उनकी व्याख्या की।
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डॉ. सुरेश चंद्र मिश्र ने कहा कि नायक दुर्योधन दुर्बुद्धि और अर्जुन विचारवान बुद्धि का प्रतीक है। हरिप्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि पूरी गीता का सार है कि हम कर्म में प्रवृत्त हों और फल की इच्छा न करें। डॉ. श्रीराम सिंह ने कहा कि गीता में वेदों और उपनिषदों का सार है। मनोबल गिरने से मनुष्य कभी विजय नहीं पा सकता।
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डॉ. दयानंद शुक्ल ने कहा कि आसक्ति ही मोह का कारण है। इसके अलावा हरीश बरनवाल और यज्ञदत्त मिश्र ने भी अपने विचार व्यक्त किए। संचालन महामंत्री डॉ. नमिता श्रीवास्तव ने किया। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से संयोजक सिद्ध गोपाल तिवारी, प्रांतीय महामंत्री राजकिशोर पांडेय प्रहरी, सुनीता शुक्ला, मधूलिका त्रिपाठी, अंबरीश सोनी, छोटे लाल, संजीव त्रिवेदी और पंकज कृष्ण शास्त्री आदि मौजूद रहे।
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