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तराई में तेजी से लुप्त होते जा रहे हैं गिद्ध
लखीमपुर खीरी
Updated Fri, 04 Sep 2015 11:52 PM IST
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प्रकृति में सफाईकर्मी की महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गिद्ध लुप्त होते जा रहे हैं, इससे पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। पशु चिकित्सा में बुखार, सूजन, दर्द आदि में उपयोग की जाने वाली डेक्लोफेनिक दवा गिद्धों के लिए काफी घातक हो रही है। गिद्धों की संख्या में लगातार आ रही कमी से मानव जीवन पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि गिद्ध मृत पशुओं को खाकर हमें कई तरह की बीमारियों से बचाते हैं। गिद्ध की कुल 22 प्रजातियां हैं, इनमें से 15 पूर्वी देशों में और सात पश्चिमी देशों में पाई जाती हैं। गिद्ध की चोंच लंबी और अंकुशनुमा होती है। वह मृत जानवर को नोंचकर खाने के तुरंत बाद स्नान करना पसंद करते हैं। इस तरह वह खुद को कई तरह की बीमारियों से बचाते हैं। पक्षी विज्ञानी पुष्पेंद्र वर्मा का कहना है कि मनुष्य के पाचनतंत्र में रहने वाले वैक्टीरिया की संख्या और प्रजातियों में पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदलाव आया है जिसके कारण इंसानों में मोटापा, मधुमेह और असाध्य बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। वैक्टीरिया में यह बदलाव कहीं न कहीं गिद्धों के विलुप्त होने से संबंधित है।
ये हैं गिद्धों की प्रजातियां
-इजिप्शियन वल्चर (गोबर गिद्ध)
-जिप्स इंडिकस वल्चर
-व्हाइट वैक्ड वल्चर (सकुन या चामड़ गिद्ध)
-स्लेंडर विल्ड वल्चर
-किंग वल्चर (राज गिद्ध लाल सिर गिद्ध)
-ग्रिफान वल्चर
-सिनोरियस वल्चर
-हिमालयन ग्रिफान
तराई में 98 फीसदी घटी आबादी
पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. वीपी सिंह का कहना है पिछले दस साल में तराई में गिद्धों की आबादी में 98 फीसदी तक गिरावट आई है। करीब 20 साल पहले तक जिले में करीब एक लाख गिद्ध थे अब इनकी संख्या घटकर 500 रह गई है। स्लेंडर विल्ड वल्चर में 99 फीसदी तो व्हाइट नेक्ड वल्चर में 95 फीसदी तक कमी दर्ज की गई है। उनका कहना है कि यदि गिद्धों की आबादी में इसी तरह गिरावट जारी रही तो आने वाले 15 साल में तराई से गिद्ध पूरी तरह लुप्त हो जाएंगे।
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डेक्लोफेनिक दवा बन रही गिद्धों के लिए काल
वन विभाग के डिप्टी रेंजर और पक्षी विशेषज्ञ अशोक कश्यप कहते हैं कि पशु चिकित्सा में बुखार, सूजन और दर्द में उपयोग होने वाली डेक्लोफेनिक दवा गिद्धों के लिए काल साबित हो रही है। डेक्लोफेनिक दवा लेने वाले वाले पशुओं की मौत होने पर जब गिद्ध उनका मांस खाते हैं तो गिद्ध के गुर्दे में गाउट नामक रोग हो जाता है इससे उनकी मौत हो जाती है। तराई नेचर कंजरवेशन सोसायटी तराई को डेक्लोफेनिक फ्री जोन बनाने की दिशा में पिछले कई साल से काम कर रहा है।
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पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि गिद्ध मृत पशुओं को खाकर हमें कई तरह की बीमारियों से बचाते हैं। गिद्ध की कुल 22 प्रजातियां हैं, इनमें से 15 पूर्वी देशों में और सात पश्चिमी देशों में पाई जाती हैं। गिद्ध की चोंच लंबी और अंकुशनुमा होती है। वह मृत जानवर को नोंचकर खाने के तुरंत बाद स्नान करना पसंद करते हैं। इस तरह वह खुद को कई तरह की बीमारियों से बचाते हैं। पक्षी विज्ञानी पुष्पेंद्र वर्मा का कहना है कि मनुष्य के पाचनतंत्र में रहने वाले वैक्टीरिया की संख्या और प्रजातियों में पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदलाव आया है जिसके कारण इंसानों में मोटापा, मधुमेह और असाध्य बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। वैक्टीरिया में यह बदलाव कहीं न कहीं गिद्धों के विलुप्त होने से संबंधित है।
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ये हैं गिद्धों की प्रजातियां
-इजिप्शियन वल्चर (गोबर गिद्ध)
-जिप्स इंडिकस वल्चर
-व्हाइट वैक्ड वल्चर (सकुन या चामड़ गिद्ध)
-स्लेंडर विल्ड वल्चर
-किंग वल्चर (राज गिद्ध लाल सिर गिद्ध)
-ग्रिफान वल्चर
-सिनोरियस वल्चर
-हिमालयन ग्रिफान
तराई में 98 फीसदी घटी आबादी
पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. वीपी सिंह का कहना है पिछले दस साल में तराई में गिद्धों की आबादी में 98 फीसदी तक गिरावट आई है। करीब 20 साल पहले तक जिले में करीब एक लाख गिद्ध थे अब इनकी संख्या घटकर 500 रह गई है। स्लेंडर विल्ड वल्चर में 99 फीसदी तो व्हाइट नेक्ड वल्चर में 95 फीसदी तक कमी दर्ज की गई है। उनका कहना है कि यदि गिद्धों की आबादी में इसी तरह गिरावट जारी रही तो आने वाले 15 साल में तराई से गिद्ध पूरी तरह लुप्त हो जाएंगे।
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डेक्लोफेनिक दवा बन रही गिद्धों के लिए काल
वन विभाग के डिप्टी रेंजर और पक्षी विशेषज्ञ अशोक कश्यप कहते हैं कि पशु चिकित्सा में बुखार, सूजन और दर्द में उपयोग होने वाली डेक्लोफेनिक दवा गिद्धों के लिए काल साबित हो रही है। डेक्लोफेनिक दवा लेने वाले वाले पशुओं की मौत होने पर जब गिद्ध उनका मांस खाते हैं तो गिद्ध के गुर्दे में गाउट नामक रोग हो जाता है इससे उनकी मौत हो जाती है। तराई नेचर कंजरवेशन सोसायटी तराई को डेक्लोफेनिक फ्री जोन बनाने की दिशा में पिछले कई साल से काम कर रहा है।