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Lakhimpur Kheri News: 62 साल की लड़ाई के बाद वन विभाग को मिली जमीन
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लखीमपुर खीरी। ग्रामसभा और वन विभाग के बीच दशकों से चल रही जमीन की लड़ाई का 62 साल बाद फैसला हो गया है। वन विभाग लगातार अपनी दावेदारी मजबूती के साथ पेश करता रहा। अब चकबंदी विभाग ने इस जमीन को वन विभाग के खाते में दर्ज करने का आदेश जारी कर दिया है।
निघासन के बैलहा गांव स्थित जमीन की दावेदारी को लेकर वन विभाग सहित दो पक्षों में वर्ष 1962 से मामला चल रहा था। यह जमीन चंद्रभाल आदि के नाम दर्ज थी। वन विभाग ने इस पर आपत्ति लगाते हुए अपनी जमीन होने का दावा किया।
राज्यपाल की ओर से भारतीय वन अधिनियम धारा-20 के तहत यह जमीन वन विभाग को घोषित कर दी गई। सुनवाई करते हुए चकबंदी अधिकारी अंतिम अभिलेख द्वितीय ने इस जमीन को वन विभाग के खाते में दर्ज करने का आदेश दिया है।
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जारी आदेश में कहा है कि वनाधिकारी दक्षिण निघासन रेंज उत्तर खीरी की आपत्ति स्वीकार की जाती है। दर्ज खातों में अंकित गाटा संख्या 1621/1.513 हेक्टेयर लिखित खातेदार से खारिज करके वन भूमि में दर्ज की जाए।
यह मामला दशकों से चल रहा था। चकबंदी अधिकारी द्वितीय आरके गुप्ता ने बताया यह जमीन ग्राम सभा के नवीन पर्ती के खाते में दर्ज थी। इस पर वन विभाग ने आपत्ति दाखिल की थी।
चकबंदी अधिकारी द्वितीय के न्यायालय में मामला चला, जिसमें पाया गया कि धारा-20 की घोषित वन भूमि मानी जाती है। इसके बाद यह जमीन वन विभाग के खाते में दर्ज की दी गई।
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निघासन के बैलहा गांव स्थित जमीन की दावेदारी को लेकर वन विभाग सहित दो पक्षों में वर्ष 1962 से मामला चल रहा था। यह जमीन चंद्रभाल आदि के नाम दर्ज थी। वन विभाग ने इस पर आपत्ति लगाते हुए अपनी जमीन होने का दावा किया।
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राज्यपाल की ओर से भारतीय वन अधिनियम धारा-20 के तहत यह जमीन वन विभाग को घोषित कर दी गई। सुनवाई करते हुए चकबंदी अधिकारी अंतिम अभिलेख द्वितीय ने इस जमीन को वन विभाग के खाते में दर्ज करने का आदेश दिया है।
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जारी आदेश में कहा है कि वनाधिकारी दक्षिण निघासन रेंज उत्तर खीरी की आपत्ति स्वीकार की जाती है। दर्ज खातों में अंकित गाटा संख्या 1621/1.513 हेक्टेयर लिखित खातेदार से खारिज करके वन भूमि में दर्ज की जाए।
यह मामला दशकों से चल रहा था। चकबंदी अधिकारी द्वितीय आरके गुप्ता ने बताया यह जमीन ग्राम सभा के नवीन पर्ती के खाते में दर्ज थी। इस पर वन विभाग ने आपत्ति दाखिल की थी।
चकबंदी अधिकारी द्वितीय के न्यायालय में मामला चला, जिसमें पाया गया कि धारा-20 की घोषित वन भूमि मानी जाती है। इसके बाद यह जमीन वन विभाग के खाते में दर्ज की दी गई।