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गिरफ्तार हुए फरार बंदी, कारागार को खबर नहीं
लखीमपुर खीरी।
Updated Wed, 20 Jan 2016 07:21 PM IST
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बंदियों की सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद बताने वाला कारागार विभाग बंदियों की फरारी पर कितना संजीदा है, इसका खुलासा एक आरटीआई अर्जी से मिले जवाब से हो गया है। जिला कारागार के मेन गेट से बंदियों की फरारी के मामले में मजिस्ट्रेटी जांच डेढ़ साल बाद भी विभाग को नहीं मिल सकी है, वहीं संवेदनहीनता का यह आलम है कि फरार बंदी के पकड़े जाने के बावजूद फरारी से संबंधित कोई बयान नहीं लिया गया है। इतना ही नहीं कारागार मुख्यालय को यह खबर तक नहीं है कि जिला जेल से फरार हुए दोनो बंदी पकड़े जा चुके हैं।
बताते चले कि जेल की चहारदीवारी को धता बताते हुए जिला जेल के मेन गेट से तीन जुलाई 2014 की सुबह दो बंदी फरार हो गए थे, सूत्र बताते है कि जिला जेल के मेन गेट से फरार हुए बंदियों के पास तमंचे भी थे, जो वह जेल के भीतर से ही लेकर निकले थे। इस मामले में खुद की गर्दन फंसते हुए जेल प्रशासन सीधे तौर पर इंकार करता रहा कि फरार बंदियों के पास किसी तरह का कोई तमंचा या हथियार नहीं था। बाद में जब फरारी के दौरान बंदियों ने उसी तमंचे को दिखाकर एक बाइक लूट ली थी तो कोतवाली पुलिस ने भी माना कि फरार हो रहे बंदियों के पास तमंचे थे। इस मामले में जिला प्रशासन ने मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए थे और एसडीएम सदर को मजिस्ट्रयल जांच की जिम्मेदारी सौंपी थी। इस बारे हाईकोर्ट के वकील नीरज रस्तोगी ने आईजी जेल से सूचनाएं मांगी थी कि फरार हुए बंदियों की गिरफ्तारी के बाद क्या उनके बयान दर्ज किए गए है, जिसका जवाब देते हुए डीआईजी जेल आरपी सिंह ने बताया कि फरार हुए बंदियों में से एक बंदी रविंद्र लोध ही पकड़ा जा सका है, लेकिन पकड़े जाने के बाद बंदी के बयान प्राप्त नहीं हुए है। वहीं, मजिस्ट्रेटी जांच भी उन्हें नहीं मिली है। सबसे हैरत की बात है कि फरार होने वाले दोनो बंदी अजय तिवारी और रविंद्र लोध पहले ही पकडे़ जा चुके है, लेकिन डीआईजी जेल ने अपने जवाब में बताया है कि एक बंदी ही पकड़ा जा सका है।
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बताते चले कि जेल की चहारदीवारी को धता बताते हुए जिला जेल के मेन गेट से तीन जुलाई 2014 की सुबह दो बंदी फरार हो गए थे, सूत्र बताते है कि जिला जेल के मेन गेट से फरार हुए बंदियों के पास तमंचे भी थे, जो वह जेल के भीतर से ही लेकर निकले थे। इस मामले में खुद की गर्दन फंसते हुए जेल प्रशासन सीधे तौर पर इंकार करता रहा कि फरार बंदियों के पास किसी तरह का कोई तमंचा या हथियार नहीं था। बाद में जब फरारी के दौरान बंदियों ने उसी तमंचे को दिखाकर एक बाइक लूट ली थी तो कोतवाली पुलिस ने भी माना कि फरार हो रहे बंदियों के पास तमंचे थे। इस मामले में जिला प्रशासन ने मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए थे और एसडीएम सदर को मजिस्ट्रयल जांच की जिम्मेदारी सौंपी थी। इस बारे हाईकोर्ट के वकील नीरज रस्तोगी ने आईजी जेल से सूचनाएं मांगी थी कि फरार हुए बंदियों की गिरफ्तारी के बाद क्या उनके बयान दर्ज किए गए है, जिसका जवाब देते हुए डीआईजी जेल आरपी सिंह ने बताया कि फरार हुए बंदियों में से एक बंदी रविंद्र लोध ही पकड़ा जा सका है, लेकिन पकड़े जाने के बाद बंदी के बयान प्राप्त नहीं हुए है। वहीं, मजिस्ट्रेटी जांच भी उन्हें नहीं मिली है। सबसे हैरत की बात है कि फरार होने वाले दोनो बंदी अजय तिवारी और रविंद्र लोध पहले ही पकडे़ जा चुके है, लेकिन डीआईजी जेल ने अपने जवाब में बताया है कि एक बंदी ही पकड़ा जा सका है।
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