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पल भर में ही बिखर गया कुनबा
Updated Tue, 12 Sep 2017 11:29 PM IST
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पल भर में ही बिखर गया कुनबा
- फोटो : लखीमपुर खीरी, अमर उजाला
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गोला गोकर्णनाथ।
गांव ककलापुर के ग्रामीणों के लिए मंगलवार काला दिन साबित हुआ। गांव के अरविंद और उसके के दो बच्चों की मौत से उसके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। पति और दो मासूम बेटों को खोने वाली पत्नी और परिवार के अन्य सदस्यों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। छोटी सी झोपड़ी में मेहनत-मजदूरी कर परिवार पाल रहे अरविंद की मौत से पल भर में ही पूरा कुनबा बिखर गया।
ककलापुर निवासी अरविंद मजदूर पेशा था। उसकी माली हालत काफी खराब थी। टूटे छप्पर पर पॉलीथिन तानकर पत्नी रूबी, तीन बच्चों- विशाल, निशाल और नन्हीं बेटी नीति के साथ रहता था। पांच दिन पहले पत्नी रूबी पुत्री नीति को साथ लेकर मायके गई थी, जिसे विदा कराने के लिए अरविंद अपने दो बच्चों के साथ पत्नी को लेने मैलानी जाने के लिए निकला था और पल भर में गुजरे एक ट्रक की छोटी से गलती ने तीनों की जान ले ली। हर कोई फफक रहे था। गांव के लोगों के चेहरे पर मातम और बूढ़े माता-पिता की दहाड़ें मानों आसमान का सीना चीर रही थीं। पत्नी रूबी को विदा कराने निकले अरविंद को क्या पता था कि उसका और उसके बच्चों का इस संसार से नाता टूटने वाला है। ट्रक के नीचे दबे शवों को जब ग्रामीणों ने कड़ी मशक्कत के बाद बाहर निकाला तो तीनों शवों को बेहद बुरा हाल था। मौके पर पहुंचे मृतक के वृद्ध पिता रमेश, मां कल्लू देवी कभी दोनों पोतों तो कभी पुत्र के सीने से लिपटकर दहाड़े मार कर रो रहे थे। जिन्हें देखकर वहां मौजूद लोग भी अपने आंसू नहीं रोक सके।
चूल्हे की बुझी राख बयां कर रही बदनसीबी की दास्तां
ककलापुर गांव में मातमी सन्नाटा है। मृतक की झोपड़ी में पड़ा तख्त, बिस्तर की गठरी, रस्सी पर लटकते कपड़े और चूल्हे की बुझी राख गरीबी और उसकी बदनसीबी की दास्तां बयां कर रहे हैं। ऐसा लग रहा था कि मानों अरविंद यह सोच कर घर से निकला होगा कि पत्नी रूबी के आने पर चूल्हे में आग भड़केगी।
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राशन कार्ड तक नहीं, मजदूरी के सहारे कटती थी जिंदगी
परिवार वालों और गांव के लोगों ने बताया कि अरविंद भूमिहीन और कम-पढ़ा लिखा था। वह मेहनत मजदूरी कर परिवार पालता था। कई वर्ष पूर्व शासन से एक आवास स्वीकृत हुआ, जिस पर अभी तक छत भी नहीं पड़ी है। मृतक के परिवार के पास सरकारी सुविधाएं तो दूर राशन कार्ड तक नहीं है। सरकार ने चाहे कितनी ही योजनाएं चलाई हों, प्रशासनिक तंत्र चाहे कितने भी प्रयास कर रहा हो, फिर भी ना जाने कितनी जिंदगियां यूं ही गुमनामी में जी रही हैं।
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गांव ककलापुर के ग्रामीणों के लिए मंगलवार काला दिन साबित हुआ। गांव के अरविंद और उसके के दो बच्चों की मौत से उसके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। पति और दो मासूम बेटों को खोने वाली पत्नी और परिवार के अन्य सदस्यों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। छोटी सी झोपड़ी में मेहनत-मजदूरी कर परिवार पाल रहे अरविंद की मौत से पल भर में ही पूरा कुनबा बिखर गया।
ककलापुर निवासी अरविंद मजदूर पेशा था। उसकी माली हालत काफी खराब थी। टूटे छप्पर पर पॉलीथिन तानकर पत्नी रूबी, तीन बच्चों- विशाल, निशाल और नन्हीं बेटी नीति के साथ रहता था। पांच दिन पहले पत्नी रूबी पुत्री नीति को साथ लेकर मायके गई थी, जिसे विदा कराने के लिए अरविंद अपने दो बच्चों के साथ पत्नी को लेने मैलानी जाने के लिए निकला था और पल भर में गुजरे एक ट्रक की छोटी से गलती ने तीनों की जान ले ली। हर कोई फफक रहे था। गांव के लोगों के चेहरे पर मातम और बूढ़े माता-पिता की दहाड़ें मानों आसमान का सीना चीर रही थीं। पत्नी रूबी को विदा कराने निकले अरविंद को क्या पता था कि उसका और उसके बच्चों का इस संसार से नाता टूटने वाला है। ट्रक के नीचे दबे शवों को जब ग्रामीणों ने कड़ी मशक्कत के बाद बाहर निकाला तो तीनों शवों को बेहद बुरा हाल था। मौके पर पहुंचे मृतक के वृद्ध पिता रमेश, मां कल्लू देवी कभी दोनों पोतों तो कभी पुत्र के सीने से लिपटकर दहाड़े मार कर रो रहे थे। जिन्हें देखकर वहां मौजूद लोग भी अपने आंसू नहीं रोक सके।
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चूल्हे की बुझी राख बयां कर रही बदनसीबी की दास्तां
ककलापुर गांव में मातमी सन्नाटा है। मृतक की झोपड़ी में पड़ा तख्त, बिस्तर की गठरी, रस्सी पर लटकते कपड़े और चूल्हे की बुझी राख गरीबी और उसकी बदनसीबी की दास्तां बयां कर रहे हैं। ऐसा लग रहा था कि मानों अरविंद यह सोच कर घर से निकला होगा कि पत्नी रूबी के आने पर चूल्हे में आग भड़केगी।
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राशन कार्ड तक नहीं, मजदूरी के सहारे कटती थी जिंदगी
परिवार वालों और गांव के लोगों ने बताया कि अरविंद भूमिहीन और कम-पढ़ा लिखा था। वह मेहनत मजदूरी कर परिवार पालता था। कई वर्ष पूर्व शासन से एक आवास स्वीकृत हुआ, जिस पर अभी तक छत भी नहीं पड़ी है। मृतक के परिवार के पास सरकारी सुविधाएं तो दूर राशन कार्ड तक नहीं है। सरकार ने चाहे कितनी ही योजनाएं चलाई हों, प्रशासनिक तंत्र चाहे कितने भी प्रयास कर रहा हो, फिर भी ना जाने कितनी जिंदगियां यूं ही गुमनामी में जी रही हैं।