{"_id":"5fa449ef8ebc3e9bb2207cf2","slug":"civic-amenities-lakhimpur-news-bly4259627113","type":"story","status":"publish","title_hn":"415 साल में पहली बार नहीं लगेगा ठुठवा मेला","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
415 साल में पहली बार नहीं लगेगा ठुठवा मेला
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
धौरहरा। इलाके की शान कहे जाने वाले ठुठवा मेले पर भी अब कोरोना का ग्रहण लग गया है। कार्तिक पूर्णिमा पर 415 सालों से लगता आ रहा मेला इस बार नहीं लगेगा।
बुजुर्ग बताते हैं कि सरयू नदी किनारे जागड़ा राजा मित्र राजाओं के साथ रुककर जनता दरबार लगाते थे। राजतंत्र समाप्त होने के बाद भी यहां जनता दरबार लगता रहा। बस फर्क बस इतना था तब राजाओं का जनता दरबार था और अब जनता और सत्ता के मिलन का जरिया बन गया। भाजपा, सपा, कांग्रेस और बसपा सहित सभी दलों के नेता अपने पंडाल लगाकर जनता से मेले में रूबरू होते थे, लेकिन कोरोना संकट के चलते चार सौ वर्ष पुरानी इस परंपरा को इस बार ग्रहण लग गया है। इस बार मेला नहीं लगेगा। इससे राजा रंजीत सिंह के वंशज राजा राजेंद्र प्रताप सिंह सहित क्षेत्र के लोग काफी दुखी है।
-------
प्रशासनिक अधिकारी ही करते थे इस मेले की व्यवस्था
मेले की जिम्मेदारी प्रशासनिक अधिकारियों के हाथों में रहती थी। इसकी वजह राजनीतिक दलों का जमावड़ा भी था। इस बार मेले की कोई अनुमति नहीं मिली है। न ही किसी प्रशासनिक अधिकारी ने मेला भूमि का चिह्नीकरण किया है।
-----------
शर्तों पर ही होगी सरयू स्नान की अनुमति
कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाला ऐतिहासिक ठुठवा मेला तो इस बार नहीं लगेगा, लेकिन धार्मिक व्यवस्था को देखते हुए सरयू नदी में स्नान करने की छूट होगी। बस श्रद्धालुओं को कोविड नियमों का पालन करना होगा। घाटों पर पुलिस ड्यूटी भी रहेगी। एसडीएम एस सुधाकरन ने बताया कि कोविड नियमों का पालन करते हुए लोग सरयू नदी में स्नान कर सकते हैं।
विज्ञापन
----------
ग्रामीण बोले
सरयू नदी के तट पर सैकड़ों वर्षों से लगने वाले मेले का सभी को इंतजार रहता है। इस बार मेला न लगने से सभी लोग निराश है। अवध की सांस्कृतिक विरासत की झलक के साथ धार्मिक आस्था की विरासत इस मेले की पहचान है।
-छेददु मिश्रा निवासी ईसानगर
-------------
करीब 415 वर्ष पहले जांगड़ा राजा रंजीत सिंह ने यह मेला कराया था। तब से मेला होता आया है। इस बार मेला न लगना निराशजनक है। कतकी मेले के नाम से मशहूर इस मेले में ग्रामीण परिदृश्य की अमिट छाप देखने को मिलती थी।
-टंडन मिश्रा निवासी ईसानगर
------------
ठुठवा व कतकी मेले के नाम से मशहूर ये मेला ऐतिहासिक व प्राचीन है। उपयोगी वस्तुओं की खरीद फरोख्त और आध्यात्मिक साधना के साथ ग्रामीणों के मनोरंजन का भी साधन है। इस बार मेला न लगने से सभी लोग निराश हैं।
-बैजनाथ बाजपेई, निवासी ईसानगर
------------
मेले निरस्त हो जाने से हम मायूस हैं। ये मेला जितना धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण है उतना ही आर्थिक रूप से। मेला न लगने से व्यापारियों का भी काफी नुकसान होगा। सरकार जब बिहार में रैली करा रही है तो मेला रोकना मेरी समझ से परे है।
-श्याम लाल गुप्ता निवासी ईसानगर
------------
ठुठवा मेले का आयोजन दादा रंजीत सिंह द्वारा 1605 में शुरू कराया गया था। मेले की व्यवस्था प्रशासन करता है। मेले की जगह का चयन ईसानगर व धौरहरा के हलवाई करते हैं। कोरोना को देखते हुए प्रशासन को निर्णय करना है। मेला इस बार लगे या न लगे।
-राजा राजेंद्र प्रताप सिंह, संरक्षक ठुठवा मेला
विज्ञापन
बुजुर्ग बताते हैं कि सरयू नदी किनारे जागड़ा राजा मित्र राजाओं के साथ रुककर जनता दरबार लगाते थे। राजतंत्र समाप्त होने के बाद भी यहां जनता दरबार लगता रहा। बस फर्क बस इतना था तब राजाओं का जनता दरबार था और अब जनता और सत्ता के मिलन का जरिया बन गया। भाजपा, सपा, कांग्रेस और बसपा सहित सभी दलों के नेता अपने पंडाल लगाकर जनता से मेले में रूबरू होते थे, लेकिन कोरोना संकट के चलते चार सौ वर्ष पुरानी इस परंपरा को इस बार ग्रहण लग गया है। इस बार मेला नहीं लगेगा। इससे राजा रंजीत सिंह के वंशज राजा राजेंद्र प्रताप सिंह सहित क्षेत्र के लोग काफी दुखी है।
-------
प्रशासनिक अधिकारी ही करते थे इस मेले की व्यवस्था
मेले की जिम्मेदारी प्रशासनिक अधिकारियों के हाथों में रहती थी। इसकी वजह राजनीतिक दलों का जमावड़ा भी था। इस बार मेले की कोई अनुमति नहीं मिली है। न ही किसी प्रशासनिक अधिकारी ने मेला भूमि का चिह्नीकरण किया है।
विज्ञापन
-----------
शर्तों पर ही होगी सरयू स्नान की अनुमति
कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाला ऐतिहासिक ठुठवा मेला तो इस बार नहीं लगेगा, लेकिन धार्मिक व्यवस्था को देखते हुए सरयू नदी में स्नान करने की छूट होगी। बस श्रद्धालुओं को कोविड नियमों का पालन करना होगा। घाटों पर पुलिस ड्यूटी भी रहेगी। एसडीएम एस सुधाकरन ने बताया कि कोविड नियमों का पालन करते हुए लोग सरयू नदी में स्नान कर सकते हैं।
विज्ञापन
----------
ग्रामीण बोले
सरयू नदी के तट पर सैकड़ों वर्षों से लगने वाले मेले का सभी को इंतजार रहता है। इस बार मेला न लगने से सभी लोग निराश है। अवध की सांस्कृतिक विरासत की झलक के साथ धार्मिक आस्था की विरासत इस मेले की पहचान है।
-छेददु मिश्रा निवासी ईसानगर
-------------
करीब 415 वर्ष पहले जांगड़ा राजा रंजीत सिंह ने यह मेला कराया था। तब से मेला होता आया है। इस बार मेला न लगना निराशजनक है। कतकी मेले के नाम से मशहूर इस मेले में ग्रामीण परिदृश्य की अमिट छाप देखने को मिलती थी।
-टंडन मिश्रा निवासी ईसानगर
------------
ठुठवा व कतकी मेले के नाम से मशहूर ये मेला ऐतिहासिक व प्राचीन है। उपयोगी वस्तुओं की खरीद फरोख्त और आध्यात्मिक साधना के साथ ग्रामीणों के मनोरंजन का भी साधन है। इस बार मेला न लगने से सभी लोग निराश हैं।
-बैजनाथ बाजपेई, निवासी ईसानगर
------------
मेले निरस्त हो जाने से हम मायूस हैं। ये मेला जितना धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण है उतना ही आर्थिक रूप से। मेला न लगने से व्यापारियों का भी काफी नुकसान होगा। सरकार जब बिहार में रैली करा रही है तो मेला रोकना मेरी समझ से परे है।
-श्याम लाल गुप्ता निवासी ईसानगर
------------
ठुठवा मेले का आयोजन दादा रंजीत सिंह द्वारा 1605 में शुरू कराया गया था। मेले की व्यवस्था प्रशासन करता है। मेले की जगह का चयन ईसानगर व धौरहरा के हलवाई करते हैं। कोरोना को देखते हुए प्रशासन को निर्णय करना है। मेला इस बार लगे या न लगे।
-राजा राजेंद्र प्रताप सिंह, संरक्षक ठुठवा मेला