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कभी बांकेगंज के नाम से हुआ करती थी विधानसभा सीट
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कभी बांकेगंज नाम से थी विधानसभा सीट।
- फोटो : LAKHIMPUR
अनिल मिश्र
बांकेगंज। आजादी के बाद से कई बार हुए परिसीमन में बांकेगंज फुटबॉल की तरह कभी पैला तो कभी पलिया के बीच लुढ़कता नजर आया। वर्ष 1962 के पहले हुए परिसीमन में जब पैला विधानसभा सीट आस्तित्व में आई तो बांकेगंज उसका हिस्सा बना। 1967 में पैला विधानसभा क्षेत्र को बांकेगंज के नाम से जाना गया। 1969 में बांकेगंज की रुतबा कायम रहा। लेकिन, अभी तक क्षेत्र की स्थिति बदल नहीं पाई है।
आजादी के बाद 1952 में खीरी जिले में केवल चार सीटे थी। 1957 में बढ़कर ये पांच हुईं और 1962 के चुनाव से पहले हुए परिसीमन में सात सीटें बनाई गईं। यह स्थिति 2008 तक बरकरार रही। उस समय बांकेगंज कस्बा और क्षेत्र पैला विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा बना। 1967 में पैला विधानसभा क्षेत्र का नाम बदलकर बांकेगंज कर दिया गया। 1967 में भी इसी नाम से चुनाव हुआ,लेकिन 1967 के बाद 1912 तक यह सीट पैला विधानसभा क्षेत्र के नाम से ही जानी जाती रही,लेकिन बांकेगंज क्षेत्र पैला में ही शामिल रहा।
वर्ष 1962 में पैला विधानसभा क्षेत्र के नाम से जो चुनाव हुआ उसमें बांकेगंज विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के छेदालाल चौधरी विधायक बने तो 1962 में बांकेगंज विधानसभा क्षेत्र से दुर्गा प्रसाद चौधरी जनसंघ के टिकट पर चुनाव जीते। इसके बाद फिर नाम बदलकर पैला हो जाने के बाद क्रमश: 1969 और 1974 में कांग्रेस के छेदालाल चौधरी लगातार दो बार 1977 जनता पार्टी के नंगाराम,1980 में कांग्रेस के छेदालाल चौधरी,1985 में लोकदल से नंगाराम, 1989 में कांग्रेस के छेदालाल चौधरी 1991 में जनता दल से रामसरन,1993 में भाजपा से शाशिबाला भारती,1996 में सपा से मोतीलाल पैलवी और उसके बाद वर्ष 2002 और 2007 में बसपा के राजेश गौतम चुनाव जीतकर विधायक बने।
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2007 का विधानसभा चुनाव पैला नाम से अंतिम चुनाव था। 2008 में नया परिसीमन हुआ। जिसमें पलिया नाम से नई सीट सृजित हुई। इस परिसीमन में बांकेगंज को पलिया क्षेत्र में शामिल किया गया। इस तरह आजादी के बाद से इस क्षेत्र का चार बार नाम बदला है। 2008 में हुए परिसीमन के बाद 2012 में पहला चुनाव पलिया विधानसभा क्षेत्र के नाम से हुआ। जिसमें रोमी साहनी एक बार बसपा से और दूसरी बार 2017 में भाजपा से चुनाव जीते।
मानक पूरे फिर भी बांकेगंज को नगर पंचायत का दर्जा नहीं
अर्जुनपुर निवासी रमेश कुमार का कहना है कि आजादी के बाद बांकेगंज क्षेत्र का विकास तो जरूर हुआ,लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में आज भी यह क्षेत्र पिछड़ा हुआ है। यहां कोई सरकारी इंटर कॉलेज तक नहीं है। जिससे आठवीं कक्षा पासआउट करने के बाद के बाद छात्र-छात्राओं को 12 किलोमीटर की लंबी दूरी तय कर पढ़ाई के लिए गोला दौड़ना पड़ता है।
खैरताली गांव निवासी मनोज कुमार का कहना है कि नगर पंचायत के लिए जो मानक होने चाहिए बांकेगंज उसे पूरा कर रहा है, बावजूद इसके बांकेगंज को नगर पंचायत का दर्जा अभी तक नहीं मिल सका। सरकारी इंटर कॉलेज नहीं हैं, प्राइवेट तो जरूर है, लेकिन वहां की मंहगी फीस के चलते गरीबों के बच्चे वहां पढ़ाई करने में असमर्थ हैं।
बांकेगंज कस्बा निवासी संजय कुमार का कहना है कि इसे विडंबना ही कहेंगे बांकेगंज ब्लॉक क्षेत्र की सबसे बड़ी पंचायत ग्रंट नंबर 10 है। ब्लॉक मुख्यालय होने के बाद ग्राम पंचायत का नाम बांकेगंज की बजाय ग्रंट नंबर 10 है।
कोठीपुर गांव निवासी प्रमोद कुमार का कहना है कि बांकेगंज कस्बा और ग्रंट नंबर दस के सभी मजरों को मिलाकर इसकी आबादी 25 हजार से अधिक है। टाउन एरिया के लिए यह कस्बा सभी जरूरी मानकों को पूरा करता है। इसके बावजूद बांकेगंज को नगर पंचायत का दर्जा नहीं मिल सका। किसी भी विधायक ने आज तक इसे नगर पंचायत का दर्जा दिलाने की जरूरत नहीं समझी।
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बांकेगंज। आजादी के बाद से कई बार हुए परिसीमन में बांकेगंज फुटबॉल की तरह कभी पैला तो कभी पलिया के बीच लुढ़कता नजर आया। वर्ष 1962 के पहले हुए परिसीमन में जब पैला विधानसभा सीट आस्तित्व में आई तो बांकेगंज उसका हिस्सा बना। 1967 में पैला विधानसभा क्षेत्र को बांकेगंज के नाम से जाना गया। 1969 में बांकेगंज की रुतबा कायम रहा। लेकिन, अभी तक क्षेत्र की स्थिति बदल नहीं पाई है।
आजादी के बाद 1952 में खीरी जिले में केवल चार सीटे थी। 1957 में बढ़कर ये पांच हुईं और 1962 के चुनाव से पहले हुए परिसीमन में सात सीटें बनाई गईं। यह स्थिति 2008 तक बरकरार रही। उस समय बांकेगंज कस्बा और क्षेत्र पैला विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा बना। 1967 में पैला विधानसभा क्षेत्र का नाम बदलकर बांकेगंज कर दिया गया। 1967 में भी इसी नाम से चुनाव हुआ,लेकिन 1967 के बाद 1912 तक यह सीट पैला विधानसभा क्षेत्र के नाम से ही जानी जाती रही,लेकिन बांकेगंज क्षेत्र पैला में ही शामिल रहा।
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वर्ष 1962 में पैला विधानसभा क्षेत्र के नाम से जो चुनाव हुआ उसमें बांकेगंज विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के छेदालाल चौधरी विधायक बने तो 1962 में बांकेगंज विधानसभा क्षेत्र से दुर्गा प्रसाद चौधरी जनसंघ के टिकट पर चुनाव जीते। इसके बाद फिर नाम बदलकर पैला हो जाने के बाद क्रमश: 1969 और 1974 में कांग्रेस के छेदालाल चौधरी लगातार दो बार 1977 जनता पार्टी के नंगाराम,1980 में कांग्रेस के छेदालाल चौधरी,1985 में लोकदल से नंगाराम, 1989 में कांग्रेस के छेदालाल चौधरी 1991 में जनता दल से रामसरन,1993 में भाजपा से शाशिबाला भारती,1996 में सपा से मोतीलाल पैलवी और उसके बाद वर्ष 2002 और 2007 में बसपा के राजेश गौतम चुनाव जीतकर विधायक बने।
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2007 का विधानसभा चुनाव पैला नाम से अंतिम चुनाव था। 2008 में नया परिसीमन हुआ। जिसमें पलिया नाम से नई सीट सृजित हुई। इस परिसीमन में बांकेगंज को पलिया क्षेत्र में शामिल किया गया। इस तरह आजादी के बाद से इस क्षेत्र का चार बार नाम बदला है। 2008 में हुए परिसीमन के बाद 2012 में पहला चुनाव पलिया विधानसभा क्षेत्र के नाम से हुआ। जिसमें रोमी साहनी एक बार बसपा से और दूसरी बार 2017 में भाजपा से चुनाव जीते।
मानक पूरे फिर भी बांकेगंज को नगर पंचायत का दर्जा नहीं
अर्जुनपुर निवासी रमेश कुमार का कहना है कि आजादी के बाद बांकेगंज क्षेत्र का विकास तो जरूर हुआ,लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में आज भी यह क्षेत्र पिछड़ा हुआ है। यहां कोई सरकारी इंटर कॉलेज तक नहीं है। जिससे आठवीं कक्षा पासआउट करने के बाद के बाद छात्र-छात्राओं को 12 किलोमीटर की लंबी दूरी तय कर पढ़ाई के लिए गोला दौड़ना पड़ता है।
खैरताली गांव निवासी मनोज कुमार का कहना है कि नगर पंचायत के लिए जो मानक होने चाहिए बांकेगंज उसे पूरा कर रहा है, बावजूद इसके बांकेगंज को नगर पंचायत का दर्जा अभी तक नहीं मिल सका। सरकारी इंटर कॉलेज नहीं हैं, प्राइवेट तो जरूर है, लेकिन वहां की मंहगी फीस के चलते गरीबों के बच्चे वहां पढ़ाई करने में असमर्थ हैं।
बांकेगंज कस्बा निवासी संजय कुमार का कहना है कि इसे विडंबना ही कहेंगे बांकेगंज ब्लॉक क्षेत्र की सबसे बड़ी पंचायत ग्रंट नंबर 10 है। ब्लॉक मुख्यालय होने के बाद ग्राम पंचायत का नाम बांकेगंज की बजाय ग्रंट नंबर 10 है।
कोठीपुर गांव निवासी प्रमोद कुमार का कहना है कि बांकेगंज कस्बा और ग्रंट नंबर दस के सभी मजरों को मिलाकर इसकी आबादी 25 हजार से अधिक है। टाउन एरिया के लिए यह कस्बा सभी जरूरी मानकों को पूरा करता है। इसके बावजूद बांकेगंज को नगर पंचायत का दर्जा नहीं मिल सका। किसी भी विधायक ने आज तक इसे नगर पंचायत का दर्जा दिलाने की जरूरत नहीं समझी।