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एक वर्ष में हजारों लोग जुड़ गए थे पंडित जी से
Updated Mon, 25 Sep 2017 11:50 PM IST
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पंडित दीनदयाल उपाध्याय
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गोला गोकर्णनाथ।
एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय को वर्ष 1942 में गोला में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचारक नियुक्त किया गया था तो उनकी आत्मीयता और विचारों से प्रभावित होकर नगर और विभिन्न ग्रामों के सभी जाति और वर्गों के लोग उनके साथ जुड़ गए थे।
जब दीनदयाल उपाध्याय नगर में आए थे तब यहां राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की मात्र एक शाखा थी और ग्रामीण अंचल में शाखाएं नगण्य थीं। उनके प्रयासों से नगर और दर्जनों गांव के लोग संघ से जुड़ते गए, जो आजीवन संघ से जुड़े रहे। इस नगर के मोहल्ला पश्चिमी दीक्षिताना में श्री रामलीला मंदिर के प्रांगण में संघ की शाखा लगती थी। दीनदयाल जी ने नगर में लोगों से संपर्क करना शुरू किया तो पश्चिमी दीक्षिताना के प्यारेलाल वाल्मीकि, रामलाल वाल्मीकि, पं. नानकचंद अग्निहोत्री, पं. राजाराम मिश्र, कुम्हार टोला के लक्ष्मण रैदास, करोड़ी सिंह आदि लोग उनके विचारों से प्रभावित होकर संघ की शाखा में आने लगे। इसके बाद कानपुर धर्मशाला, गौशाला स्वामी ब्रह्मानंद आश्रम में भी संघ की शाखाएं लगने लगीं।
सादगी पूर्ण था पंडित जी का जीवन
नगर के ही रतन लाल वाल्मीकि बताते हैं कि पंडित दीनदयाल जी का जीवन सादगीपूर्ण था। वह छुआछूत से दूर थे। इस कारण उनके नाना और बाबा के साथ वह अक्सर घर में पड़े छप्पर के नीचे बैठते थे। उनके साथ ही चबेना चबाते थे। पंडित जी के सद्विचारों के कारण ही उनका पूरा परिवार और वह स्वयं संघ के स्वयंसेवक रहे हैं।
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मोहम्मदी में भी रहे प्रचारक
गोला में एक वर्ष पूर्ण होने के बाद पंडित जी मोहम्मदी में भी रहे। वर्ष 1945 में उन्हें संघ का सह प्रांत प्रचारक नियुक्त किया गया। वर्ष 1952 में उन्हें भारतीय जनसंघ के महामंत्री की बागडोर प्रदान की गई। 1967 में वह भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और आजीवन अध्यक्ष पद पर आसीन रहे।
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एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय को वर्ष 1942 में गोला में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचारक नियुक्त किया गया था तो उनकी आत्मीयता और विचारों से प्रभावित होकर नगर और विभिन्न ग्रामों के सभी जाति और वर्गों के लोग उनके साथ जुड़ गए थे।
जब दीनदयाल उपाध्याय नगर में आए थे तब यहां राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की मात्र एक शाखा थी और ग्रामीण अंचल में शाखाएं नगण्य थीं। उनके प्रयासों से नगर और दर्जनों गांव के लोग संघ से जुड़ते गए, जो आजीवन संघ से जुड़े रहे। इस नगर के मोहल्ला पश्चिमी दीक्षिताना में श्री रामलीला मंदिर के प्रांगण में संघ की शाखा लगती थी। दीनदयाल जी ने नगर में लोगों से संपर्क करना शुरू किया तो पश्चिमी दीक्षिताना के प्यारेलाल वाल्मीकि, रामलाल वाल्मीकि, पं. नानकचंद अग्निहोत्री, पं. राजाराम मिश्र, कुम्हार टोला के लक्ष्मण रैदास, करोड़ी सिंह आदि लोग उनके विचारों से प्रभावित होकर संघ की शाखा में आने लगे। इसके बाद कानपुर धर्मशाला, गौशाला स्वामी ब्रह्मानंद आश्रम में भी संघ की शाखाएं लगने लगीं।
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सादगी पूर्ण था पंडित जी का जीवन
नगर के ही रतन लाल वाल्मीकि बताते हैं कि पंडित दीनदयाल जी का जीवन सादगीपूर्ण था। वह छुआछूत से दूर थे। इस कारण उनके नाना और बाबा के साथ वह अक्सर घर में पड़े छप्पर के नीचे बैठते थे। उनके साथ ही चबेना चबाते थे। पंडित जी के सद्विचारों के कारण ही उनका पूरा परिवार और वह स्वयं संघ के स्वयंसेवक रहे हैं।
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मोहम्मदी में भी रहे प्रचारक
गोला में एक वर्ष पूर्ण होने के बाद पंडित जी मोहम्मदी में भी रहे। वर्ष 1945 में उन्हें संघ का सह प्रांत प्रचारक नियुक्त किया गया। वर्ष 1952 में उन्हें भारतीय जनसंघ के महामंत्री की बागडोर प्रदान की गई। 1967 में वह भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और आजीवन अध्यक्ष पद पर आसीन रहे।