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रहने को ठौर न खाने को कौर, खानाबदोश सी बनी जिंदगी

Sat, 16 Sep 2017 11:30 PM IST
Updated Sat, 16 Sep 2017 11:30 PM IST
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रहने को ठौर न खाने को कौर, खानाबदोश सी बनी जिंदगी
बिजुआ।
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जिस मौसम में पक्षी भी अपना घोंसला नहीं छोड़ते ऐसे मौसम में इन लोगों को अपने ठिकाने बदलने पड़ते हैं। शारदा नदी ने इलाके का भूगोल ही नहीं बदला, इनकी तकदीर भी बदलकर रख दी है। स्कूल जाने वाले बच्चों की किताबें कहीं खो गईं हैं। सरकार मदद के लाख दावे करे, लेकिन ढखिया खुर्द की जमीनी हकीकत बताती है कि अब भी यह लोग मदद के लिए हर आने-जाने वाले लोगों की ओर आशा भरी निगाहों से देखते हैं।
भानपुर से ढखिया खुर्द जाने वाले डामर रोड के किनारे एक डनलप पर अपनी गृहस्थी संजोए अनारकली इनमें से एक हैं, जिनका घर एक माह पहले नदी में समा चुका है। अनारकली देवी का घर जब कटा तो इसी रास्ते के किनारे छप्पर डाल लिए, घर की पूरी गृहस्थी डनलप पर लगाकर उसी पर सो जाती हैं। महावीर प्रसाद का घर भी एक दिन नदी में समा गया। साथ ही नदी में चार एकड़ गन्ना भी चला गया, छह बच्चों से भरा पूरा घर सड़क पर आ गया। बड़ा बेटा और बेटी दोनों हाईस्कूल में पढ़ते हैं। घर के खर्च और बच्चों की पढ़ाई की फिक्र ने महावीर को बीमारियों ने आ घेरा, एक माह से महावीर बिस्तर पर हैं।
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इसी बस्ती के जगदीश बताते हैं कि एक दिन बड़े अधिकारी ने आकर कहा था कि प्रभावित परिवारों को ठिकाना बनाने के लिए जमीन दी जाएगी, लेकिन लेखपाल जो जमीन आवंटित कर रहे हैं वह आठ से दस फिट गहरे तालाब में दे रहे हैं। वहीं सरकार जो मुआवजा दे रही है वो भी उन्हें नहीं मिला है।
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अब तो बैंक जाने में भी शर्म महसूस होती है
ढखिया खुर्द गांव में नदी से करीब 86 परिवार प्रभावित हुए हैं। इनमें से 81 को तहसील प्रशासन ने मुआवजा देने का दावा किया है। महावीर, रामभजन, सुखराम बताते हैं कि लेखपाल से पूछा तो बताया कि उनका मुआवजा बैंक भेज दिया। ये लोग रोज बैंक जाते हैं, लेकिन वहां से जवाब मिलता है कि उनका पैसा नहीं आया है। महावीर बताते हैं कि अब तो रोज-रोज बैंक जाने में भी शर्म लगती है।

बच्चों को आंगन छूटा, छूट गया स्कूल भी
धीरे-धीरे सूरज पश्चिम में डूब रहा था, कुछ बच्चे सड़क किनारे खेलते हुए मिल गए। पूछा कि स्कूल जाते हो, बोल पड़े, पहले स्कूल नजदीक था अब दूर है। वह स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। तभी सड़क किनारे ही एक टाट-पट्टी पर बैठकर किताबों और कापियों में उलझी हुई आसिनी देवी मिल गईं, बताया कि अब आंगन नहीं बचा तो सड़क का किनारा ही उनका आंगन है।


घर कटने का मुआवजा 4100 रुपये, इतने में तो एक छप्पर भी नहीं बनता
गांव के 86 लोगों के घर कट चुके हैं, प्रशासन 81 लोगों को मुआवजे के नाम पर 4100 रुपये खाते में भेज रहा है, इनमें तमाम कटान पीड़ितों के खाते में अभी पैसा नहीं आया है। वहीं कटान प्रभावित लोगों में से 22 लोगों को जमीन आवंटित कर दी गई है। लेखपाल विजय भार्गव कहते हैं कि अभी जमीन श्रेणी पांच की कम है। इसलिए आवंटन नहीं हो पाया। शेष जमीन नदी पार करके है इसलिए रहने लायक जमीन ऊंचे स्थान पर नहीं है।
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