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डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने टाइगर रिजर्व के पांच गांव गोद लिए
Updated Wed, 06 Dec 2017 11:24 PM IST
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दुधवा
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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लखीमपुर खीरी। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने दुधवा और पीलीभीत टाइगर रिजर्व क्षेत्र में आने वाले पांच गांवों को गोद लिया है। इन गांव के लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए विश्व प्रकृति निधि मशरूम का उत्पादन करना सिखाएगी।
केंद्रीय विज्ञान और तकनीकी मंत्रालय के सहयोग से इस कार्यक्रम को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चलाया जाएगा। किसानों को तकनीकी सहयोग और बीज विपणन की व्यवस्था डब्ल्यूडब्ल्यूएफ कराएगा। विश्व प्रकृति निधि ने दुधवा नेशनल पार्क के बलेटा और सोनहा गांव, पीलभीत टाइगर रिजर्व के नवदिया, धुरिया पलिया और सेल्हा गांव का चयन किया है। प्रत्येक गांव में 10 किसान के हिसाब से 50 किसानों को इस काम के लिए चुना गया है।
विश्व प्रकृति निधि के तराई आर्क प्रोजेक्ट समन्वयक डॉ. मुदित गुप्ता के अनुसार इसमेें ऐसे किसानों को चुना गया है जो इन गांवों में लघु और सीमांत श्रेणी में आते हैं। किसानों को नाबार्ड के सहयोग से लिबार्ड गोल्डन मशरूम फार्मर प्रोड्यूस के सीईओ महेंद्र पाल गंगवार ने गांव में जाकर प्रशिक्षण दिया। इस प्रक्रिया से 35 से 70 दिन में औसतन 60 किलोग्राम मशरूम का उत्पादन होता है। विशेषज्ञों ने बताया कि मशरूम को दो प्रकार से बाजार में बेचा जा सकता है। सुखाकर बेचने पर 400 से 500 रुपये कीमत है जबकि ताजा मशरूम 80 से 100 प्रति किलो बिकता है। विश्व प्रकृति निधि का दावा है कि इस पायलेट प्रोजेक्ट की योजना सफल रही तो दुधवा टाइगर रिजर्व और पीलीभीत टाइगर रिजर्व क्षेत्र से सटे अन्य गांवों में लागू कर वहां रहने वाले लोगों की आय बढ़ाई जा सकती है। इससे उनकी जंगलों पर निर्भरता कम होगी।
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केंद्रीय विज्ञान और तकनीकी मंत्रालय के सहयोग से इस कार्यक्रम को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चलाया जाएगा। किसानों को तकनीकी सहयोग और बीज विपणन की व्यवस्था डब्ल्यूडब्ल्यूएफ कराएगा। विश्व प्रकृति निधि ने दुधवा नेशनल पार्क के बलेटा और सोनहा गांव, पीलभीत टाइगर रिजर्व के नवदिया, धुरिया पलिया और सेल्हा गांव का चयन किया है। प्रत्येक गांव में 10 किसान के हिसाब से 50 किसानों को इस काम के लिए चुना गया है।
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विश्व प्रकृति निधि के तराई आर्क प्रोजेक्ट समन्वयक डॉ. मुदित गुप्ता के अनुसार इसमेें ऐसे किसानों को चुना गया है जो इन गांवों में लघु और सीमांत श्रेणी में आते हैं। किसानों को नाबार्ड के सहयोग से लिबार्ड गोल्डन मशरूम फार्मर प्रोड्यूस के सीईओ महेंद्र पाल गंगवार ने गांव में जाकर प्रशिक्षण दिया। इस प्रक्रिया से 35 से 70 दिन में औसतन 60 किलोग्राम मशरूम का उत्पादन होता है। विशेषज्ञों ने बताया कि मशरूम को दो प्रकार से बाजार में बेचा जा सकता है। सुखाकर बेचने पर 400 से 500 रुपये कीमत है जबकि ताजा मशरूम 80 से 100 प्रति किलो बिकता है। विश्व प्रकृति निधि का दावा है कि इस पायलेट प्रोजेक्ट की योजना सफल रही तो दुधवा टाइगर रिजर्व और पीलीभीत टाइगर रिजर्व क्षेत्र से सटे अन्य गांवों में लागू कर वहां रहने वाले लोगों की आय बढ़ाई जा सकती है। इससे उनकी जंगलों पर निर्भरता कम होगी।
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