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गन्ने के खेतों को अपनी टेरीटरी बना रहे बाघ
Updated Sat, 02 Jun 2018 06:39 PM IST
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स्लग---दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन में फिर सक्रिय हुआ बाघ
गन्ने के खेतों को अपनी टेरेटरी बना रहे बाघ
भीषण गर्मी में सूखे जंगल के जलाशय, पानी का संकट
अमर उजाला ब्यूरो
लखीमपुर खीरी। दुधवा टाइगर रिजर्व के बफर जोन से निकलकर बाघ आबादी के निकट खेतों में भ्रमण कर रहे हैं। दक्षिण निघासन रेंज में शनिवार को वाचर समेत दो लोगों को बाघ ने घायल कर दिया। इससे पहले 13 अप्रैल को एक बाघिन ने सहतेपुरवा गांव में कामता प्रसाद नामक ग्रामीण को अपना निवाला बनाया था। इससे गुस्साए ग्रामीणों ने बाघिन को गेहूं के खेत में घेर कर पीट कर अधमरा कर दिया था। बहुत मुश्किल से लखनऊ चिड़ियाघर भेजकर उसका इलाज कराया गया तब जान बच पाई थी।
वन विभाग के अधिकारी और वन्यजीव विशेषज्ञ मानते हैं कि बाघों के संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों के चलते जिले में बाघों की संख्या बढ़ी है। इनकी आबादी इतनी बढ़ी कि उनके आवास के लिए जंगल छोटे पड़ने लगे। लिहाजा बाघ अब गन्ने के खेतों को अपनी टेरेटरी बनाने लगे हैं। यही कारण है कि जंगल से सटे इलाके में बाघों की सक्रियता बढ़ी है।
दक्षिण खीरी वन प्रभाग के महेशपुर रेंज में कठिना नदी के घमहाघाट के किनारे बाघ ने गांव दुलीपुर निवासी गजराज पर उस समय हमला कर घायल कर दिया जब वह गन्ने के खेत में घास काट रहा था। महेशपुर रेंज के छोटे से जंगल में बाघों की संख्या छह बताई जा रही है। ऐसे में यहां आए दिन ग्रामीणों पर बाघ के हमले हो रहे हैं। जिले के अन्य इलाकों में भी कुछ यही हाल है। ऐसी स्थिति पैदा होने से बाघों और मानव के बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं जिससे भविष्य में भयावह स्थिति हो सकती है।
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पानी की तलाश में भी बाघ आ रहे बाहर
गर्मी और कड़ी धूप होने से जंगल की घास सूख चुकी है। जलाशयों में पानी भी कम हो गया है। ऐसे में हिरन आदि शाकाहारी वन्यजीव जंगल से बाहर आ रहे है। खेतों में उन्हें गन्ने की पत्तियों की कोपल और दूसरी फसलों के रूप में पर्याप्त हरा चारा मिल रहा है। इनके पीछे पीछे बाघ में अपने शिकार की तलाश में जंगल से निकल रहे हैं। वे पास के खेतों में अपना ठौर बना रहे हैं जिससे वन्यजीव और मानव के बीच संघर्ष की संभावनाएं बढ़ रही हैं।
शिकारियों के भी निशाने पर हैं वन्यजीव
जंगल के बाहर वन्यजीवों के निकलने पर केवल इंसानों के लिए ही खतरा नहीं बढ़ता, वन्यजीवों के लिए भी खतरा बढ़ जाता है। बाघों के जंगल से बाहर होने पर बाघों और इंसानों के भी संघर्ष की संभावनाएं तो बढ़ती ही हैं यह शिकारियों के निशाने पर भी आ जाते हैं।
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यह सही है कि गर्मी के दिनों में जंगल में घास की कमी हो जाती है लेकिन बाघों के जंगल से बाहर निकलने का असल कारण जंगल में इंसानी दखलंदाजी है। वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में लगातार खलल पड़ने से बाघ और दूसरे वन्यजीव जंगल से बाहर आ रहे हैं। जंगल से बाहर निकले वन्यजीवों की निगरानी बढ़ा दी गई है।
- डॉ. अनिल पटेल, उपनिदेशक, दुधवा टाइगर रिजर्ब बफर जोन
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गन्ने के खेतों को अपनी टेरेटरी बना रहे बाघ
भीषण गर्मी में सूखे जंगल के जलाशय, पानी का संकट
अमर उजाला ब्यूरो
लखीमपुर खीरी। दुधवा टाइगर रिजर्व के बफर जोन से निकलकर बाघ आबादी के निकट खेतों में भ्रमण कर रहे हैं। दक्षिण निघासन रेंज में शनिवार को वाचर समेत दो लोगों को बाघ ने घायल कर दिया। इससे पहले 13 अप्रैल को एक बाघिन ने सहतेपुरवा गांव में कामता प्रसाद नामक ग्रामीण को अपना निवाला बनाया था। इससे गुस्साए ग्रामीणों ने बाघिन को गेहूं के खेत में घेर कर पीट कर अधमरा कर दिया था। बहुत मुश्किल से लखनऊ चिड़ियाघर भेजकर उसका इलाज कराया गया तब जान बच पाई थी।
वन विभाग के अधिकारी और वन्यजीव विशेषज्ञ मानते हैं कि बाघों के संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों के चलते जिले में बाघों की संख्या बढ़ी है। इनकी आबादी इतनी बढ़ी कि उनके आवास के लिए जंगल छोटे पड़ने लगे। लिहाजा बाघ अब गन्ने के खेतों को अपनी टेरेटरी बनाने लगे हैं। यही कारण है कि जंगल से सटे इलाके में बाघों की सक्रियता बढ़ी है।
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दक्षिण खीरी वन प्रभाग के महेशपुर रेंज में कठिना नदी के घमहाघाट के किनारे बाघ ने गांव दुलीपुर निवासी गजराज पर उस समय हमला कर घायल कर दिया जब वह गन्ने के खेत में घास काट रहा था। महेशपुर रेंज के छोटे से जंगल में बाघों की संख्या छह बताई जा रही है। ऐसे में यहां आए दिन ग्रामीणों पर बाघ के हमले हो रहे हैं। जिले के अन्य इलाकों में भी कुछ यही हाल है। ऐसी स्थिति पैदा होने से बाघों और मानव के बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं जिससे भविष्य में भयावह स्थिति हो सकती है।
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पानी की तलाश में भी बाघ आ रहे बाहर
गर्मी और कड़ी धूप होने से जंगल की घास सूख चुकी है। जलाशयों में पानी भी कम हो गया है। ऐसे में हिरन आदि शाकाहारी वन्यजीव जंगल से बाहर आ रहे है। खेतों में उन्हें गन्ने की पत्तियों की कोपल और दूसरी फसलों के रूप में पर्याप्त हरा चारा मिल रहा है। इनके पीछे पीछे बाघ में अपने शिकार की तलाश में जंगल से निकल रहे हैं। वे पास के खेतों में अपना ठौर बना रहे हैं जिससे वन्यजीव और मानव के बीच संघर्ष की संभावनाएं बढ़ रही हैं।
शिकारियों के भी निशाने पर हैं वन्यजीव
जंगल के बाहर वन्यजीवों के निकलने पर केवल इंसानों के लिए ही खतरा नहीं बढ़ता, वन्यजीवों के लिए भी खतरा बढ़ जाता है। बाघों के जंगल से बाहर होने पर बाघों और इंसानों के भी संघर्ष की संभावनाएं तो बढ़ती ही हैं यह शिकारियों के निशाने पर भी आ जाते हैं।
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यह सही है कि गर्मी के दिनों में जंगल में घास की कमी हो जाती है लेकिन बाघों के जंगल से बाहर निकलने का असल कारण जंगल में इंसानी दखलंदाजी है। वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में लगातार खलल पड़ने से बाघ और दूसरे वन्यजीव जंगल से बाहर आ रहे हैं। जंगल से बाहर निकले वन्यजीवों की निगरानी बढ़ा दी गई है।
- डॉ. अनिल पटेल, उपनिदेशक, दुधवा टाइगर रिजर्ब बफर जोन