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समय पर मिल जाए नाव तो समझो किस्मत अच्छी
Updated Tue, 04 Sep 2018 11:30 PM IST
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समय पर मिल जाए नाव तो समझो किस्मत अच्छी
तटबंध पार करने में दुश्वारियां झेल रहे बाढ़ पीड़ित
अमर उजाला ब्यूरो
महेवागंज/सुंदरवल। फूलबेहड़ क्षेत्र में शारदा नदी का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। कहीं कटान तो कहीं पानी में घर और गलियारे सीने तक डूबे हैं। नाव ही आवागमन का साधन बचा है। पानी से पार पाने में लोगों को दुश्वारियां झेलनी पड़ रही हैं। नावों की कमी लोगों को ज्यादा अखर रही है। पीड़ितों की माने तो प्रभावित क्षेत्रफल की अपेक्षा नावों की संख्या काफी कम होने से लोगों को घंटो इंतजार करना पड़ रहा है। फिर चाहे वह रोजमर्रा के काम वाला हो या कोर्ट कचहरी जाने वाला। बीमारी की हालत में नाव की कमी और भी ज्यादा अखरती है। उन्हें तटबंध पर आने के लिए घंटों तक इंतजार करना पड़ रहा है। रंडाउहा, खगईपुरवा, गोपालपुरवा, मेहंदी, चकलुआ, गूम, नरहर, सिसैयापुरवा, खांभी, मंगलीपुरवा, कुचलिहा समेत दर्जनों गांव पिछले काफी दिनों से टापू बने हैं। नाव ही आवागमन का एक मात्र साधन बचा है। बेड़हा निवासी झग्गू ने बताया कि नाव की कमी से कभी-कभी क्षमता से ज्यादा लोग नाव पर सवार हो जाते हैं। हाल ही में कई हादसे भी हो चुके हैं। हादसों में तीन लोगों की डूबने से जान भी जा चुकी है। सूत्रों की माने तो सैकड़ों एकड़ डूबे क्षेत्रफल की अपेक्षा 19 नाव ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही हैं। इससे नाव पलटने की आशंका भी बनी रहती है।
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समय पर मिल जाए नाव तो समझो किस्मत अच्छी
तटबंध पार करने में दुश्वारियां झेल रहे बाढ़ पीड़ित
अमर उजाला ब्यूरो
महेवागंज/सुंदरवल। फूलबेहड़ क्षेत्र में शारदा नदी का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। कहीं कटान तो कहीं पानी में घर और गलियारे सीने तक डूबे हैं। नाव ही आवागमन का साधन बचा है। पानी से पार पाने में लोगों को दुश्वारियां झेलनी पड़ रही हैं। नावों की कमी लोगों को ज्यादा अखर रही है। पीड़ितों की माने तो प्रभावित क्षेत्रफल की अपेक्षा नावों की संख्या काफी कम होने से लोगों को घंटो इंतजार करना पड़ रहा है। फिर चाहे वह रोजमर्रा के काम वाला हो या कोर्ट कचहरी जाने वाला। बीमारी की हालत में नाव की कमी और भी ज्यादा अखरती है। उन्हें तटबंध पर आने के लिए घंटों तक इंतजार करना पड़ रहा है। रंडाउहा, खगईपुरवा, गोपालपुरवा, मेहंदी, चकलुआ, गूम, नरहर, सिसैयापुरवा, खांभी, मंगलीपुरवा, कुचलिहा समेत दर्जनों गांव पिछले काफी दिनों से टापू बने हैं। नाव ही आवागमन का एक मात्र साधन बचा है। बेड़हा निवासी झग्गू ने बताया कि नाव की कमी से कभी-कभी क्षमता से ज्यादा लोग नाव पर सवार हो जाते हैं। हाल ही में कई हादसे भी हो चुके हैं। हादसों में तीन लोगों की डूबने से जान भी जा चुकी है। सूत्रों की माने तो सैकड़ों एकड़ डूबे क्षेत्रफल की अपेक्षा 19 नाव ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही हैं। इससे नाव पलटने की आशंका भी बनी रहती है।