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किशनपुर इलाके में बाघिन के हमले की हुई पहली घटना
Updated Tue, 26 Dec 2017 09:45 PM IST
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tiger atteck
- फोटो : amar ujala
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युवक की मौत से ग्रामीणों में दहशत
बांकेगंज। दुधवा टाइगर रिजर्व के किशनपुर सेंक्चुरी क्षेत्र में बाघिन के हमले में हुई युवक की मौत से ग्रामीणों में दहशत है। दहशतजदा ग्रामीणों का कहना है कि चलतुआ फार्म और गांव से सटे जंगल में बाघ-बाघिन और शावकों की मौजूदगी तो पूरे साल रहती है। जंगल से सटी जमीनों पर खेतीबाड़ी करने वाले किसानों और रास्तों पर निकलने वाले राहगीरों का अक्सर बाघ से आमना-सामना तो जरूर होता है, बावजूद इसके आज तक इस इलाके में बाघ या बाघिन के हमले से किसी ग्रामीण की जान नहीं गई।
सोमवार शाम करीब चार बजे किशनपुर सेंक्चुरी क्षेत्र में पीलीभीत जिले के थाना सेहरामऊ उत्तरी अंतर्गत गांव गढ़ाकला निवासी 32 वर्षीय युवक जोगेंन्दर सिंह पर बाघिन हमले के बाद हुई मौत से ग्रामीणों की आंखों से नींद गायब हो गई है। इससे दहशतजदा ग्रामीणों भूपेंद्र सिंह, गोपी, रामकिशुन, हरिपाल, श्रीकृष्ण आदि का कहना है कि जंगल से सटी जमीनों पर खेतीबाड़ी और फार्मों पर मजदूरी करने वाले ग्रामीणों पर अब बाघ हमले का खतरा मंडराने लगा है। ग्रामीणों का कहना है कि अभी तक शांतिप्रिय रहे इस इलाके में सोमवार शाम जंगल से सटे इलाके में बाघिन हमले में युवक की मौत के बाद लोगों का अब खेतीबाड़ी करना और रास्तों पर निकलना मुश्किल हो गया है। ग्रामीणों को अब इस बात की चिंता सताने लगी है कि जंगल से सटी जमीनों पर बोई की गई फसलों की रखवाली कैसे करेंगे। बाघिन हमले में युवक की मौत के बाद ग्रामीण अब खेतों की ओर जाने से डरने लगे हैं। चलतुआ आबादी की ओर बढ़ते बाघिन के कदमों से इलाके के लोग दहशत में हैं।
बाघ को बर्दास्त नहीं इंसानी हस्तक्षेप
दुधवा टाइगर रिजर्व के किशनपुर सेंक्चुरी क्षेत्र में भोजन, पानी और प्राकृतिक आवास मिलने से यहां बाघों की आबादी तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में जंगल से सटे इलाके में खेतीबाड़ी करने, पशुओं का चारा लेने, फूस काटने और लकड़ी बीनने जंगल के अंदर जाने वाले लोगों पर इनका हमला स्वाभाविक है। बाघ यहां इंसानी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं कर रहा।
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- डॉ. वीपी सिंह, वन्यजीव विशेषज्ञ
बाघ और बाघिन के पगमार्क में होता है यह अंतर
राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य और वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. वीपी सिंह का कहना है कि बाघ का पदचिह्न वर्गाकार होता है, जबकि बाघिन का आयताकार। बाघिन के पैर की गद्दी छोटी होती है बाघ की बड़ी। बाघ के पंजे आगे से गोल होते है, जबकि बाघिन के पंजे नुकीले होते हैं। बाघ का पगमार्क बड़े बनते हैं, जबकि बाघिन के अपेक्षाकृत छोटे होते है। बाघ की उंगलियों के बीच जगह ज्यादा होती है और बाघिन की उंगलियों के बीच जगह कम। बाघ का वजन अधिक होने के कारण बाघ के पगमार्क गहरे बनते हैं, बाघिन के अपेक्षाकृत हल्के।
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बांकेगंज। दुधवा टाइगर रिजर्व के किशनपुर सेंक्चुरी क्षेत्र में बाघिन के हमले में हुई युवक की मौत से ग्रामीणों में दहशत है। दहशतजदा ग्रामीणों का कहना है कि चलतुआ फार्म और गांव से सटे जंगल में बाघ-बाघिन और शावकों की मौजूदगी तो पूरे साल रहती है। जंगल से सटी जमीनों पर खेतीबाड़ी करने वाले किसानों और रास्तों पर निकलने वाले राहगीरों का अक्सर बाघ से आमना-सामना तो जरूर होता है, बावजूद इसके आज तक इस इलाके में बाघ या बाघिन के हमले से किसी ग्रामीण की जान नहीं गई।
सोमवार शाम करीब चार बजे किशनपुर सेंक्चुरी क्षेत्र में पीलीभीत जिले के थाना सेहरामऊ उत्तरी अंतर्गत गांव गढ़ाकला निवासी 32 वर्षीय युवक जोगेंन्दर सिंह पर बाघिन हमले के बाद हुई मौत से ग्रामीणों की आंखों से नींद गायब हो गई है। इससे दहशतजदा ग्रामीणों भूपेंद्र सिंह, गोपी, रामकिशुन, हरिपाल, श्रीकृष्ण आदि का कहना है कि जंगल से सटी जमीनों पर खेतीबाड़ी और फार्मों पर मजदूरी करने वाले ग्रामीणों पर अब बाघ हमले का खतरा मंडराने लगा है। ग्रामीणों का कहना है कि अभी तक शांतिप्रिय रहे इस इलाके में सोमवार शाम जंगल से सटे इलाके में बाघिन हमले में युवक की मौत के बाद लोगों का अब खेतीबाड़ी करना और रास्तों पर निकलना मुश्किल हो गया है। ग्रामीणों को अब इस बात की चिंता सताने लगी है कि जंगल से सटी जमीनों पर बोई की गई फसलों की रखवाली कैसे करेंगे। बाघिन हमले में युवक की मौत के बाद ग्रामीण अब खेतों की ओर जाने से डरने लगे हैं। चलतुआ आबादी की ओर बढ़ते बाघिन के कदमों से इलाके के लोग दहशत में हैं।
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बाघ को बर्दास्त नहीं इंसानी हस्तक्षेप
दुधवा टाइगर रिजर्व के किशनपुर सेंक्चुरी क्षेत्र में भोजन, पानी और प्राकृतिक आवास मिलने से यहां बाघों की आबादी तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में जंगल से सटे इलाके में खेतीबाड़ी करने, पशुओं का चारा लेने, फूस काटने और लकड़ी बीनने जंगल के अंदर जाने वाले लोगों पर इनका हमला स्वाभाविक है। बाघ यहां इंसानी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं कर रहा।
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- डॉ. वीपी सिंह, वन्यजीव विशेषज्ञ
बाघ और बाघिन के पगमार्क में होता है यह अंतर
राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य और वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. वीपी सिंह का कहना है कि बाघ का पदचिह्न वर्गाकार होता है, जबकि बाघिन का आयताकार। बाघिन के पैर की गद्दी छोटी होती है बाघ की बड़ी। बाघ के पंजे आगे से गोल होते है, जबकि बाघिन के पंजे नुकीले होते हैं। बाघ का पगमार्क बड़े बनते हैं, जबकि बाघिन के अपेक्षाकृत छोटे होते है। बाघ की उंगलियों के बीच जगह ज्यादा होती है और बाघिन की उंगलियों के बीच जगह कम। बाघ का वजन अधिक होने के कारण बाघ के पगमार्क गहरे बनते हैं, बाघिन के अपेक्षाकृत हल्के।