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भोजन पानी की तलाश में भटक रहे जंगली जानवर
Updated Sun, 15 Apr 2018 08:00 PM IST
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भोजन-पानी की तलाश में
भटक रहे जंगली जानवर
बाघों के लिए अनुकूल प्राकृतिक आवास बने गन्ने के खेत
- दुधवा के बफर जोन में बाघ लगातार कर रहे इंसानों पर हमले
अमर उजाला ब्यूरो
लखीमपुर खीरी।
दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन जंगल से बाहर निकलकर बाघ आबादी के निकट खेतों में भ्रमण कर रहे हैं। बेलरायां, मझगई, संपूर्णानगर रेंजों में बाघ पिछले एक माह के अंदर चार लोगों पर हमला कर उन्हें घायल कर चुके हैं। धौरहरा रेंज के कैरातीपुरवा में बाघ की मौजूदगी से ग्रामीण दहशत में हैं। विशेषज्ञ इन दिनों बाघों और शाकाहारी जानवरों के जंगल से बाहर निकलने का कारण जंगल में भोजन-पानी की कमी मान रहे हैं।
गर्मी और कड़ी धूप होने से जंगल की घास सूख चुकी है। जलाशयों में पानी भी कम होने लगा है। ऐसे में हिरन आदि शाकाहारी वन्यजीव जंगल से बाहर आ रहे है। खेतों में उन्हें गन्ने की पत्तियों की कोमल कोपल और दूसरी फसलों के रूप में पर्याप्त हरा चारा मिल रहा है। इससे हिरन आदि शाकाहारी जानवर जंगल से पलायन कर खेतों में आ गए हैं।
जंगल से बाहर निकले बाघ बेलरायां रेंज के अंतर्गत दो लोगों पर हमला कर उन्हें घायल कर चुके हैं। उधर, दो दिन पहले संपूर्णानगर में एक व्यक्ति को और मझगई रेंज में एक महिला पर बाघ ने हमला कर दिया। यह सभी गंभीर रूप से घायल हुए हैं। उधर, जिन इलाकों में बाघ के हमले हुए वे इलाके दुधवा नेशनल पार्क से सटे हुए हैं। इन क्षेत्रों में आमतौर से हाथियों का आतंक रहता है, लेकिन अब बाघ के हमलों से लोग खौफजदा हैं। लोग खेतों में काम करने जाने तक से डर रहे हैं।
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फरवरी-मार्च में जंगल को आग से बचाने के लिए घास को जलाकर फायर लाइन बनाई जाती है। इससे आसपास की घास जल जाती है। इसी बीच गर्मी शुरू हो जाने से मैदानों की घास भी सूख चुकी होती है। ऐसे में चारे की तलाश में शाकाहारी पशुओं के लिए जंगल से बाहर आने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं रह गया है। जंगल की खाद्य शृंखला टूटने से बाघों को भी बाहर आना पड़ रहा है। जहां इन्हें शाकाहारी वन्यजीवों के अलावा पालतू और आवारा जानवरों के रूप में भी भोजन मिल रहा है।
शिकारियों के निशाने पर हैं वन्यजीव
जंगल के बाहर वन्यजीवों के निकलने पर केवल इंसानों के लिए ही खतरा नहीं बढ़ता, वन्यजीव जीवों के लिए भी खतरा बढ़ जाता है। बाघों के जंगल से बाहर होने पर बाघों और इंसानों के भी संघर्ष की संभावनाएं तो बढ़ती ही हैं, यह शिकारियों के भी निशाने पर आ जाते हैं। जंगल से बाहर होनेे पर लोग हिरन और जंगली सुअरों का शिकार मांस के लिए करने की घात में रहते हैं। बाघों की सही लोकेशन न मिलने पर वन विभाग के लिए इनकी निगरानी भी मुश्किल हो जाती है और बाघ, हिरन, जंगली सुअर आदि के शिकार की आशंका बढ़ जाती है।
यह सही है कि गर्मी के दिनों में जंगल में घास की कमी हो जाती है, लेकिन बाघों के जंगल से बाहर निकलने का असल कारण जंगल में इंसानी दखलंदाजी है। वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में लगातार खलल पडने से बाघों और दूसरे वन्यजीव जंगल से बाहर आ रहे हैं। जंगल से बाहर निकले वन्यजीवों की निगरानी बढ़ा दी गई है।
डॉ. अनिल पटेल
- उपनिदेशक, दुधवा टाइगर रिजर्ब बफर जोन
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भटक रहे जंगली जानवर
बाघों के लिए अनुकूल प्राकृतिक आवास बने गन्ने के खेत
- दुधवा के बफर जोन में बाघ लगातार कर रहे इंसानों पर हमले
अमर उजाला ब्यूरो
लखीमपुर खीरी।
दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन जंगल से बाहर निकलकर बाघ आबादी के निकट खेतों में भ्रमण कर रहे हैं। बेलरायां, मझगई, संपूर्णानगर रेंजों में बाघ पिछले एक माह के अंदर चार लोगों पर हमला कर उन्हें घायल कर चुके हैं। धौरहरा रेंज के कैरातीपुरवा में बाघ की मौजूदगी से ग्रामीण दहशत में हैं। विशेषज्ञ इन दिनों बाघों और शाकाहारी जानवरों के जंगल से बाहर निकलने का कारण जंगल में भोजन-पानी की कमी मान रहे हैं।
गर्मी और कड़ी धूप होने से जंगल की घास सूख चुकी है। जलाशयों में पानी भी कम होने लगा है। ऐसे में हिरन आदि शाकाहारी वन्यजीव जंगल से बाहर आ रहे है। खेतों में उन्हें गन्ने की पत्तियों की कोमल कोपल और दूसरी फसलों के रूप में पर्याप्त हरा चारा मिल रहा है। इससे हिरन आदि शाकाहारी जानवर जंगल से पलायन कर खेतों में आ गए हैं।
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जंगल से बाहर निकले बाघ बेलरायां रेंज के अंतर्गत दो लोगों पर हमला कर उन्हें घायल कर चुके हैं। उधर, दो दिन पहले संपूर्णानगर में एक व्यक्ति को और मझगई रेंज में एक महिला पर बाघ ने हमला कर दिया। यह सभी गंभीर रूप से घायल हुए हैं। उधर, जिन इलाकों में बाघ के हमले हुए वे इलाके दुधवा नेशनल पार्क से सटे हुए हैं। इन क्षेत्रों में आमतौर से हाथियों का आतंक रहता है, लेकिन अब बाघ के हमलों से लोग खौफजदा हैं। लोग खेतों में काम करने जाने तक से डर रहे हैं।
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फरवरी-मार्च में जंगल को आग से बचाने के लिए घास को जलाकर फायर लाइन बनाई जाती है। इससे आसपास की घास जल जाती है। इसी बीच गर्मी शुरू हो जाने से मैदानों की घास भी सूख चुकी होती है। ऐसे में चारे की तलाश में शाकाहारी पशुओं के लिए जंगल से बाहर आने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं रह गया है। जंगल की खाद्य शृंखला टूटने से बाघों को भी बाहर आना पड़ रहा है। जहां इन्हें शाकाहारी वन्यजीवों के अलावा पालतू और आवारा जानवरों के रूप में भी भोजन मिल रहा है।
शिकारियों के निशाने पर हैं वन्यजीव
जंगल के बाहर वन्यजीवों के निकलने पर केवल इंसानों के लिए ही खतरा नहीं बढ़ता, वन्यजीव जीवों के लिए भी खतरा बढ़ जाता है। बाघों के जंगल से बाहर होने पर बाघों और इंसानों के भी संघर्ष की संभावनाएं तो बढ़ती ही हैं, यह शिकारियों के भी निशाने पर आ जाते हैं। जंगल से बाहर होनेे पर लोग हिरन और जंगली सुअरों का शिकार मांस के लिए करने की घात में रहते हैं। बाघों की सही लोकेशन न मिलने पर वन विभाग के लिए इनकी निगरानी भी मुश्किल हो जाती है और बाघ, हिरन, जंगली सुअर आदि के शिकार की आशंका बढ़ जाती है।
यह सही है कि गर्मी के दिनों में जंगल में घास की कमी हो जाती है, लेकिन बाघों के जंगल से बाहर निकलने का असल कारण जंगल में इंसानी दखलंदाजी है। वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में लगातार खलल पडने से बाघों और दूसरे वन्यजीव जंगल से बाहर आ रहे हैं। जंगल से बाहर निकले वन्यजीवों की निगरानी बढ़ा दी गई है।
डॉ. अनिल पटेल
- उपनिदेशक, दुधवा टाइगर रिजर्ब बफर जोन