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बाढ़ विस्थापितों पर भारी पड़ रही हैं माघ की सर्द रातें
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बाढ़ विस्थापितों पर भारी पड़ रही हैं माघ की सर्द रातें
- एपी और नरवाजोत बांध पर गुजर बसर कर रहे हैं, काफी संख्या में बाढ़ विस्थापित
तमकुहीरोड (कुशीनगर)। गंडक नदी की कटान से विस्थापित होकर वर्षों से एपी एवं नरवाजोत बांध पर गुजर बसर कर रहे लोगों पर माघ माह की सर्द रातें भारी पड़ रही हैं। शाम होते ही यहां घना कोहरा छा जाता है। इस हफ्ते हुई ओलावृष्टि के चलते बर्फीली हवा चलने से लोगों को रात गुजारनी कठिन हो रही है।
सेवरही क्षेत्र से होकर बहने वाली गंडक नदी की कटान से पिछले सात-आठ वर्षों में पिपराघाट के फल टोला, गोवर्धन टोला और नान्हू टोला, अहिरौलीदान के बैरिया टोला, कंचन टोला और चित्तू टोला का वजूद समाप्त हो चुका है। पहले इन गांवों में जहां भरी पूरी आबादी निवास करती थी, अब वहां गंडक नदी बह रही है। यही नहीं कचहरी टोला, डीह टोला, खैरखुटा और नोनियापट्टी भी आंशिक रूप से कटान की भेंट चढ़ चुका है। इन गांवों के बाढ़ विस्थापित लोग आज भी नरवाजोत एवं एपी बांध पर शरण लिए हुए हैं। बहुत से लोग तो झोपड़ी व प्लास्टिक तानकर गुजर बसर कर रहे हैं, लेकिन संसाधनों के अभाव में इन लोगों को ठंड के इस मौसम में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
माघ महीने की बर्फीली ठंड उन पर भारी पड़ रही है। दिन में थोड़ी धूप निकलने के बाद शाम होते ही यह क्षेत्र घने कोहरे से घिर जाता है। रात में बर्फीली हवाएं उन्हें समय से पहले घरों में दुबकने अथवा अलाव के सहारे रहने के लिए विवश कर देती हैं। बाढ़ विस्थापित राजकुमार, सुनीता, गुरुवचन, मैनेजर, अशोक, सितमी, विक्रम, अच्छेलाल, ओमप्रकाश, रामायन, दूधनाथ, शिवपूजन, विश्वनाथ सहित कई लोगों का कहना है कि सुध लेने वाला कोई नहीं है। इसके चलते उन्हें चार महीने बाढ़ की विभीषिका और बाद में ठंड व लू के थपेड़े सहने पड़ते हैं। इनका कहना है कि जब तक शासन स्तर से सहायता उपलब्ध नहीं करायी जाएगी, तब तक समस्या दूर नहीं होगी।
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- एपी और नरवाजोत बांध पर गुजर बसर कर रहे हैं, काफी संख्या में बाढ़ विस्थापित
तमकुहीरोड (कुशीनगर)। गंडक नदी की कटान से विस्थापित होकर वर्षों से एपी एवं नरवाजोत बांध पर गुजर बसर कर रहे लोगों पर माघ माह की सर्द रातें भारी पड़ रही हैं। शाम होते ही यहां घना कोहरा छा जाता है। इस हफ्ते हुई ओलावृष्टि के चलते बर्फीली हवा चलने से लोगों को रात गुजारनी कठिन हो रही है।
सेवरही क्षेत्र से होकर बहने वाली गंडक नदी की कटान से पिछले सात-आठ वर्षों में पिपराघाट के फल टोला, गोवर्धन टोला और नान्हू टोला, अहिरौलीदान के बैरिया टोला, कंचन टोला और चित्तू टोला का वजूद समाप्त हो चुका है। पहले इन गांवों में जहां भरी पूरी आबादी निवास करती थी, अब वहां गंडक नदी बह रही है। यही नहीं कचहरी टोला, डीह टोला, खैरखुटा और नोनियापट्टी भी आंशिक रूप से कटान की भेंट चढ़ चुका है। इन गांवों के बाढ़ विस्थापित लोग आज भी नरवाजोत एवं एपी बांध पर शरण लिए हुए हैं। बहुत से लोग तो झोपड़ी व प्लास्टिक तानकर गुजर बसर कर रहे हैं, लेकिन संसाधनों के अभाव में इन लोगों को ठंड के इस मौसम में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
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माघ महीने की बर्फीली ठंड उन पर भारी पड़ रही है। दिन में थोड़ी धूप निकलने के बाद शाम होते ही यह क्षेत्र घने कोहरे से घिर जाता है। रात में बर्फीली हवाएं उन्हें समय से पहले घरों में दुबकने अथवा अलाव के सहारे रहने के लिए विवश कर देती हैं। बाढ़ विस्थापित राजकुमार, सुनीता, गुरुवचन, मैनेजर, अशोक, सितमी, विक्रम, अच्छेलाल, ओमप्रकाश, रामायन, दूधनाथ, शिवपूजन, विश्वनाथ सहित कई लोगों का कहना है कि सुध लेने वाला कोई नहीं है। इसके चलते उन्हें चार महीने बाढ़ की विभीषिका और बाद में ठंड व लू के थपेड़े सहने पड़ते हैं। इनका कहना है कि जब तक शासन स्तर से सहायता उपलब्ध नहीं करायी जाएगी, तब तक समस्या दूर नहीं होगी।
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