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Kushinagar News: आस्था का केंद्र है मां सिधरिया प्राचीन मंदिर

Fri, 27 Mar 2026 12:19 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर Updated Fri, 27 Mar 2026 12:19 AM IST
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The ancient temple of Maa Sidhariya is a center of faith.
नेबुआ नौरंगिया (कुशीनगर)। कोटवा के पास सिधरिया ताल स्थित मां सिधरिया प्राचीन मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि यहां पर मत्था टेकने वाले हर भक्त की मुराद पूरी होती है। कोटवा-मुसहरी मार्ग से करीब एक किलोमीटर उत्तर ताल के किनारे सिधरिया स्थान है। घने जंगल में बने इस मंदिर का इतिहास करीब 500 वर्ष का बताया जाता है।
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ग्रामीणों के मुताबिक, सिधरिया मंदिर करीब 500 वर्ष घने जंगल के बीच में था। यहां शेर, चीता, हाथी सहित कई जंगली जानवरों का डेरा रहता था। बंजारे यहां पिंडी बनाकर पूजा किया करते थे। माना जाता है कि सात देवियों में इनका भी नाम मदनपुर देवी के रूप में आता है। रात में मां के प्रकट होने पर जंगल प्रकाशमय हो जाता था।
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जनश्रुति के अनुसार, जंगल में विसनु साधु रहते थे, जो पिंडी का पूजन-अर्चन करते थे। उनके बाद बालमुकुंद नागा बाबा पुजारी हुए। सन 1952 में जनसहयोग से मंदिर बनवाया गया। 112 वर्ष की उम्र में नागा बाबा पर परलोक सिधार गए।
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सन 1966 में नारायणी नदी का भैंसहा विराभार बंधा टूटने से जंगल ताल बन गया था। सारा जंगल नष्ट हो गया, लेकिन माता का स्थान सुरक्षित रहा। बगल में 16 किलोमीटर लंबा ताल है, जिसे सिधरिया ताल कहते हैं। मान्यता है कि मां के प्रभाव से इस ताल में आज तक पानी कम नहीं हुआ। इसी ताल से सिधरिया ड्रेन भी निकली है, जो बांसी नदी में मिल जाती है।

वर्ष 2006 में तत्कालीन ब्लाक प्रमुख बिंदु देवी ने जर्जर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। यह मंदिर परिसर भव्य रूप ले चुका है। मंदिर के गर्भ गृह में सात पिंडी के साथ प्रतिमा स्थापित की गई है। यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं का कहना है कि मां सिधरिया देवी के दरबार में कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता। सच्चे मन से मांगी गई हर मुरादें पूरी होती हैं।
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