{"_id":"694311117449e2b8a70488af","slug":"the-administration-has-failed-there-is-no-control-over-the-profiteers-kushinagar-news-c-205-1-deo1003-150939-2025-12-18","type":"story","status":"publish","title_hn":"Kushinagar News: प्रशासन नाकाम... धंधेबाजों पर नहीं लगाम","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Kushinagar News: प्रशासन नाकाम... धंधेबाजों पर नहीं लगाम
Thu, 18 Dec 2025 01:52 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Thu, 18 Dec 2025 01:52 AM IST
विज्ञापन
कुशीनगर। जिले में नकली उर्वरक का कारोबार किसानों की मेहनत और फसल दोनों पर भारी पड़ रहा है। छिटपुट कार्रवाई और औपचारिक जांच के चलते इस संगठित नेटवर्क की जड़ तक पहुंचने में प्रशासन नाकाम साबित हो रहा है।
किसान कहते हैं कि कृषि विभाग नमूना जांच और एफआईआर दर्ज कराने तक सीमित रह जाता है, जबकि सप्लाई चेन, थोक विक्रेता, परिवहन और भंडारण से जुड़े बड़े धंधेबाजों पर हाथ डालने से बचता है।
जब भी किसी दुकान या गोदाम से नकली उर्वरक पकड़ा जाता है तो एफआईआर के बाद विभाग खामोश हो जाता है। कृषि विभाग संबंधित थाने में एफआईआर दर्ज कराकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेता है। इसके बाद न तो आर्थिक लेन-देन की पड़ताल होती है और न ही यह पता लगाया जाता है कि यह खेप कहां से आई और किन-किन जिलों तक भेजी गई।
विज्ञापन
नतीजा यह कि छोटे दुकानदार या कर्मचारी तो फंस जाते हैं, लेकिन असली सरगना कानून के शिकंजे से बाहर रहते हैं। संगठित नेटवर्क की जड़ तक पहुंचने में प्रशासन नाकाम साबित हो रहा है। एफआईआर के बाद विभाग खामोश हो जाता है।
किसानों को दोहरी मार नकली उर्वरक का सबसे बड़ा नुकसान किसानों को उठाना पड़ता है। समय पर सही पोषक तत्व न मिलने से फसल कमजोर रह जाती है, उत्पादन घटता है और लागत बढ़ जाती है। किसान जब शिकायत लेकर विभाग के पास पहुंचते हैं तो जांच की प्रक्रिया लंबी होने और ठोस कार्रवाई न होने से उनका भरोसा टूटता जा रहा है।
विज्ञापन
किसान कहते हैं कि कृषि विभाग नमूना जांच और एफआईआर दर्ज कराने तक सीमित रह जाता है, जबकि सप्लाई चेन, थोक विक्रेता, परिवहन और भंडारण से जुड़े बड़े धंधेबाजों पर हाथ डालने से बचता है।
विज्ञापन
जब भी किसी दुकान या गोदाम से नकली उर्वरक पकड़ा जाता है तो एफआईआर के बाद विभाग खामोश हो जाता है। कृषि विभाग संबंधित थाने में एफआईआर दर्ज कराकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेता है। इसके बाद न तो आर्थिक लेन-देन की पड़ताल होती है और न ही यह पता लगाया जाता है कि यह खेप कहां से आई और किन-किन जिलों तक भेजी गई।
विज्ञापन
नतीजा यह कि छोटे दुकानदार या कर्मचारी तो फंस जाते हैं, लेकिन असली सरगना कानून के शिकंजे से बाहर रहते हैं। संगठित नेटवर्क की जड़ तक पहुंचने में प्रशासन नाकाम साबित हो रहा है। एफआईआर के बाद विभाग खामोश हो जाता है।
किसानों को दोहरी मार नकली उर्वरक का सबसे बड़ा नुकसान किसानों को उठाना पड़ता है। समय पर सही पोषक तत्व न मिलने से फसल कमजोर रह जाती है, उत्पादन घटता है और लागत बढ़ जाती है। किसान जब शिकायत लेकर विभाग के पास पहुंचते हैं तो जांच की प्रक्रिया लंबी होने और ठोस कार्रवाई न होने से उनका भरोसा टूटता जा रहा है।