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Kushinagar News: पितरों का आशीर्वाद पाने के लिए श्राद्ध-तर्पण शुरू
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पडरौना। पितृपक्ष की शुरुआत हो चुकी है। 15 दिन तक पितरों का आशीर्वाद पाने और उनकी आत्मा की शांति के लिए तर्पण और पिंडदान करने का विधान है। श्राद्ध कर्म तभी पूरी तरह सफल माना जाता है, जब इसे सही नियमों और श्रद्धा के साथ किया जाए। पितृपक्ष पितृ ऋण चुकाने का अहम समय होता है।
नदियों, घाटों और पोखरों पर पिंडदान से पितर तृप्त होते हैं। पितरों को भोजन और अपनी श्रद्धा पहुंचाने का साधन है। श्राद्ध पितृपक्ष में पितरों को तृप्त करने के लिए भोजन, दान, तर्पण, श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। श्राद्ध पक्ष की प्रतिपदा 27 सितंबर को पड़ रही है। सर्वपितृ विसर्जनी अमावस्या 10 अक्तूबर को मनाया जायेगा।
विजयपुर दक्षिण पट्टी निवासी आचार्य राजकिशोर मिश्र ने बताया कि पितरों को दो भागों में बांटा गया है। एक है दिव्य पितर और दूसरा मनुष्य पितर। दिव्य पितर और मनुष्य जीवों के कर्मों के आधार पर उनका न्याय करते हैं। अर्यमा को पितरों का प्रधान मानते हैं, वही इनके न्यायाधीश यमराज हैं। पुराणों में बताया गया है कि पितर गंध व रस से तृप्त होते हैं। इसलिए लोगों को गंध और रस अर्पित करना चाहिए, जबकि शांति के लिए जातक जब जलते हुए उपले (गाय के गोबर से बने कंडे) में गुड़, घी और अन्न अर्पित करते हैं, तो इससे गंध से निर्मित होती है। इसी गंध को पितर (घ्राण शक्ति) के द्वारा वह भोजन ग्रहण करते हैं।
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जल देने की विधि
पितरों को जल देने की विधि को तर्पण कहते हैं। कुश लेकर हाथ जोड़ें और जिनका तर्पण कर रहे हैं, उनका ध्यान कर इस मंत्र का जप करें...... ॐ (ओम) आगच्छन्तु में पितर ग्रहन्तु जलाञ्जलिम। अंगूठे की मदद से 5, 7 या 11 बार चढ़ाएं। ऐसी मान्यता है कि अंगूठे से पितरों को जल देने से वे तृप्त होते हैं।
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क्या दान करें:
पितृपक्ष में काला तिल, गेहूं, चावल, गाय का दान, सोना, सफेद वस्त्र, चांदी का दान फलदायी माना गया है। सफेद रंग से पितर अति प्रसन्न होते है।
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पितृदोष के लक्षणः
गृहक्लेश, संतान से संबंधित परेशानी, विवाह में बाधा, आकस्मिक दुर्घटना, नौकरी व व्यापार में बाधा, खराब सेहत आदि तमाम तरह के दुख पितृदोष के लक्षण हैं। पितृपक्ष में जलांजलि या पिंडदान (पार्वण श्राद्ध) न करने से पितृदोष उत्पन्न हो जाता है।
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पितृदोष से मुक्ति के लिएः
आचार्य के अनुसार, पितृदोष से मुक्ति के लिए श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों के निधन की तिथि पर तर्पण करें। पार्वण श्राद्ध करें (घर पर, मंदिर पर, गंगातट पर पिंडदान), ब्राह्मण को भोजन कराएं व दान करें। यदि तिथि ज्ञात न हो तो अमावस्या के दिन पिंडदान करें।
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नदियों, घाटों और पोखरों पर पिंडदान से पितर तृप्त होते हैं। पितरों को भोजन और अपनी श्रद्धा पहुंचाने का साधन है। श्राद्ध पितृपक्ष में पितरों को तृप्त करने के लिए भोजन, दान, तर्पण, श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। श्राद्ध पक्ष की प्रतिपदा 27 सितंबर को पड़ रही है। सर्वपितृ विसर्जनी अमावस्या 10 अक्तूबर को मनाया जायेगा।
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विजयपुर दक्षिण पट्टी निवासी आचार्य राजकिशोर मिश्र ने बताया कि पितरों को दो भागों में बांटा गया है। एक है दिव्य पितर और दूसरा मनुष्य पितर। दिव्य पितर और मनुष्य जीवों के कर्मों के आधार पर उनका न्याय करते हैं। अर्यमा को पितरों का प्रधान मानते हैं, वही इनके न्यायाधीश यमराज हैं। पुराणों में बताया गया है कि पितर गंध व रस से तृप्त होते हैं। इसलिए लोगों को गंध और रस अर्पित करना चाहिए, जबकि शांति के लिए जातक जब जलते हुए उपले (गाय के गोबर से बने कंडे) में गुड़, घी और अन्न अर्पित करते हैं, तो इससे गंध से निर्मित होती है। इसी गंध को पितर (घ्राण शक्ति) के द्वारा वह भोजन ग्रहण करते हैं।
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जल देने की विधि
पितरों को जल देने की विधि को तर्पण कहते हैं। कुश लेकर हाथ जोड़ें और जिनका तर्पण कर रहे हैं, उनका ध्यान कर इस मंत्र का जप करें...... ॐ (ओम) आगच्छन्तु में पितर ग्रहन्तु जलाञ्जलिम। अंगूठे की मदद से 5, 7 या 11 बार चढ़ाएं। ऐसी मान्यता है कि अंगूठे से पितरों को जल देने से वे तृप्त होते हैं।
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क्या दान करें:
पितृपक्ष में काला तिल, गेहूं, चावल, गाय का दान, सोना, सफेद वस्त्र, चांदी का दान फलदायी माना गया है। सफेद रंग से पितर अति प्रसन्न होते है।
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पितृदोष के लक्षणः
गृहक्लेश, संतान से संबंधित परेशानी, विवाह में बाधा, आकस्मिक दुर्घटना, नौकरी व व्यापार में बाधा, खराब सेहत आदि तमाम तरह के दुख पितृदोष के लक्षण हैं। पितृपक्ष में जलांजलि या पिंडदान (पार्वण श्राद्ध) न करने से पितृदोष उत्पन्न हो जाता है।
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पितृदोष से मुक्ति के लिएः
आचार्य के अनुसार, पितृदोष से मुक्ति के लिए श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों के निधन की तिथि पर तर्पण करें। पार्वण श्राद्ध करें (घर पर, मंदिर पर, गंगातट पर पिंडदान), ब्राह्मण को भोजन कराएं व दान करें। यदि तिथि ज्ञात न हो तो अमावस्या के दिन पिंडदान करें।