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Kushinagar News: पंजीकरण की फाइलें दुरुस्त.. अस्पतालों से डाॅक्टर नदारद
Thu, 19 Mar 2026 12:12 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Thu, 19 Mar 2026 12:12 AM IST
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- अप्रशिक्षित डॉक्टर मरीजों का करते हैं इलाज, लापरवाही में चली जाती है जान
-जांच के बाद स्वास्थ्य विभाग करता है कार्रवाई, कागज में दिखने वाले डाॅक्टर नहीं रहते मौजूद
पडरौना। जिले में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर निजी अस्पतालों का एक ऐसा मकड़जाल फैला है, जहां पंजीकरण की फाइलें तो दुरुस्त तो हैं लेकिन डॉक्टर नदारद हैं। अधिकांश निजी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की डिग्री महज दिखावे के लिए किराए पर ली गई हैं, जबकि हकीकत में ऑपरेशन थिएटर के भीतर मरीजों की जान के साथ अप्रशिक्षित स्टॉफ व स्वास्थ्य कर्मी करते हुए पाए जाते हैं। पंजीकरण के समय जिन मानकों और डॉक्टरों को कागजों पर दिखाई जाती है, वे धरातल पर केवल ‘ऑन-कॉल’ के झूठे वादों तक सिमट कर रह गए हैं।
ये हाल नेबुआ नौरंगिया, कसया, हाटा, सुकरौली, फाजिलनगर, पडरौना, रामकोला, कोटवा, कप्तानगंज, खड्डा सहित शहरी व ग्रामीण इलाकों तक इन अस्पतालों का जाल बिछा हुआ है। जहां मरीज इलाज के लिए पहुंचता और लापरवाही के चलते जिंदगी गंवा देता है। ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जहां गंभीर स्थिति में मरीज तड़पते रहे लेकिन अस्पताल में कोई पंजीकृत डॉक्टर मौजूद नहीं थे।
अस्पताल का पंजीकरण कराने के समय किसी बड़े डाॅक्टर का नाम तो दे देते हें, लेकिन इमरजेंसी में वह डॉक्टर कभी नहीं पहुंचता, तब तक मरीज दम तोड़ चुका होता है। यहीं, नहीं वार्ड बॉय या ओटी टेक्नीशियन की देखरेख में इलाज के चलते अस्पतालों में मरीज दम तोड़ देते हैं। वहीं, पंजीकरण के समय विभाग तय मानकों के सत्यापन में भी नियमों को ताक पर रखकर पंजीकृत कर लिया जाता है। इसका खामियाजा निजी अस्पतालों में इलाज कराने पहुंच रहे मरीजों को जान देकर चुकानी पड़ती है।
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जिले में बिना पंजीकरण व मानक के विपरीत चलने वाले निजी अस्पतालों व उनके संचालकों के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है। बिना पंजीकरण के संचालित अस्पतालों को सील किया जा रहा है तो वहीं मानक विहीन पाए जाने वाले अस्पतालों के संचालकों को सुधार करने के लिए नोटिस थमाया जा रहा है। उन्हें सुधार करने के लिए एक सप्ताह की मोहलत दी जा रही है। सत्यापन में दोबारा खामी मिलने पर सख्ती से कार्रवाई तय की जाएगी। - डाॅ. चद्रप्रकाश, सीएमओ
केस 1
नेबुआ नौरंगिया क्षेत्र के खुशी हॉस्पिटल को आठ साल में सात बार सील किया गया। अस्पताल में 10 मार्च 2026 को लापरवाही का मामला सामने आया था। यहां बिना किसी विशेषज्ञ डॉक्टर के प्रसव कराया जा रहा था। ऑपरेशन के दौरान प्रसूता नीतू यादव की हालत बिगड़ी और सही समय पर विशेषज्ञ न होने के कारण जच्चा-बच्चा दोनों की मौत हो गई। यह अस्पताल वर्ष 2018 से अब तक 7 बार सील हो चुका है। हर बार सील होने के कुछ ही दिनों बाद कागजी खानापूरी कर नया पंजीकरण कराकर दोबारा संचालन शुरू कर दिया गया।
केस 2
रामकोला क्षेत्र के न्यू सारा सिटी हॉस्पिटल को किराए की डिग्री से चलाया जा रहा था। 16 मार्च 2026 को जांच में यह मामला सामने आया था। जांच में डॉ. जितेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर पंजीकरण तो था, लेकिन जांच में डॉक्टर पिछले कई महीनों से अस्पताल आए ही नहीं थे। अस्पताल का संचालन ओटी टेक्नीशियन और अकुशल कर्मचारी करते हुए मिले थे। पंजीकरण केवल एक कागजी ढाल के रूप में इस्तेमाल हो रहा था।
केस 3
हाटा में जेपी हॉस्पिटल बिना पंजीकरण और बिना डॉक्टर के ऑपरेशन करने का मामला 2 जनवरी 2026 को आया था। जांच में इस अस्पताल के पास न तो स्वास्थ्य विभाग का वैध पंजीकरण था और न ही कोई योग्य सर्जन। प्रसूता इंदु देवी का सिजेरियन ऑपरेशन एक अकुशल चिकित्सक की तरफ से किया गया था। इसमें ऑपरेशन के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव होने पर अस्पताल का स्टाफ मरीज को बेड पर ही तड़पता छोड़कर भाग गए थे।
केस 4
तमकुहीराज क्षेत्र के लाइफ लाइन हॉस्पिटल में 15 मार्च 2026 की जांच में गंदगी फैली हुई मिली थी। यहां जांच में ओटी में संक्रमण रोकने का कोई इंतजाम नहीं था। साथ ही मरीजों को अस्पताल में तय मानक के तहत स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए कोई प्रबंध नहीं पाया गया। नोटिस देकर सुधार के निर्देश दिए गए हैं। सुधार नहीं होने पर उनका पंंजीकरण निरस्त कर दिया जाएगा।
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-जांच के बाद स्वास्थ्य विभाग करता है कार्रवाई, कागज में दिखने वाले डाॅक्टर नहीं रहते मौजूद
पडरौना। जिले में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर निजी अस्पतालों का एक ऐसा मकड़जाल फैला है, जहां पंजीकरण की फाइलें तो दुरुस्त तो हैं लेकिन डॉक्टर नदारद हैं। अधिकांश निजी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की डिग्री महज दिखावे के लिए किराए पर ली गई हैं, जबकि हकीकत में ऑपरेशन थिएटर के भीतर मरीजों की जान के साथ अप्रशिक्षित स्टॉफ व स्वास्थ्य कर्मी करते हुए पाए जाते हैं। पंजीकरण के समय जिन मानकों और डॉक्टरों को कागजों पर दिखाई जाती है, वे धरातल पर केवल ‘ऑन-कॉल’ के झूठे वादों तक सिमट कर रह गए हैं।
ये हाल नेबुआ नौरंगिया, कसया, हाटा, सुकरौली, फाजिलनगर, पडरौना, रामकोला, कोटवा, कप्तानगंज, खड्डा सहित शहरी व ग्रामीण इलाकों तक इन अस्पतालों का जाल बिछा हुआ है। जहां मरीज इलाज के लिए पहुंचता और लापरवाही के चलते जिंदगी गंवा देता है। ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जहां गंभीर स्थिति में मरीज तड़पते रहे लेकिन अस्पताल में कोई पंजीकृत डॉक्टर मौजूद नहीं थे।
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अस्पताल का पंजीकरण कराने के समय किसी बड़े डाॅक्टर का नाम तो दे देते हें, लेकिन इमरजेंसी में वह डॉक्टर कभी नहीं पहुंचता, तब तक मरीज दम तोड़ चुका होता है। यहीं, नहीं वार्ड बॉय या ओटी टेक्नीशियन की देखरेख में इलाज के चलते अस्पतालों में मरीज दम तोड़ देते हैं। वहीं, पंजीकरण के समय विभाग तय मानकों के सत्यापन में भी नियमों को ताक पर रखकर पंजीकृत कर लिया जाता है। इसका खामियाजा निजी अस्पतालों में इलाज कराने पहुंच रहे मरीजों को जान देकर चुकानी पड़ती है।
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जिले में बिना पंजीकरण व मानक के विपरीत चलने वाले निजी अस्पतालों व उनके संचालकों के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है। बिना पंजीकरण के संचालित अस्पतालों को सील किया जा रहा है तो वहीं मानक विहीन पाए जाने वाले अस्पतालों के संचालकों को सुधार करने के लिए नोटिस थमाया जा रहा है। उन्हें सुधार करने के लिए एक सप्ताह की मोहलत दी जा रही है। सत्यापन में दोबारा खामी मिलने पर सख्ती से कार्रवाई तय की जाएगी। - डाॅ. चद्रप्रकाश, सीएमओ
केस 1
नेबुआ नौरंगिया क्षेत्र के खुशी हॉस्पिटल को आठ साल में सात बार सील किया गया। अस्पताल में 10 मार्च 2026 को लापरवाही का मामला सामने आया था। यहां बिना किसी विशेषज्ञ डॉक्टर के प्रसव कराया जा रहा था। ऑपरेशन के दौरान प्रसूता नीतू यादव की हालत बिगड़ी और सही समय पर विशेषज्ञ न होने के कारण जच्चा-बच्चा दोनों की मौत हो गई। यह अस्पताल वर्ष 2018 से अब तक 7 बार सील हो चुका है। हर बार सील होने के कुछ ही दिनों बाद कागजी खानापूरी कर नया पंजीकरण कराकर दोबारा संचालन शुरू कर दिया गया।
केस 2
रामकोला क्षेत्र के न्यू सारा सिटी हॉस्पिटल को किराए की डिग्री से चलाया जा रहा था। 16 मार्च 2026 को जांच में यह मामला सामने आया था। जांच में डॉ. जितेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर पंजीकरण तो था, लेकिन जांच में डॉक्टर पिछले कई महीनों से अस्पताल आए ही नहीं थे। अस्पताल का संचालन ओटी टेक्नीशियन और अकुशल कर्मचारी करते हुए मिले थे। पंजीकरण केवल एक कागजी ढाल के रूप में इस्तेमाल हो रहा था।
केस 3
हाटा में जेपी हॉस्पिटल बिना पंजीकरण और बिना डॉक्टर के ऑपरेशन करने का मामला 2 जनवरी 2026 को आया था। जांच में इस अस्पताल के पास न तो स्वास्थ्य विभाग का वैध पंजीकरण था और न ही कोई योग्य सर्जन। प्रसूता इंदु देवी का सिजेरियन ऑपरेशन एक अकुशल चिकित्सक की तरफ से किया गया था। इसमें ऑपरेशन के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव होने पर अस्पताल का स्टाफ मरीज को बेड पर ही तड़पता छोड़कर भाग गए थे।
केस 4
तमकुहीराज क्षेत्र के लाइफ लाइन हॉस्पिटल में 15 मार्च 2026 की जांच में गंदगी फैली हुई मिली थी। यहां जांच में ओटी में संक्रमण रोकने का कोई इंतजाम नहीं था। साथ ही मरीजों को अस्पताल में तय मानक के तहत स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए कोई प्रबंध नहीं पाया गया। नोटिस देकर सुधार के निर्देश दिए गए हैं। सुधार नहीं होने पर उनका पंंजीकरण निरस्त कर दिया जाएगा।