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Kushinagar News: कमजोर निर्माण ने बढ़ाया कहर
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टनल, सड़क से लेकर इमारतों के निर्माण में मानकों की अनदेखी खतरनाक
मैदानी क्षेत्रों के मानकों को पहाड़ी इलाकों में उसी तरह लागू करना सुरक्षित नहीं
गोरखपुर। नेपाल में जलप्रलय और पहाड़ी क्षेत्रों में हुई तबाही के बाद हिमालयी राज्यों में टनल, सड़क और इमारतों के निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता लेकिन मानकों के अनुरूप मजबूत निर्माण कर इनके असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है। कमजोर निर्माण आपदा के दौरान जान-माल के नुकसान को कई गुना बढ़ा देता है।
एमएमएमयूटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के अध्यक्ष प्रो. एके मिश्र ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र प्राकृतिक रूप से बेहद संवेदनशील हैं। यहां भारी बारिश, भूस्खलन, बाढ़ और भूकंप का खतरा बना रहता है। ऐसे में सुरक्षित निर्माण बचाव की पहली दीवार है। आपदा कब आएगी, यह हमारे हाथ में नहीं है लेकिन उसके सामने निर्माण कितना मजबूत होगा, यह तय किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि पहाड़ों पर सड़क या टनल बनाने से पहले चट्टानों की प्रकृति, ढलान की स्थिरता, जल निकासी, भूकंपीय संवेदनशीलता और बारिश के संभावित प्रभाव का वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है। भारी बारिश, फ्लैश फ्लड या भूस्खलन में कमजोर ढांचे तेजी से क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। प्रो. मिश्र ने बेतरतीब शहरीकरण को भी बड़ा खतरा बताया। नदी-नालों के प्राकृतिक प्रवाह, ढलानों और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण से आपदा के समय पानी और मलबे का रास्ता बदल सकता है। इससे नुकसान बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि सिर्फ नक्शा पास करना पर्याप्त नहीं है। निर्माण स्थल, डिजाइन, सामग्री और गुणवत्ता की नियमित जांच भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि हर क्षेत्र की भौगोलिक और भूगर्भीय परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए जोन के अनुसार स्ट्रक्चर, डिजाइन और निर्माण सामग्री का चयन होना चाहिए। मैदानी क्षेत्रों के मानकों को पहाड़ी इलाकों में उसी तरह लागू करना सुरक्षित नहीं है।
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मैदानी क्षेत्रों के मानकों को पहाड़ी इलाकों में उसी तरह लागू करना सुरक्षित नहीं
गोरखपुर। नेपाल में जलप्रलय और पहाड़ी क्षेत्रों में हुई तबाही के बाद हिमालयी राज्यों में टनल, सड़क और इमारतों के निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता लेकिन मानकों के अनुरूप मजबूत निर्माण कर इनके असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है। कमजोर निर्माण आपदा के दौरान जान-माल के नुकसान को कई गुना बढ़ा देता है।
एमएमएमयूटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के अध्यक्ष प्रो. एके मिश्र ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र प्राकृतिक रूप से बेहद संवेदनशील हैं। यहां भारी बारिश, भूस्खलन, बाढ़ और भूकंप का खतरा बना रहता है। ऐसे में सुरक्षित निर्माण बचाव की पहली दीवार है। आपदा कब आएगी, यह हमारे हाथ में नहीं है लेकिन उसके सामने निर्माण कितना मजबूत होगा, यह तय किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि पहाड़ों पर सड़क या टनल बनाने से पहले चट्टानों की प्रकृति, ढलान की स्थिरता, जल निकासी, भूकंपीय संवेदनशीलता और बारिश के संभावित प्रभाव का वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है। भारी बारिश, फ्लैश फ्लड या भूस्खलन में कमजोर ढांचे तेजी से क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। प्रो. मिश्र ने बेतरतीब शहरीकरण को भी बड़ा खतरा बताया। नदी-नालों के प्राकृतिक प्रवाह, ढलानों और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण से आपदा के समय पानी और मलबे का रास्ता बदल सकता है। इससे नुकसान बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि सिर्फ नक्शा पास करना पर्याप्त नहीं है। निर्माण स्थल, डिजाइन, सामग्री और गुणवत्ता की नियमित जांच भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि हर क्षेत्र की भौगोलिक और भूगर्भीय परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए जोन के अनुसार स्ट्रक्चर, डिजाइन और निर्माण सामग्री का चयन होना चाहिए। मैदानी क्षेत्रों के मानकों को पहाड़ी इलाकों में उसी तरह लागू करना सुरक्षित नहीं है।
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