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भारत और भोजपुरी मेरे खून में : केम
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डरबन से आए गायक बोले, पांच पीढ़ी पहले पूर्वज गिरमटिया मजदूर के तौर पर गए थे दक्षिण अफ्रीका
अमर उजाला ब्यूरो
फाजिलनगर(कुशीनगर)। लोकरंग महोत्सव में दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर से आए केम चंदलाल अपनी माटी पर आकर भावुक दिखे। डरबन के भोजपुरी गायक केम चंदलाल ने पूर्वांचल की माटी से खुद को जोड़ते हुए कहा कि भारत और भोजपुरी मेरे खून में है।
भोजपुरी जहां हमारे पूर्वजों की धरोहर है। हम कहीं भी बसे हों हमारी पहचान भारत से है। उन्होंने कहा कि पांच पीढ़ी पहले वर्ष 1860 में गिरमिटिया मजदूर के तौर पर दक्षिण अफ्रीका के डरबन में गए थे। दादा-दादी व माता-पिता से विरासत में मुझे मिली भोजपुरी संस्कृति व सभ्यता को आज भी वे संजोये हुए हैं। भले ही वे दूसरे देश के वासी हो गए हैं लेकिन वे दिल व दिमाग से भारतीय हैं। भारत ही मेरी मातृभूमि है। मैं लोकरंग का आभारी हूं कि इस आयोजन के बदौलत अपने मातृभूमि पर आकर भोजपुरी गीत गाने का मौका मिल रहा है।
उन्होंने बताया कि साउथ अफ्रीका में भोजपुरी भाषियों को हेय दृष्टि से देखा जाता है जिसके चलते वहां रह रहे भारतीय मूल के लगभग दो लाख लोग अपने घरों में ही भोजपुरी बोलने के साथ इसके परंपरा को जीवित बनाये हुए हैं। इसी का परिणाम है कि मेरे जैसे कई लोग जो ठीक से भोजपुरी भले न बोल पाते हैं लेकिन भोजपुरी लोकगीत गाकर हम भारतीयता व भारत के प्रति अपने प्रेम से अपने लोगों को जोड़े हुए हैं। लोकरंग दक्षिण अफ्रीका सहित विश्व के अन्य देशों में बसे भारतीय मूल के लोगों को अपने संस्कृति से परिचय कराने का कार्य कर रहा है। हमने तय किया है कि यहां से जाने के बाद भोजपुरी के दक्षिण अफ्रीका में व्यापक करने का कार्य करेंगे। लोकरंग निश्चित ही भोजपुरी लोकगीतों, संस्कृति, सभ्यता को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने और विश्व के सभी देशों में बसे भोजपुरी भाषी लोगों को आपस में जोड़ने का कार्य करेगा।
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अमर उजाला ब्यूरो
फाजिलनगर(कुशीनगर)। लोकरंग महोत्सव में दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर से आए केम चंदलाल अपनी माटी पर आकर भावुक दिखे। डरबन के भोजपुरी गायक केम चंदलाल ने पूर्वांचल की माटी से खुद को जोड़ते हुए कहा कि भारत और भोजपुरी मेरे खून में है।
भोजपुरी जहां हमारे पूर्वजों की धरोहर है। हम कहीं भी बसे हों हमारी पहचान भारत से है। उन्होंने कहा कि पांच पीढ़ी पहले वर्ष 1860 में गिरमिटिया मजदूर के तौर पर दक्षिण अफ्रीका के डरबन में गए थे। दादा-दादी व माता-पिता से विरासत में मुझे मिली भोजपुरी संस्कृति व सभ्यता को आज भी वे संजोये हुए हैं। भले ही वे दूसरे देश के वासी हो गए हैं लेकिन वे दिल व दिमाग से भारतीय हैं। भारत ही मेरी मातृभूमि है। मैं लोकरंग का आभारी हूं कि इस आयोजन के बदौलत अपने मातृभूमि पर आकर भोजपुरी गीत गाने का मौका मिल रहा है।
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उन्होंने बताया कि साउथ अफ्रीका में भोजपुरी भाषियों को हेय दृष्टि से देखा जाता है जिसके चलते वहां रह रहे भारतीय मूल के लगभग दो लाख लोग अपने घरों में ही भोजपुरी बोलने के साथ इसके परंपरा को जीवित बनाये हुए हैं। इसी का परिणाम है कि मेरे जैसे कई लोग जो ठीक से भोजपुरी भले न बोल पाते हैं लेकिन भोजपुरी लोकगीत गाकर हम भारतीयता व भारत के प्रति अपने प्रेम से अपने लोगों को जोड़े हुए हैं। लोकरंग दक्षिण अफ्रीका सहित विश्व के अन्य देशों में बसे भारतीय मूल के लोगों को अपने संस्कृति से परिचय कराने का कार्य कर रहा है। हमने तय किया है कि यहां से जाने के बाद भोजपुरी के दक्षिण अफ्रीका में व्यापक करने का कार्य करेंगे। लोकरंग निश्चित ही भोजपुरी लोकगीतों, संस्कृति, सभ्यता को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने और विश्व के सभी देशों में बसे भोजपुरी भाषी लोगों को आपस में जोड़ने का कार्य करेगा।
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